जब मुहब्बत में अहदे रफ़ाक़त को वो भूला दें..

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज हरदा मध्य प्रदेश

नज़रें से मेरी आंखों को ज़रा ग़ौर से पढ़ना। नशा इसमें तुम्हारी आंखों का ही मिलेगा ।
धड़कनों पर मेरी हाथ ज़रा सोच कर रखना। यह दिल है मेरा झटका तुम्हें ज़ोरों से लगेगा।
बिछड़ रहे हैं तो बिछड़ने का तरीक़ा सीखो। इस चाहने वाले को पागल फ़िर कौन कहेगा।
धड़कनों का तवाज़ुन है, कुछ बिगड़ा बिगाड़ा। बीमारे इश्क हूं इलाज मेरा बता कौन करेगा।
जब मुहब्बत में अहदे रफ़ाक़त को वो भूला दें। तुम ही कहो हसीनों पे फ़िर यकीं कौन करेगा।

सर-ए-बाज़ार इस तरह मुस्कुरा के देखोगे हमें। दिल पे रखके हाथ क्यों मुश्ताक़ आहें न भरेगा।

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