गंभीर बोझ  शादी,नहीं नहीं,,,यह रस्म नहीं बल्कि एक सज़ा है जो समाज एक बाप को देता है।

“डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश रात के दो बज रहे थे, लेकिन मंजूर साहब की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उनके सामने कॉपी का एक पन्ना खुला था, जिस पर पेंसिल से लिखी गई रकम (गिनती) बार-बार मिटाई और दोबारा लिखी जा रही थी। अगले महीने उनकी बड़ी बेटी, मरियम की शादी … Continue reading गंभीर बोझ  शादी,नहीं नहीं,,,यह रस्म नहीं बल्कि एक सज़ा है जो समाज एक बाप को देता है।