बेहतर कौन-नकाबपोश नेता या अपराधी नेता ?

निश्चित रूप से यह आमजन के लिए एक गंभीर प्रश्न है। आखिर जनता किनका चुनाव करें। अपराधिक छवि वाले नेता का चुनाव करना अच्छा नहीं लगता तो दूसरी ओर ऐसे राजनेता होते हैं जो चुनाव के बाद फिर नजर ही नहीं आते। जनता को तो बस काम चाहिए, जनता को अपने क्षेत्र का विकास चाहिए, जनता को रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए। क्या फर्क पड़ता है कोई आपराधिक इतिहास वाला व्यक्ति यह सब उपलब्ध करवाने के लिए गंभीर हो तो नकाबपोश से आपराधिक छवि अच्छा-उमाशंकर सिंह

अपने बिहार में 41 आपराधिक केस वाले अनंत कुमार सिंह इस बार भी चुनाव जीत गए हैं. हत्या, हत्या का प्रयास जैसे 30 गंभीर आपराधिक केस दर्ज अगियांव विधानसभा सीट से मनोज मंजिल चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में मुकाबला इतना करीबी और रोचक होगा, किसी ने सोचा नहीं था. इस बार भी कई बाहुबली चुनाव मैदान में थे. भारतीय राजनीति में अपराधिक छवि वाले राजनेताओं के संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। उनकी लोकप्रियता भी दिन ब दिन बढ़ रही है। आज कई आपराधिक छवि वाले राजनेता देश के विभिन्न सदनों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ये राजनेता हमारे देश का भविष्य तय करते हैं, हमारे प्रदेश की नीतियां बनाते हैं। यदि हम बिहार की बात करें तो प्रदेश के करीब सत्तर फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। भारतीय राजनीति में एक कहावत प्रसिद्ध है कि महज आरोप लगने से कोई अपराधी साबित नहीं होता। अपराध सबूत से साबित होता है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि समाज में ऐसे कितने लोग हैं जो बाहुबली राजनेताओं के विरुद्ध गवाही देने की हिम्मत जुटा पाते हैं और बगैर सबूत के यह राजनेता आसानी से अदालत से बरी हो जाते हैं। यदि कहीं कोई अपराध साबित हो भी गया और यह चुनाव लड़ने में अयोग्य हो गए तो फिर अपनी पत्नी या परिजनों को सदन में पहुंचाने में सफल होते हैं। राजनीतिक दल भी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए ऐसे लोगों को या फिर उनके परिजनों को टिकट देने में परहेज नहीं करते। प्रभुनाथ सिंह, आनंद मोहन, सूरजभान सिंह, मुन्ना शुक्ला, पप्पू यादव, सुनील पांडे, राजबल्लभ यादव, प्रहलाद यादव, सुरेंद्र यादव, शहाबुद्दीन, अनंत कुमार सिंह, अखिलेश सिंह, रीतलाल यादव जैसे एक नहीं कई नाम हैं जिनका इस्तेमाल विभिन्न राजनीतिक दलों ने समय समय पर अपने लाभ के लिए किया और कर भी रहे हैं। ऐसा नहीं है कि राजनीतिक लाभ अपराधिक छवि वाले लोग नहीं लेते। अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले लोग राजनीति का इस्तेमाल बखूबी करते हैं। इसका सबसे अधिक लाभ उन्हें ये मिलता है कि पुलिस के डर से भागने वाले इन लोगों को राजनीति में आने के बाद पुलिस का संरक्षण प्राप्त हो जाता है। पुलिस इनकी सुरक्षा में खड़ी होती है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में अब यह आम बात हो गई है। सोंचने वाली बात तो यह है कि आखिर इस तरह के लोग राजनीति में आकर सफल कैसे हो जाते हैं आखिर क्या वजह है कि जनता इन्हें बार बार वोट देकर सदन में भेजती है इनके पास अपार जनसमर्थन होता है, क्या यह भय से या बाहुबल से मुमकिन है? शायद हां या शायद नहीं। बाहुबल से कोई एक बार चुनाव जीत सकता है, दोबारा नहीं, बार बार तो हरगिज नहीं। तो फिर क्या इसका अर्थ यह है कि जनता ऐसे लोगों को पसंद करती है? सबसे पहले मै बात करता हूँ जन अधिकार पार्टी के संस्थापक सांसद पप्पू यादव की। राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव आपराधिक छवि के राजनेता रहे हैं। विधायक अजीत सरकार हत्याकांड के अभियुक्त रहे। निचली अदालत से इन्हें उम्र कैद की सजा भी मिली, सर्वोच्चय न्यायालय ने इन्हें बरी किया। पप्पू यादव 1990 में विधायक बने, फिर 1991 से लगातार 2024 तक सांसद बने। 2015 के बेस्ट परफॉर्मिंग सांसद रहे हैं । वहीं उनकी पत्नी रंजीता रंजन सुपौल से सांसद रह चुकि है। इस तरह की उनकी जीत और उनकी पार्टी का बिहार में बेस बन जाना निश्चित रूप से यह साबित करती है कि उन्हें क्षेत्र में जनता का समर्थन प्राप्त है हालाँकि 2020 विधानसभा में वोट लाना पर सिट नहीं जितना सवाल पैदा करता है पर, आज पप्पू यादव जहां कहीं भी हैं, उनके साथ स्थानीय लोगों की भीड़ खड़ी होती है। आज पूरे बिहार में पप्पू यादव सबसे सक्रिय हैं, जो संपूर्ण प्रदेश में घूम घूम कर जन समस्याओं से रूबरू होते रहते हैं। अब मैं बात करता हूँ पूर्व सांसद और लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सूरजभान सिंह इनका भी पुराना आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। उन पर हत्या सहित कई मामले दर्ज हैं। जेल में ही रहते मोकामा विधानसभा से वह विधायक बने। तब पूरे मोकामा की जनता ने उन्हें अपार जनसमर्थन दिया और भारी बहुमत से उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की। मोकामा वासियों ने इस जीत को अपनी जीत समझा। फिर लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर वह बलिया से सांसद चुने गए। उनकी पत्नी वीणा देवी मुंगेर लोकसभा से सांसद रह चुकि हैं। सूरजभान सिंह अपने क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरे बिहार में अच्छे खासे लोकप्रिय हैं इसका उदाहरन देखना है तो इस बार के विधानसभा में अपने पार्टी का प्रमुख चेहरा थे । उन्हें देखने, उनके साथ फोटो खिंचवाने, उनके साथ खड़े होने के लिए लोग लालायित रहते हैं। निश्चित रूप से यह उनका भय नहीं है। उन्हें जनता का समर्थन प्राप्त है। पूर्व सांसद आनंद मोहन शिवहर से सांसद रहे हैं। वर्तमान में गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। उनकी पत्नी लवली आनंद भी सांसद रह चुकी हैं। हाल ही में उनका पुत्र बिधायक बने है। आनंद मोहन अपराधिक छवि के होते हुए भी अपने क्षेत्र में खासे लोकप्रिय रहे हैं। वह “रोबिन हुड“ के नाम से अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध रहे हैं। उन्हें भी जनता का अपार जनसमर्थन प्राप्त रहा है। अब मैं बात करता हूँ 2019 में रोड शो और सरकार के खिलाफ बयान देकर चर्चा में आने वाले मोकामा के निर्दलीय विधायक अनंत कुमार सिंह आपराधिक छवि के राजनेता माने जाते हैं। वो छोटे सरकार के नाम से भी जाने जाते हैं, इन्हें कभी नीतीश कुमार की सरकार का संरक्षण प्राप्त था। पूरे क्षेत्र में यह चर्चा भी आम है कि कभी नीतीश कुमार अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए अनंत कुमार सिंह के आगे नतमस्तक हुआ करते थे। जब नीतीश कुमार को मोकामा विधानसभा से जीत सुनिश्चित करने के लिए मजबूत प्रत्याशी की तलाश थी, तब उन्होंने अनंत कुमार सिंह का सहारा लिया। अनंत कुमार सिंह उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे और लगातार मोकामा से विधायक बनने में सफल रहे। तीन बार वह जदयू के टिकट से विधायक बने। सबसे खास बात यह कि हर चुनाव में उनके जीत का अंतर बढ़ता गया। अनंत कुमार सिंह पूरे क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हैं। उन्हें अपार जनसमर्थन प्राप्त है, क्षेत्र में जब वह निकलते हैं तो उन्हें देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। कुछ ऐसी ही हालत मोकामा के ललन सिंह, मशरक के प्रभुनाथ सिंह, वैशाली के मुन्ना शुक्ला और कई अपराधिक छवि वाले राजनेताओं की है। स्थिति यह है कि बड़े से बड़े राजनेताओं की चमक इन आपराधिक छवि वाले राजनेताओं के सामने फीकी पड़ रही है। इन राजनेताओं का ग्लैमर ऐसा है कि ये बड़े से बड़े राजनेताओं को भी हराने की क्षमता रखते हैं। प्रदेश के विकास के लिए, प्रदेश की तरक्की के लिए यह सही है या गलत यह समझ पाना मुश्किल हो रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में जाकर जनता से बातचीत करने पर, जनता के विचार लेने पर एक बात तो कही ही जा सकती है कि आपराधिक छवि वाले राजनेता कई राजनेताओं की छुट्टी कर सकते हैं। करीब करीब सभी क्षेत्रों की जनता ने बताया कि वह ऐसे अपराधिक छवि वाले राजनेताओं को पसंद करते हैं। जनता का कहना है कि आपराधिक छवि वाले राजनेताओं से मिलना और उनसे कोई काम करवाना ज्यादा आसान होता है। ये राजनेता जनता की बातों को गंभीरता से लेते हैं और तत्काल कार्रवाई करते हैं। जनता को एक ही काम के लिए बार बार टहलाना ये पसंद नहीं करते। बात चाहे मधेपुरा की हो, शिवहर की हो, मुंगेर की हो, मोकामा की या फिर कुछ अन्य क्षेत्रों की जहां अपराधिक छवि के विधायक या सांसद हैं। देखने में आ रहा है कि अपराधिक छवि वाले राजनेता अपनी छवि में बदलाव करना चाहते हैं। वह खुद को बदलना चाहते हैं। वो लंबे समय तक राजनीति करना चाहते हैं, उन्हें अगले चुनाव में हार का डर रहता है और यही वजह है कि वह अधिक से अधिक जनता के कामों को प्राथमिकता देते हैं। ये आमजन के संपर्क में बने रहना चाहते हैं। एक यह भी वजह है कि अपराध की दुनिया में रहने के दौरान ये समाज से कटे कटे रहते हैं, जहां तहां छुपे रहते हैं और जब यह सार्वजनिक जीवन में आते हैं तो इनकी एक झलक पाने के लिए आमजन टूट पड़ते हैं। ऐसे राजनेता ज्यादातर सत्ता के साथ होते हैं। इनके पास अकूत संपत्ति होती है। जब ये कहीं निकलते हैं तो इनके साथ महंगी महंगी गाड़ियों का काफिला होता है। जिन्हें देखने का आकर्षण आमजन में होता है। समाज में अपना दबदबा बनाने के लिए भी कई लोग उनके साथ होते हैं। उनके साथ फोटो खिंचवाना, इनके साथ दिखना लोग पसंद करते हैं। ऐसे राजनेताओं को पसंद करने की एक वजह यह भी होती है कि यदि किसी जनता के काम के लिए ये किसी अधिकारी को कहते हैं तो अधिकारी इनका काम प्राथमिकता के तौर पर करते हैं। जबकि एक आम राजनेता के बात को अधिकारी उतनी तरजीह नहीं देते हैं। ऐसे कई राजनेता हैं जिनकी छवि साफ सुथरी है, परंतु क्षेत्र में जनता से कटे रहते हैं, क्षेत्र के विकास का काम सुचारू रूप से नहीं करते हैं। ऐसे राजनेता बस अपनी कुर्सी से चिपके रहने के लिए राजनीति करते हैं। वर्तमान हालात को देखते हुए यह समझ पाना काफी मुश्किल होता जा रहा है कि हमारे लिए कौन से राजनेता ज्यादा बेहतर हैं। वो जो अपराधिक छवि के होते हुए भी जनसमस्या के समाधान के लिए गंभीर हैं या फिर वो जो साफ सुथरी छवि के तो हैं परंतु उन्हें जन समस्या से कोई लेना देना नहीं है। हमारे लिए आखिर कौन राजनेता आवश्यक है, वो जो आपराधिक छवि के हैं परंतु क्षेत्र के विकास के लिए लगे हुए हैं या फिर वो जिनकी छवि साफ सुथरी है परंतु वो सिर्फ चुनाव के समय ही क्षेत्र में नजर आते हैं। निश्चित रूप से यह आमजन के लिए एक गंभीर प्रश्न है। आखिर जनता किनका चुनाव करें। अपराधिक छवि वाले नेता का चुनाव करना अच्छा नहीं लगता तो दूसरी ओर ऐसे राजनेता होते हैं जो चुनाव के बाद फिर नजर ही नहीं आते। जनता को तो बस काम चाहिए, जनता को अपने क्षेत्र का विकास चाहिए, जनता को रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए। क्या फर्क पड़ता है कोई आपराधिक इतिहास वाला व्यक्ति यह सब उपलब्ध करवाने के लिए गंभीर हो तो नकाबपोश से आपराधिक छवि अच्छा।

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