यूजीसी का उच्चय शिक्षा संस्थान नीति का मामला देश को आरक्षण, कानून और न्याय में टकराव को आगे ला दिया है । दिन वो दिन यह मामला देश के सभी विश्वविद्यालयों में एक तरह से हलचल पैदा कर दिया है । छात्र रोड पर आ चुके हैं …

अगर समाज में कानून और न्याय के रखवालों में टकराव हो तो क्या जाति और धर्म की बेडियों से मुक्ति संभव है? धर्म और जाति कि सामाजिक-आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक गतिकी में जल्द कोई परिवर्तन आने कि सम्भावना नहीं है, क्योंकि पुराने घिसेपिटे कानूनों, न्यायपालिका द्वारा उनकी गलत व्याख्या और राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव, अर्थात वे कारक जो उसे ऑक्सीजन देते हैं, आज भी अपरिवर्तित हैं। ऐसा लगता है कि आरक्षण की व्यवस्था, समाज, न्यायपालिका और राजनेताओं द्वारा रचा गया एक गहरा षडयंत्र है, देखिए ना यह कैसी विडम्बना और कैसा अत्याचार है, जो जी तोड़ पढ़ाई कर रहा वह बैठा बेकार है। प्रतियोगिता के काल में कोटा बन गया, भारत की महान शिक्षा छोटा बन गया, यह हमारी कमजोरी है या समाज का विकार, अंधे हो जाते है नेता जब देखते कुर्सी साकार है।
आज युवा वर्ग को कोटा नहीं अवसर मिलना चाहिए, जिसके अंदर क्षमता हो उसे आगे बढ़ाना चाहिए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है. बशर्ते, ये सिद्ध किया जा सके कि वे औरों के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं. क्योंकि अतीत में उनके साथ अन्याय हुआ है, ये मानते हुए उसकी क्षतिपूर्ति के तौर पर, आरक्षण दिया जा सकता है. साथ ही अगर समाज का एक हिस्सा कम तरक्की करता है जिसके ऐतिहासिक कारण हैं, तो इसका असर न सिर्फ देश की प्रगति बल्कि लंबे समय में समाज पर भी पड़ेगा. मंडल कमीशन केस में सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया था कि अलग अलग राज्यों में अलग अलग स्थिति हो सकती है.
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये मुद्दे सनातन नहीं हैं और ऐतिहासिक परिवर्तनों के साथ गुलामी कि बेडियां गायब हो जाएंगी। जातिप्रथा को नष्ट कर अछूत प्रथा का उन्मूलन भले ही एक सुदूर स्वप्न बना रहे परंतु शिक्षा और सामाजिक जागृति से निश्चित रूप से नीची जातियों के समूहों का सशक्तिकरण होगा और वे धार्मिक और राजनैतिक सत्ता में बराबरी का हिस्सा मांगेगे। यह अत्यंत दुख की बात है कि दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इन लोगों को सुरक्षा और न्याय उपलब्ध करवाने के लिए कुछ नहीं किया। सबसे गरीब लोगों कि आवाज अक्सर गुम हो जाती है। नेताओं को इतनी फुर्सत ही नहीं रहती कि वे अपने दलित भाईयों और बहनों के दुखों का तथ्यों और आंकड़ों के साथ वर्णन करें।
गरीबी जाति देखकर नहीं आती। आज देश के गरीबों में किसी एक वर्ग विशेष के नहीं बल्कि सभी वर्गां के लोग शामिल हैं। समाज में सभी वर्गों के लिये रोजगार, शिक्षा, और न्याय के समान अवसर की व्यवस्था होनी चाहिये। आज गरीब और किसानों के दर्द को समझने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। जिस तरह से सरकार अपने खर्चे कम न करके जनता पर और बोझा डालने के लिये नये नये कर (टैक्स) लगाने के तरीके ढूंढ़ती रहता है उसी तरह से राजनैतिक पार्टियां और नेता लोग अपना वोट बैंक बनाने के लिये नये नये वर्गों को आरक्षण का रास्ता दिखाता रहते हैं। देश में जरुरत अच्छी काम करने वाली सरकारों कि है क्योंकि अगर सरकारें अच्छा काम करें तो सभी वर्गों का भला होगा और कोई भी ये नहीं कहेगा कि मुझे मौका नहीं मिला। लेकिन अपनी नाकामियों को छिपाने और नया वोट बैंक बनाने के चक्कर में राजनैतिक दल आरक्षण के नये नये जुमले उछालते रहते हैं ताकि लोगों को लोगो ये लगे कि राजनैतिक दल उनका कितना भला चाहते हैं।
ये दल मुस्लिम, पिछड़े, एससी-एसटी, युवा कई तरह के आरक्षण की मांग करते रहते हैं लेकिन अपनी बनाई हुई सरकारों कुछ भी ऐसा नहीं करते हैं जिससे की आरक्षण की नौबत ही न आये। मुझे महिला आरक्षण के पास होने कि तो खुशी है लेकिन मुझे आने वाले समय की तस्वीर दिख रही है कि अभी आरक्षण की ये बात बहुत आगे तक जायेगी। आप आरक्षण के पक्ष में हो सकते हैं या खिलाफ हो सकते हैं, इसमें कोई समस्या नहीं है। समस्या तब होती है जब आप अपनी बात को गलत तथ्यों के साथ रखते हैं। याद रहे हमारे देश में सभी को जीने का सामान्य अधिकार है। प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अगर लिंग, समुदाय या क्षेत्र आधारित आरक्षण दिया जाता है, तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता, लेकिन आरक्षण के इस प्रावधान के तहत योग्यता को दरकिनार करने का ही परिणाम है कि ब्रेन ड्रेन को लगातार बढ़ावा मिल रहा है।