‘बाल गोपाल’ कृष्ण लीला और भारतीय जनमानस, परंपरा, संस्कृति और संस्कार

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह (सहज़),हरदा,मध्य प्रदेश

भारतीय संस्कृति केवल नियमों और ग्रंथों का पुंज नहीं है, बल्कि यह जीवन को उत्सव की तरह जीने की एक कला है। इस कला के केंद्र में हैं,भगवान श्रीकृष्ण। कृष्ण केवल एक पौराणिक चरित्र या अवतार मात्र नहीं हैं, वे भारतीय मानस की आत्मा हैं।

बाल्यावस्था की नटखट हरकतों से लेकर महाभारत के युद्ध क्षेत्र में दिए गए गीता के उपदेश तक, श्रीकृष्ण की लीलाएं हमारी सामाजिक परंपराओं, नैतिक मूल्यों और दैनिक संस्कारों का आधार स्तंभ रही हैं। संस्कारों की पहली सीढ़ी,वात्सल्य और बाल लीला भारतीय परिवारों में बच्चे को केवल संतति नहीं माना जाता, बल्कि उसमें ‘बाल गोपाल’ का रूप देखा जाता है। अन्नप्राशन और नामकरण,बच्चे की हर छोटी क्रीड़ा में यशोदा और कृष्ण के वात्सल्य की झलक खोजी जाती है। माखन चोरी का दर्शन,माखन चोरी केवल एक बालक की शरारत नहीं है, बल्कि वह सात्विक प्रेम और निष्छल आनंद का प्रतीक है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि बच्चों का उच्छृंखल बचपन ही घर की असली जीवंतता है। सामाजिक समरसता और प्रकृति प्रेम कृष्ण की लीलाएं किसी बंद राजमहल का हिस्सा नहीं थीं, वे गोकुल, वृंदावन और कुरुक्षेत्र की खुली भूमि पर घटित हुईं। गोवर्धन पूजा, यह परंपरा मनुष्य और प्रकृति के आत्मीय संबंध को दर्शाती है। कृष्ण ने इंद्र के अहंकार को तोड़कर नदियों, पर्वतों और पशुधन (गायों) की पूजा का विधान शुरू किया, जो आज भी हमारे पर्यावरण संरक्षण के संस्कारों को जीवित रखता है।


रासलीला, यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। इसमें भेद-भाव, ऊंच-नीच और जातिगत बंधनों से परे हटकर केवल भक्ति और समर्पण को मुख्य माना गया है। त्यौहारों में स्पंदित होती लीलाएं भारत का शायद ही कोई ऐसा त्यौहार हो जो कृष्ण के रंग में न रंगा हो, जन्माष्टमी,यह केवल व्रत रखने का दिन नहीं, बल्कि घर-घर में झांकियां सजाने, छोटे बच्चों को कन्हैया बनाने और ‘दही हांडी’ के जरिए सामूहिक एकजुटता और साहस के संस्कार सीखने का पर्व है। होली, ब्रज की होली और रंगोत्सव कृष्ण-राधा के प्रेम की वह पावन परंपरा है, जो समाज के सारे वैमनस्य को मिटाकर सौहार्द का रंग घोलती है। जीवन दर्शन और कर्म की प्रेरणा, श्रीमद्भगवद्गीता जहाँ बाल-कृष्ण हमें जीवन में हंसना और उत्सव मनाना सिखाते हैं, वहीं ‘पार्थसारथि’ (अर्जुन के सारथि) कृष्ण हमें जीवन के कठिनतम संघर्षों से लड़ना सिखाते हैं। निष्काम कर्म,”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” का सिद्धांत भारतीय संस्कार का मूल मंत्र है। यह सिखाता है कि कर्तव्य पथ पर परिणाम की चिंता किए बिना दृढ़ रहना ही सच्चा धर्म है।

धर्म और नीति, संकट के समय सही और गलत का चुनाव कैसे किया जाए, यह विवेक हमें कृष्ण के कूटनीतिक और व्यावहारिक जीवन से मिलता है। ‘कृष्ण लीला’ भारतीय परंपरा की वह जीवनदायिनी धारा है जिसने सदियों से हमारी संस्कृति को शुष्क होने से बचाया है। वे हमें सिखाते हैं कि धर्म कोई बोझ नहीं, बल्कि एक आनंदमयी यात्रा है। जब तक भारतीय समाज में वात्सल्य, प्रकृति-प्रेम, उत्सवप्रियता और कर्तव्यनिष्ठा जीवित है, तब तक श्रीकृष्ण और उनकी लीलाएं हमारे संस्कारों में सांस लेती रहेंगी।

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