अव्यवस्था से जूझता भारत माँ का एक सपूत।

प्रसिद्ध तीरंदाज लिंबाराम अस्वस्थ हैं और देश की कुव्यवस्था से जूझ रहे हैं। संभव है,बहुत सारे पाठक लिंबा राम का नाम नहीं सुना हो।लिंबाराम देश के प्रसिद्ध तीरंदाज रहे हैं।उन्होंने देश-विदेश में कई पुरस्कार प्राप्त कर अपने देश का नाम रोशन किया।काफी कम उम्र करीब 16 वर्ष में ही ओलंपिक में भाग लेने वाले निंबाराम 1989 में बीजिंग एशियन कप में पुरूष टीम का स्वर्ण पदक तो उसी टूर्नामेंट में पुरुष वर्ग में व्यक्तिगत स्पर्धा का रजत पदक प्राप्त किया।

यह जानकारी मिली कि देश के प्रसिद्ध तीरंदाज लिंबाराम काफी अस्वस्थ हैं और देश की कुव्यवस्था से जूझ रहे हैं।संभव है,बहुत सारे पाठक हों जिन्होंने लिंबा राम का नाम नहीं सुना हो।लिंबाराम देश के प्रसिद्ध तीरंदाज रहे हैं।उन्होंने देश-विदेश में कई पुरस्कार प्राप्त कर अपने देश का नाम रोशन किया।काफी कम उम्र करीब 16 वर्ष में ही ओलंपिक में भाग लेने वाले निंबाराम 1989 में बीजिंग एशियन कप में पुरूष टीम का स्वर्ण पदक तो उसी टूर्नामेंट में पुरुष वर्ग में व्यक्तिगत स्पर्धा का रजत पदक प्राप्त किया।1992 बीजिंग एशियन चैंपियनशिप पुरुष व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया।1995 में आयोजित नई दिल्ली कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप पुरुष टीम में स्वर्ण तो उसी चैंपियनशिप के पुरुष व्यक्तिगत में रजत पदक प्राप्त किया।लिंबाराम 1988,1992 और 1996 के ओलंपिक खेलों में हिस्सा ले चुके हैं।कोच के रूप में उन्होंने 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स और 2012 के ओलंपिक में राष्ट्रीय टीम का मार्गदर्शन किया।ये कहना गलत न होगा कि एक खिलाड़ी और एक कोच के रूप में लिंबाराम ने देश को एक नई ऊंचाई दी।यदि क्रिकेट में सचिन और हॉकी में ध्यान चंद को उस खेल का भगवान माना जाता है तो वही स्थान तीरंदाजी में लिंबाराम को प्राप्त है।देश के इस महान खिलाड़ी को 1991 में अर्जुन पुरस्कार और 2012 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लिंबाराम ने तीरंदाजी में भारत को एक अलग पहचान दिलाई।

                 कभी लिंबाराम राजस्थान के एक छोटे से गांव में बेहद ही गरीब आदिवासी की तरह रहते थे।पेट की आग बुझाने के लिए शिकार करते।इस शिकार में उनका साथ देता उनका तीर-कमान।अपने तीर से उड़ती चिड़िया पर निशाना लगाते।खेल-खेल में ही अपनी भूख मिटाने के लिए शिकार करने वाले लिंबाराम पहुंच गए स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित तीरंदाजों के सेलेक्शन होने वाली स्पर्धा में।अपनी प्रतिभा से उन्होंने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अधिकारियों को प्रभावित किया और लिंबाराम का चयन हो गया।स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और नतीजा हुआ कि वहां के बाद फिर लिंबाराम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।एक पर एक उपलब्धि उनके खाते में शामिल होने लगी और एक वक्त आया जब उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया गया।वर्ष 2000 में वो बीमार हुए और 2004 तक बीमार रहे।आराम हुई तो एक बार फिर खेल से जुड़े।परन्तु 2012 से उनकी बीमारी बढ़ती चली गई।उन्हें रीढ़ की हड्डी और गर्दन की हड्डी में परेशानी है।लीवर में परेशानी रहती है,उनके दिमाग के दाएं हिस्से में भी परेशानी है।साथ ही साथ शुगर बीपी सहित उन्हें कई अन्य बीमारी भी है।दैनिक अखबार के माध्यम से जानकारी मिली की कमर की हड्डी में समस्या के बावजूद भारत मां का यह महान पुत्र अपने इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों की ठोकर खा रहा है।बीमार लिंबाराम को घंटों लाइन में लगना पड़ता है और अपने नंबर का इंतजार करना पड़ता है।जानकारी मिली है कि उनकी पत्नी के द्वारा उनका परिचय बताने पर वहां के कर्मचारी उनसे ओलंपिक या अवार्ड का कोई कार्ड लाने को कहते हैं।आर्थिक रूप से कमजोर लिंबाराम निजी अस्पतालों में इलाज करवाने में असमर्थ हैं।ये बेहद खुशी की बात है कि अखबार में खबर छपने के बाद ही सही,केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने आवश्यक कदम उठाने के निर्देश अधिकारियों को दिए हैं।साथ ही साथ गाजियाबाद के एक निजी अस्पताल ने लिंबाराम के मुफ्त इलाज की पेशकश की है।कुछ और लोग भी लिंबाराम की मदद में आगे आ रहे हैं।अब यह उम्मीद की जा सकती है कि लिंबाराम के दुखों का अंत हो सकेगा।परंतु यह बेहद अफसोस और शर्म की बात है कि यदि अखबार में यह खबर नहीं छपी होती तो इसी तरह उन्हें दर-दर की ठोकर खानी पड़ती।यह बेहद दुख की बात है कि अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति की सुध लेने वाली देश में कोई संस्था नहीं है।यह बेहद दुखद है कि देश के ऐसे महान सपूत से भी परिचय पत्र की मांग की जाती है।जबकि वहीं हमारे देश में राजनेताओं ही नहीं उनके परिजनों को भी कई तरह की विशेष सुविधा प्राप्त है।राजनेता आजीवन सरकारी सुविधा का उपभोग करते हैं।एयरपोर्ट,रेलवे स्टेशन,अस्पताल सहित हर जगह राजनेताओं को विशेष सुविधा प्राप्त है।वर्तमान तो वर्तमान,पूर्व मंत्रियों और सांसदों को भी कई प्रकार की विशेष सुविधा मिली हुई है।लेकिन अफसोस,देश के कई ऐसे सपूत हैं चाहे खेल के क्षेत्र में हों,कला के क्षेत्र में हों या और भी किसी क्षेत्र के हों और जिन्होंने देश का मान बढ़ाया है या फिर कई शहीद की विधवाएं हैं,बच्चे हैं जो आज विभिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझ रहे हैं।परंतु उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।यदि सरकार पद्मश्री सम्मान या फिर और भी विभिन्न सम्मान से सम्मानित व्यक्ति का ख्याल रख पाने में असमर्थ है तो फिर ऐसे पुरस्कारों का कोई औचित्य नहीं रह जाता।भारत मां के ये सच्चे सपूत हमारे देश के अनमोल रत्न हैं,जिन्होंने भारत माता की शान बढ़ाने का काम किया है।भारत माता के सच्चे सपूत वो शहीद हैं जिन्होंने भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए हैं।हमारी सरकार को ऐसे विभाग का गठन करना चाहिए जो ऐसे अनमोल रत्न और देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वालों के परिजनों से संपर्क में रहें और आवश्यकता अनुसार उनकी मदद करें।तभी ऐसे सम्मानों की सार्थकता हैं।

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