केंद्रीय बजट 2026-27 के पेश होते ही देश के आर्थिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। शेयर बाजार की तेज गिरावट ने जहां निवेशकों की चिंता बढ़ा दी, वहीं आम आदमी को इस बजट से बड़ी राहत न मिलने का गहरा मलाल है।

सेंसेक्स और निफ्टी में 1500 अंकों तक की गिरावट और रुपये का 85 के स्तर के पार फिसलना इस बात का संकेत है कि बाजार को बजट में भरोसा पैदा करने वाली कोई ठोस पहल नजर नहीं आई। सरकार इसे भले ही “विकासोन्मुख बजट” बता रही हो, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि महंगाई, रोजगार और किसानों की समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और घरेलू महंगाई के दबाव
बजट ऐसे समय में आया है जब देश वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और घरेलू महंगाई के दबाव से गुजर रहा है। आम जनता को उम्मीद थी कि सरकार उसकी जेब पर सीधा असर डालने वाले मुद्दों—ईंधन की कीमतें, खाद्य वस्तुओं पर कर और रोजगार सृजन—पर ठोस राहत देगी, लेकिन बजट घोषणाओं में इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिले।
सरकार ने इस बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को प्राथमिकता दी है। वित्त मंत्री ने 10 लाख करोड़ रुपये के इंफ्रा निवेश की घोषणा की, जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट विस्तार और स्मार्ट सिटी परियोजनाएं शामिल हैं। सरकार का दावा है कि इससे दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को गति मिलेगी और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
रेलवे को भी बजट में विशेष महत्व
रेलवे को भी बजट में विशेष महत्व दिया गया है। 2.5 लाख करोड़ रुपये के आवंटन के साथ वंदे भारत ट्रेनों की संख्या दोगुनी करने और 500 नए स्टेशनों के पुनर्विकास की योजना सामने आई है। स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुष्मान भारत योजना के विस्तार और नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना पर जोर दिया गया है, जिससे ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं के मजबूत होने की उम्मीद है।
आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है
एमएसएमई सेक्टर के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का विशेष फंड घोषित किया गया है। सस्ते ऋण, क्रेडिट गारंटी और टेक्नोलॉजी अपग्रेड के जरिए इस क्षेत्र को मजबूत करने की बात कही गई है, क्योंकि यह सेक्टर देश की जीडीपी और रोजगार का बड़ा आधार है। इन तमाम घोषणाओं के बावजूद आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बढ़ती महंगाई के बीच किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग को किसी बड़े राहत पैकेज की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हो सकी।
न्यूनतम समर्थन मूल्य
न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने की मांग एक बार फिर टाल दी गई। आयकर छूट सीमा को 5 लाख से बढ़ाकर 7 लाख रुपये किया गया, लेकिन पुरानी टैक्स स्लैब व्यवस्था में बदलाव न होने से मध्यम वर्ग की नाराजगी बनी हुई है।
ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती न होने से परिवहन लागत बढ़ने की आशंका है, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। सब्जी, फल और खाद्य पदार्थ पहले से ही महंगे हैं और बजट के बाद इनके दाम और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
चुनावी राज्यों में बजट को लेकर असंतोष
बजट के तुरंत बाद शेयर बाजार की प्रतिक्रिया ने सरकार के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। निवेशकों को निजी निवेश को प्रोत्साहित करने और उद्योग जगत का भरोसा बढ़ाने वाली नई पहल की उम्मीद थी। हालांकि पीएलआई योजना के विस्तार की बात की गई, लेकिन कॉर्पोरेट टैक्स में राहत न मिलने से उद्योग जगत निराश दिखा। रुपये की कमजोरी से आयात महंगा होने और महंगाई बढ़ने की चिंता भी गहराई है। चुनावी राज्यों में बजट को लेकर असंतोष सबसे ज्यादा नजर आया। बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों को विशेष पैकेज की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें अपेक्षा के अनुरूप कुछ नहीं मिला।
बिहार को मात्र 20 हजार करोड़
बिहार को मात्र 20 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान मिला, जो गंगा सफाई और सड़क परियोजनाओं तक सीमित है। राज्य में बेरोजगारी दर ऊंची बनी हुई है और युवाओं में नाराजगी बढ़ रही है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी विकास और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए बड़े पैकेज की उम्मीद थी, लेकिन बजट में घोषणाएं सीमित रहीं। महाराष्ट्र में मुंबई मेट्रो और समुद्री पुल जैसी परियोजनाओं को कुछ राहत मिली, लेकिन किसानों की कर्जमाफी और जल संकट जैसे मुद्दों पर चुप्पी साध ली गई। झारखंड में आदिवासी कल्याण के साथ कोयला उत्पादन बढ़ाने की योजनाओं ने पर्यावरणीय चिंताओं को जन्म दिया है।
डिजिटल इंडिया
डिजिटल इंडिया के तहत 5जी नेटवर्क विस्तार, स्टार्टअप इंडिया के लिए 50 हजार करोड़ रुपये का फंड, ग्रीन एनर्जी में 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश, महिला सशक्तिकरण योजनाएं और स्किल इंडिया के तहत बड़े प्रशिक्षण लक्ष्य बजट की सकारात्मक झलक पेश करते हैं। रक्षा बजट में 6 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान भी सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
सरकार ने जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 7 प्रतिशत रखा है और राजकोषीय घाटे को 5.1 प्रतिशत पर नियंत्रित रखने का दावा किया है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक मंदी और घरेलू मांग की सुस्ती इन लक्ष्यों को चुनौती दे सकती है।
कुल मिलाकर बजट 2026-27 दीर्घकालिक विकास की योजनाओं से भरा हुआ है, लेकिन तात्कालिक राहत के मोर्चे पर कमजोर साबित हुआ है। बाजार की गिरावट और आम आदमी की निराशा इसकी सबसे बड़ी गवाही है। इंफ्रास्ट्रक्चर और एमएसएमई पर जोर भविष्य में लाभ दे सकता है, लेकिन यदि इसका असर जमीन पर नहीं दिखा तो चुनावी साल में इसका राजनीतिक खामियाजा सरकार को भुगतना पड़ सकता है।
रितेश सिन्हा