बदलते बिहार की बदलती तस्वीर, सुकून के राजनीति की शुरुआत तो नहीं ?

प्रशांत किशोर, प्रत्यय अमृत और विनय कुमार को एक साथ एक मेज पर बेहद सहज और गंभीर मुद्रा में देखना निश्चित रूप से बिहार की बदलती राजनीति की एक नई और मुकम्मल शुरुआत है। यह इस बात का प्रमाण है कि बिहार की जनता अब खोखले वादों से आगे बढ़कर जमीन पर काम देखना चाहती है और व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे अधिकारी भी इस बदलाव की बयार को महसूस कर रहे हैं।

बिहार की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से जो तस्वीरें और घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, उन्होंने राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया है। हाल ही में जन सुराज पार्टी के संस्थापक और बांकीपुर से नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर (PK), बिहार के मुख्य सचिव (Chief Secretary) प्रत्यय अमृत और पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक की तस्वीरों ने राज्य के सियासी गलियारों में एक नया भूचाल ला दिया है।

एक ऐसे राज्य में जहां केवल एक विधायक वाली पार्टी के नेता के साथ प्रशासनिक और पुलिस तंत्र के शीर्ष अधिकारी इतने सहज और ‘सुकून’ भरे अंदाज में बैठक कर रहे हों, यह निश्चित रूप से साधारण घटना नहीं है। सवाल उठना लाजिमी है: क्या प्रशांत किशोर, प्रत्यय अमृत और विनय कुमार की यह जुगलबंदी बिहार में प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव की एक नई इबारत लिख रही है?

बिहार के राजनीतिक इतिहास में अमूमन यह देखा जाता है कि मुख्य सचिव या डीजीपी स्तर के अधिकारी मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री या कैबिनेट मंत्रियों के साथ ही इस तरह की विस्तृत समीक्षा बैठकें करते हैं। लेकिन बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ को ढहाकर सदन पहुंचे प्रशांत किशोर के साथ सचिवालय में हुई इस बैठक ने सबको चौंका दिया है।

गुरुवार को पुराना सचिवालय में आयोजित इस बैठक में न केवल मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत और डीजीपी विनय कुमार मौजूद थे, बल्कि परिवहन विभाग, नगर विकास विभाग के सचिव और पटना नगर निगम के कमिश्नर सहित 5 अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे। इसे राजनीतिक हलकों में प्रशांत किशोर के बढ़ते कद और उनकी ‘आक्रामक कूटनीति’ के असर के रूप में देखा जा रहा है।

बैठक के बाद जब प्रशांत किशोर मीडिया से मुखातिब हुए, तो उनका आत्मविश्वास देखने लायक था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह बैठक पिछले सप्ताह डीजीपी विनय कुमार के साथ हुई मुलाकात का ही अगला पड़ाव (Follow-up) थी।

इस बैठक में मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दों पर गहन मंथन हुआ और ठोस नीतियां बनाने पर सहमति बनी। प्रशांत किशोर ने बिहार में तेजी से फैल रहे सूखे नशे के खिलाफ चिंता जताई। इस पर निर्णय लिया गया कि पटना पुलिस और देशभर की प्रख्यात ‘सिविक सोसायटियों’ को मिलाकर एक संयुक्त और बड़ा अभियान चलाया जाएगा। राजधानी की सबसे बड़ी समस्या ‘जाम’ से निपटने के लिए एक ‘इंटर-डिपार्टमेंटल कोआर्डिनेशन वर्कशॉप’ का आयोजन किया जाएगा। इसके अलावा, देश भर के शीर्ष ट्रैफिक एक्सपर्ट्स को बुलाकर पटना के लिए नया रूट और मैनेजमेंट प्लान तैयार किया जाएगा। बांकीपुर और पटना क्षेत्र में ड्रेनेज व्यवस्था, शुद्ध पेयजल की आपूर्ति और सरकारी स्कूलों के गुणात्मक सुधार पर भी अधिकारियों के साथ लंबी बातचीत हुई। बिहार की ब्यूरोक्रेसी हमेशा से सत्ता के शीर्ष केंद्र यानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। प्रत्यय अमृत को नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद और कड़क आईएएस अधिकारियों में गिना जाता है। ऐसे में उनका और डीजीपी विनय कुमार का प्रशांत किशोर के साथ इतनी आत्मीयता और गंभीरता से बैठना कई बड़े राजनीतिक इशारे करता है।

नौकरशाही हमेशा हवा का रुख भांपने में माहिर होती है। बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत ने यह साबित कर दिया है कि जन सुराज केवल जमीन पर यात्राएं करने वाला संगठन नहीं, बल्कि चुनावी मशीनरी को मात देने में सक्षम राजनीतिक दल बन चुका है। अधिकारियों का यह ‘सुकून’ दिखाता है कि वे प्रशांत किशोर को बिहार के भविष्य के एक मजबूत विकल्प के रूप में देख रहे हैं।

राजद (RJD) और भाजपा (BJP) जैसी पारंपरिक पार्टियों के लिए यह तस्वीरें किसी झटके से कम नहीं हैं। अमूमन विपक्ष के विधायकों की शिकायतों को नौकरशाही ठंडे बस्ते में डाल देती है। लेकिन पीके के एक इशारे पर पूरी प्रशासनिक मशीनरी का हरकत में आना यह संदेश देता है कि व्यवस्था के भीतर प्रशांत किशोर की पकड़ मजबूत हो रही है।

प्रशांत किशोर ने जब ‘जन सुराज’ अभियान की शुरुआत की थी, तब आलोचकों ने उन्हें केवल एक ‘चुनावी रणनीतिकार’ कहकर खारिज कर दिया था। लेकिन आज की तारीख में वे बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और उनके तेवर पूरी तरह एक परिपक्व राजनेता जैसे हैं।

बिहार की राजनीति हमेशा से जातिगत समीकरणों, मुफ्त की योजनाओं (Freebies) और ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीति के केंद्र में शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही को रखा है। शीर्ष अधिकारियों के साथ उनकी यह बैठक इसी ‘विकासात्मक राजनीति’ का हिस्सा है, जहां वे केवल कमियां नहीं निकाल रहे, बल्कि अधिकारियों के साथ बैठकर समाधान का ब्लूप्रिंट तैयार कर रहे हैं।

हालांकि, इस तस्वीर के सुखद पहलू के साथ-साथ प्रशांत किशोर के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कुछ ही समय पहले पीके ने बिहार के प्रशासनिक तंत्र और स्वयं प्रत्यय अमृत से जुड़े कुछ मामलों पर तीखे सवाल उठाए थे। ऐसे में इस प्रशासनिक अमले के साथ उनका यह ‘वर्किंग रिलेशन’ कितना लंबा और प्रभावी रहता है, यह देखने वाली बात होगी।

इसके अलावा, सत्ताधारी गठबंधन (NDA) और विपक्षी महागठबंधन (RJD-Congress) प्रशांत किशोर के इस बढ़ते प्रशासनिक रसूख को आसानी से हजम नहीं करेंगे। आने वाले समय में राजनीतिक दबाव के कारण नौकरशाही के इस रुख में बदलाव भी आ सकता है।

प्रशांत किशोर, प्रत्यय अमृत और विनय कुमार को एक साथ एक मेज पर बेहद सहज और गंभीर मुद्रा में देखना निश्चित रूप से बिहार की बदलती राजनीति की एक नई और मुकम्मल शुरुआत है। यह इस बात का प्रमाण है कि बिहार की जनता अब खोखले वादों से आगे बढ़कर जमीन पर काम देखना चाहती है और व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे अधिकारी भी इस बदलाव की बयार को महसूस कर रहे हैं।

बांकीपुर से शुरू हुई जन सुराज की यह चिंगारी क्या पूरे बिहार की सियासी व्यवस्था को बदल पाएगी? इसका सटीक जवाब तो भविष्य के गर्त में है, लेकिन फिलहाल इस एक बैठक ने बिहार की राजनीति के पारंपरिक सूरमाओं की नींद जरूर उड़ा दी है।

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