निःस्वार्थ भाव से किया जाने वाला प्रेम आपसी सौहार्द और एकता को बढ़ाता है। आज के इस भाग दौड़ की जिंदगी में किसी के पास वक्त ही नही है । नफरत और स्वार्थ में उलझ कर हम अपने परिवार और समाज से दूर होते जा रहे है ।

यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दिमाग रुपी जमीन में कौन सा बीज बोते है थोड़ी सी चेतना एवं सावधानी से हम कांटेदार पेड़ को महकते फूलों के पेड़ में भी बदल सकते है। हमारे विचारों पर हमारा स्वयं का नियंत्रण होता है इसलिए यह हमें ही तय करना होता है कि हमें सकारात्मक सोचना है या नकारात्मक। सकारात्मक सोच के बिना जिंदगी अधूरी है। सकारात्मक सोच की शक्ति से घोर अन्धकार को भी आशा की किरणों से रोशनी में बदला जा सकता है। नकारात्मकता को नकारात्मकता समाप्त नहीं कर सकती, नकारात्मकता को तो केवल सकारात्मकता ही समाप्त कर सकती है इसीलिए जब भी कोई छोटा सा नकारात्मक विचार मन में आये उसे उसी पल सकारात्मक विचार में बदल देना चाहिए। मानव जीवन अनेक विविधताओं से भरा हुआ है।
व्यक्ति एक दूसरे की खुशी में खुश और दुःखी में दुःख का अनुभव करते है । निस्वार्थ प्यार के माध्यम से ही इंसानियत और एकता को स्थापित किया जा सकता है । कोयल की कुक मौसम की खुमारी और गुलाबों की महक उसके साथ अपने परिवार और हमसफर का साथ और उसका प्यार आपकी भ्रमण को यादगार बना देता है । हमारे देश भारत ने अनेक संस्कृतियों और सभ्यताओ को अपनाया है । पश्चिम देशो की ऐसी संस्कृतियों को भी भारत के लोगो ने आत्मसात किया है । फिर जब प्यार और सौहार्द की बात होगी तो हम क्यों न आगे बढ़कर इसका स्वागत करे । हो सकता है कि इसे अपनाने का तरीका भिन्न हो । प्यार प्रकृति द्वारा दिया जाने वाला एक ऐसा उपहार है जिसका अहसास रूह तक जाता है । इसमें नफरत और स्वार्थ का कोई स्थान नहीं है ।
अपने जीवनकाल में उसे अनेक प्रकार के कर्तव्यों व दायित्वों का निर्वाह करना पड़ता है। इनमें वह इतना अधिक व्यस्त हो जाता है कि अपनी व्यस्त जिंदगी से स्वयं के मनोरंजन आदि के लिए समय निकालना भी कठिन हो जाता है। सकारात्मकता की शुरुआत आशा और विश्वास से होती है। किसी जगह पर चारों ओर अँधेरा है और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा और वहां पर अगर हम एक छोटा सा दीपक जला देंगे तो उस दीपक में इतनी शक्ति है कि वह छोटा सा दीपक चारों ओर फैले अँधेरे को एक पल में दूर कर देगा इसी तरह आशा की एक किरण सारे नकारात्मक विचारों को एक पल में मिटा सकती है। जिस तरह काले रंग का चश्मा पहनने पर हमें सब कुछ काला और लाल रंग का चश्मा पहनने पर हमें सब कुछ लाल ही दिखाई देता है उसी प्रकार नेगेटिव सोच से हमें अपने चारों ओर निराशा, दुःख और असंतोष ही दिखाई देगा और पॉजिटिव सोच से हमें आशा, खुशियाँ एंव संतोष ही नजर आएगा। यह हम पर निर्भर करता है कि सकारात्मक चश्मे से इस दुनिया को देखते है या नकारात्मक चश्मे से अगर हमने पॉजिटिव चश्मा पहना है तो हमें हर व्यक्ति अच्छा लगेगा और हम प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई खूबी ढूँढ ही लेंगे लेकिन अगर हमने नकारात्मक चश्मा पहना है तो हम बुराइयाँ खोजने वाले कीड़े बन जाऐंगे। हमारे पास दो तरह के बीज होते है सकारात्मक विचार एंव नकारात्मक विचार है, जो आगे चलकर हमारे दृष्टिकोण एंव व्यवहार रुपी पेड़ का निर्धारण करता है। सकारात्मक सोच के बिना जिंदगी अधूरी है। हम जैसा सोचते है वैसा बन जाते है इसलिए कहा जाता है कि जैसे हमारे विचार होते है वैसा ही हमारा आचरण होता है।



