डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

आएंगे याद तुझे हम “बे-इंतहा”, ये मलाल रहेगा,
बिछड़ कर हमसे, तेरा ही ख़ुद से सवाल रहेगा।
किसे ख़बर थी कि ये मोड़ उम्र भर का रोग बनेगा,
तू जीत तो जाएगा पर जीत कर भी बे-हाल रहेगा।
तेरे फ़ैसलों की तपिश जब तेरे वज़ूद को छुएगी,
तेरी आँखों में मेरी याद का हर दम गुलाल रहेगा।
वो जो हंसी सी थी होंठों पे, अब कहाँ ढूंढोगे उसे?
अब तेरे हर हर्फ़ में बस मेरा ही ख़्याल रहेगा।
मिलेगा सब कुछ तुझे इस शहर की रौनक़ों में मगर,
वक़्त की तन्हाइयों में हमेशा मेरा ही मुश्ताक़ रहेगा।



