डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

भारतीय संस्कृति उत्सवों और त्योहारों की एक अनवरत धारा है, जहाँ प्रत्येक पर्व के पीछे जीवन दर्शन, नैतिक मूल्य और सामाजिक सामंजस्य का एक गहरा संदेश छिपा होता है। इन्हीं त्योहारों में ‘रक्षाबंधन’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम का उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारी उस गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है जो संबंधों की पवित्रता को केंद्र में रखती है। आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य में रक्षाबंधन केवल एक पुरानी परंपरा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी सामाजिक और नैतिक ‘ज़रूरत’ भी बन चुका है। सांस्कृतिक परंपरा की गहरी जड़ें. ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण से देखें तो रक्षाबंधन का धागा हमेशा केवल शारीरिक सुरक्षा का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह नैतिक और आत्मिक संकल्प का सूचक रहा है।

पौराणिक संदर्भ, श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग हो या राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा, रक्षाबंधन का धागा हमेशा न्याय, सम्मान और अटूट विश्वास का प्रतीक बना। ऐतिहासिक संदर्भ,,,इतिहास में रानी कर्मवती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजने का उल्लेख मिलता है, जिसने इस पर्व को धर्म और जाति की सीमाओं से परे उठाकर एक मानवीय कर्तव्य का रूप दिया। सामाजिक समरसता,,,प्राचीन काल में रक्षा सूत्र केवल बहनों द्वारा भाइयों को ही नहीं, बल्कि गुरुओं द्वारा शिष्यों को, और समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा एक-दूसरे को सुरक्षा और सहयोग के वादे के रूप में बाँधा जाता था। आधुनिक दौर में रक्षाबंधन की जरूरत, समय के साथ समाज की संरचना बदली है। एकल परिवारों के बढ़ते चलन और डिजिट्ल दुनिया की व्यस्तताओं ने इंसानी रिश्तों के बीच एक अदृश्य दूरी पैदा कर दी है। ऐसे में रक्षाबंधन की प्रासंगिकता और ज़रूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।

रिश्तों का पुनर्नवीकरण,, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपनों के लिए समय नहीं निकाल पाते। रक्षाबंधन एक ऐसा अवसर है जो हमें अपनी जड़ों, परिवार और बचपन की यादों से फिर से जोड़ता है। नारी सुरक्षा और सम्मान का संकल्प, आज के समाज में जहाँ महिलाओं की सुरक्षा एक संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण विषय है, वहाँ रक्षाबंधन केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा तक सीमित नहीं रह सकता। यह हर पुरुष को समाज की प्रत्येक महिला के प्रति सम्मानजनक, सुरक्षात्मक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की याद दिलाता है। एकाकीपन से मुक्ति बढ़ते तनाव और सामाजिक अलगाव के दौर में यह विश्वास होना कि कोई ऐसा व्यक्ति है जो हमारे साथ हर परिस्थिति में खड़ा है, व्यक्ति को मानसिक संबल और सुरक्षा की भावना प्रदान करता है। परंपरा से आगे,समय के साथ बदलता स्वरूप आज रक्षाबंधन का दायरा विस्तृत हुआ है। अब यह केवल जैविक भाई-बहन तक सीमित नहीं है। बहनें आपस में एक-दूसरे को राखी बाँधकर एक-दूसरे का सहारा बनने का संकल्प ले रही हैं। सीमा पर तैनात जवानों को राखी भेजना हो या पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षों को ‘रक्षा सूत्र’ बाँधना—यह पर्व अब सामाजिक जिम्मेदारी और व्यापक चेतना का माध्यम बन रहा है। रक्षाबंधन का रेशमी धागा केवल कलाई पर सजाने का आभूषण नहीं है,यह एक सामाजिक अनुबंध है। हमारी परंपरा ने हमें यह अमूल्य उपहार दिया है, और आज के विघटित होते समाज में अपनों को जोड़े रखने, नैतिक मूल्यों को जीवित रखने और एक सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए यह हमारी अनिवार्य ज़रूरत है। इस परंपरा को इसके सच्चे अर्थों में बनाए रखना ही हमारे समृद्ध सांस्कृतिक भविष्य की गारंटी है।



