ज़िंदगी, एक रंगमंच, एक इम्तिहान

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज़” (लेखक हरदा, मध्य प्रदेश से स्वतंत्र विचार-लेखक एवं साहित्यकार हैं) “ज़िंदगी और कुछ भी नहीं… बस एक रंगमंच है, जहाँ हम सब महज़ अदाकार हैं। हमें अपना-अपना किरदार निभाकर एक दिन अपने मालिक-ए-हक़ीक़ी के पास वापस लौट जाना है।” यह दुनिया एक विशाल रंगमंच है और यहाँ बिताया हर लम्हा … Continue reading ज़िंदगी, एक रंगमंच, एक इम्तिहान