नीतीश कुमार का जदयू अध्यक्ष पद पर चौथा राजतिलक:बिहार की सियासत में नया मोड़, बीजेपी को साथ-मात का संदेश

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 19 मार्च को जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर बिहार की सियासत को नया संदेश दे दिया है-रितेश सिन्हा

यह नामांकन नई दिल्ली के जंतर-मंतर रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में शाम को किया गया। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने नीतीश जी की ओर से यह नामांकन चुनाव रिटर्निंग ऑफिसर अनिल हेगड़े को सौंपा। यह नीतीश कुमार का इस पद पर चौथा कार्यकाल होगा। 2016 में उन्होंने शरद यादव की जगह कमान संभाली, 2019 में निर्विरोध चुने गए। 2020 में आरसीपी सिंह को सौंपा, लेकिन 2023 में खुद लौटे। अब फिर से यह जिम्मेदारी लेने से साफ है कि नीतीश जी संगठन पर पकड़ मजबूत रखना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है—यह कदम बिहार की सियासत को कहां ले जाएगा? क्या यह एनडीए में टकराव की आहट है या मजबूत साझेदारी का संकेत?

नीतीश कुमार को बिहार में ‘पलटीमार’ कहा जाता है, लेकिन उनकी चालें हमेशा गहन रणनीति पर टिकी होती हैं। जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 29 मार्च को पटना में होने की संभावना है। पार्टी सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रीय परिषद की बैठक भी यहीं हो सकती है। देशभर से नेता जुटेंगे, जहां संगठनात्मक फैसले लिये जाएंगे। कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की भूमिका बरकरार रहने की चर्चा है। राज्य परिषद की बैठक भी मार्च अंत या अप्रैल शुरुआत में हो सकती है, जो मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ के संशोधित कार्यक्रम से मेल खाती है।लेकिन असली खेल तो बिहार की सियासत में छिपा है। अब विधान परिषद (एमएलसी) सीट छोड़ने का समय आ गया है। सवाल उठता है—क्या वे मुख्यमंत्री पद भी छोड़ देंगे? या बीजेपी से मनमुटाविक फैसले जुदपा के हक में करवा लेंगे? पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों का इंतजार हो सकता है। अगर बीजेपी कमजोर पड़ी, तो नीतीश जी सीएम गद्दी लंबे समय तक थामे रख सकते हैं।

नीतीश कुमार का जदयू अध्यक्ष पद पर चौथी बार काबिज होना केवल एक संगठनात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक दूरगामी रणनीतिक कदम है, जिसके कई स्तरों पर अर्थ निकाले जा रहे हैं। जनता दल (यूनाइटेड) की कमान फिर अपने हाथ में लेकर उन्होंने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे अब चुनावी वर्ष के करीब आते-आते संगठन और सत्ता—दोनों पर सीधा नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब राज्य और केंद्र, दोनों स्तरों पर राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और गठबंधन की राजनीति नए दौर में प्रवेश कर रही है।

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर हमेशा से ही लचीलापन और व्यावहारिकता का मिश्रण रहा है। उन्हें “पलटीमार” कहकर आलोचना जरूर की जाती है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनकी हर “पलटी” के पीछे एक ठोस गणित और परिस्थिति का गहन विश्लेषण होता है। 2016 में शरद यादव से पार्टी की कमान लेना, 2019 में निर्विरोध अध्यक्ष बनना, 2020 में आरसीपी सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपना और फिर 2023 में खुद वापस लौटना—ये सारे घटनाक्रम बताते हैं कि वे संगठन को अपने नियंत्रण से पूरी तरह बाहर जाने देने के पक्ष में कभी नहीं रहे। अब चौथी बार अध्यक्ष बनना इस बात का प्रमाण है कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते।

इस फैसले का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए है, जो इस समय एनडीए में जदयू की सबसे बड़ी सहयोगी है। बिहार में भाजपा और जदयू का गठबंधन संख्या के लिहाज से मजबूत जरूर है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जदयू के बिना भाजपा के लिए बहुमत का रास्ता आसान नहीं है। ऐसे में अध्यक्ष पद पर लौटकर नीतीश कुमार ने यह संकेत दिया है कि वे केवल मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि संगठन के मुखिया के रूप में भी फैसलों को प्रभावित करेंगे। इसका सीधा अर्थ है कि अब भाजपा को हर बड़े राजनीतिक और नीतिगत निर्णय में जदयू को बराबरी का भागीदार बनाना होगा।

नीतीश कुमार का यह कदम उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब वे राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ले चुके हैं और उन्हें विधान परिषद (एमएलसी) की सदस्यता छोड़नी ही होगी। तकनीकी रूप से यह सवाल उठता है कि क्या वे आगे चलकर मुख्यमंत्री पद भी छोड़ सकते हैं। हालांकि, राजनीति के जानकार मानते हैं कि ऐसा तुरंत होने की संभावना कम है। बल्कि, यह अधिक संभावित है कि वे इस स्थिति का उपयोग भाजपा पर दबाव बनाने के लिए करें—ताकि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा, अधिक वित्तीय पैकेज और अन्य नीतिगत लाभ मिल सकें।

यहां इतिहास की एक दिलचस्प मिसाल याद आती है—गिरीधर गोमांग की। 1999 में उन्होंने एक वोट के जरिए केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को गिराने में भूमिका निभाई थी। उस घटना ने यह साबित किया था कि भारतीय राजनीति में एक रणनीतिक निर्णय कितना बड़ा असर डाल सकता है। नीतीश कुमार की राजनीति भी इसी तरह के गणित पर आधारित रही है, जहां सही समय पर लिया गया फैसला पूरे सत्ता समीकरण को बदल सकता है। वर्तमान परिदृश्य में बिहार की राजनीति कई संभावनाओं के बीच खड़ी है।

पहली संभावना यह है कि एनडीए पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़े और जदयू-भाजपा मिलकर 2025 का चुनाव लड़े। इस स्थिति में नीतीश कुमार का अध्यक्ष बनना संगठन को चुनावी मोड में ले जाने का एक प्रयास माना जाएगा। दूसरी संभावना यह है कि अगर आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अपेक्षा से कमजोर रहता है, तो नीतीश कुमार फिर से नए राजनीतिक विकल्प तलाश सकते हैं। अतीत में वे राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुके हैं, इसलिए यह संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती।

तीसरी और सबसे जटिल संभावना यह है कि वे मुख्यमंत्री पद पर बने रहते हुए जदयू को एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान देने की दिशा में काम करें। इसका मतलब होगा कि वे केंद्र में सहयोगी रहकर भी राज्य के मुद्दों पर खुलकर दबाव की राजनीति करेंगे। विशेष राज्य का दर्जा, किसानों की आय, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) को बढ़ावा, और सहकारी बैंकिंग जैसे मुद्दे उनके एजेंडे में प्रमुख रह सकते हैं। पार्टी के भीतर भी यह फैसला कई संकेत देता है।

संभावना बताती है कि संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। वहीं आरसीपी सिंह के साथ हुए विवाद से सबक लेते हुए नीतीश कुमार अब पार्टी पर अपनी पकड़ ढीली नहीं छोड़ना चाहते। 29 मार्च को प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्यकारिणी और परिषद की बैठकें इस दिशा में महत्वपूर्ण फैसले ले सकती हैं। बिहार की राजनीति में विपक्ष भी लगातार सक्रिय है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी खुद को एक विकल्प के रूप में पेश कर रही है। ऐसे में जदयू के लिए संगठनात्मक मजबूती और स्पष्ट रणनीति बेहद जरूरी हो जाती है। नीतीश कुमार का अध्यक्ष बनना इसी जरूरत का हिस्सा है, ताकि पार्टी अंदरूनी खींचतान से बचते हुए एकजुट होकर चुनावी चुनौती का सामना कर सके।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार का यह कदम बिहार की राजनीति में “साथ-मात” की रणनीति का प्रतीक है। वे एनडीए के साथ बने रहकर भी अपनी शर्तों पर राजनीति करना चाहते हैं। अगर भाजपा उनके संकेतों को समझती है और साझेदारी को संतुलित रखती है, तो गठबंधन मजबूत रह सकता है। लेकिन अगर मतभेद बढ़ते हैं, तो बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम का निष्कर्ष यही है कि नीतीश कुमार अभी भी बिहार की राजनीति के केंद्रीय खिलाड़ी हैं। उनका हर कदम केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति को भी आकार देता है। आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि यह चाल स्थिरता की ओर ले जाती है या फिर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत करती है।

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