मध्य प्रदेश के इंदौर में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच एक बड़ा राजनीतिक पोस्टर वॉर और वैचारिक विवाद छिड़ गया है।

इस कार्यक्रम में राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर छात्रों से संवाद किया, लेकिन सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने इसे लेकर अलग-अलग दावे और नैरेटिव पेश किए हैं। देखते है कांग्रेस और राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’का पक्ष। राहुल गांधी ने इस कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं और छात्रों से जुड़े गंभीर मुद्दों जैसे कि प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, एग्जामिनेशन सिस्टम की विफलता और बेरोजगारी पर संवाद करना बताया। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि वर्तमान में देश का सिस्टम छात्रों के विचारों को दबाना चाहता है और वह सवाल पूछने वाले छात्रों की जगह बिना सवाल किए सब कुछ स्वीकार करने वाले लोगों को बढ़ावा दे रहा है। कांग्रेस नेताओं का आरोप था कि स्थानीय प्रशासन और सत्तारूढ़ भाजपा ने कार्यक्रम के लिए कड़ी शर्तें लगाकर और जगह को लेकर अड़चनें पैदा कर इसे रोकने की कोशिश की,

लेकिन इसके बावजूद युवाओं ने भारी संख्या में भाग लिया। वहीं इसी वक्त भाजपा और विरोधियों का ‘झूठ की गूंज’ चल रहा था। राहुल गांधी के इंदौर दौरे से ठीक पहले शहर के कई प्रमुख चौराहों पर “झूठ की गूंज पर होगी सत्य की विजय” लिखे पोस्टर लगाए गए। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर ‘झूठ की गूंज’ नाम से एक अभियान चलाया गया, जिसमें राहुल गांधी द्वारा भाषण के दौरान किए गए विभिन्न दावों का फैक्ट-चेक करने का दावा किया गया। भाजपा नेताओं जैसे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और अन्य प्रवक्ताओं का आरोप है कि कांग्रेस छात्रों के मुद्दों का राजनीतिकरण कर रही है और देश में शिक्षा को लेकर केवल झूठ और भ्रम फैला रही है। शिवसेना प्रवक्ता शाइना एनसी सहित कई नेताओं ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम के मंच पर प्रधानमंत्री की दिवंगत माताजी को लेकर मिमिक्री या टिप्पणियां की गईं, जिससे छात्रों के असली मुद्दे पीछे छूट गए और यह मंच केवल राजनीतिक मर्यादाओं के उल्लंघन का जरिया बनकर रह गया।

इस पूरे विवाद ने यह साफ कर दिया है कि युवा और छात्र राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुके हैं। जहाँ एक तरफ विपक्ष छात्रों की समस्याओं को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार और भाजपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि युवाओं के नाम पर केवल राजनीतिक एजेंडा चलाया जा रहा है। दोनों पक्षों की इस खींचतान से साफ है कि आने वाले समय में रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे भारतीय राजनीति में और अधिक आक्रामक रूप लेने वाले हैं।




