डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

बिछड़ने का ग़म साफ़ था उसकी नज़रों में , मुझसे कह रहा था कि मैं बेक़रार थोड़ी हूँ।
तमाम उम्र मैंने नाम ये उसके ही लिख डाली, ज़बान से अब मुकर जाऊं वो इंसान थोड़ी हूँ।
बड़े ताबा, बड़े रौशन, सपने टूट ही जाते हैं। सब को दामन में छुपा लूं आसमान थोड़ी हूँ।
दिल ये ज़िद्दी है मेरा अड़ा है उसके आने को। वो प्यार है मेरा, मैं उसका इंतज़ार थोड़ी हूं ।
आया था पल दो पल के लिये चला भी गया, मैं उसकी ज़िंदगी का आख़री पड़ाव थोड़ी हूं।
आओ बैठेंगे गुफ्तगु होगी “मुश्ताक़” मुस्कुरायेंगे , वक़्त ही वक़्त है दो पल की मुलाक़ात थोड़ी हूं।।




