सरकार मस्त, छात्र पस्त-बिहार के छात्रों की कहानी

बिहार के छात्रों के भविष्य के साथ लगातार खिलवाड़ हो रहा है। विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। जहां शिक्षक उपलब्ध है वहाँ भी गुणवत्ता का अभाव साफ दिखाई पड़ता है। जिसका प्रभाव राज्य भर के लाखों छात्रों पर हर वर्ष पड़ रहा है। बिहार बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षाओं में व्यापक कदाचार और परिणामों में धांधली व्याप्त है ।

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति यह नाम पिछले कुछ वर्षों से बड़ा ही चर्चित रहा। कभी परीक्षा में व्यापक कदाचार तो कभी टॉपर्स तो कभी रिजल्ट में भारी गड़बड़ी को लेकर भी बिहार विद्यालय परीक्षा समिति लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहा। बिहार के छात्रों के भविष्य के साथ लगातार खिलवाड़ हो रहा है। विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। जहां शिक्षक उपलब्ध है वहाँ भी गुणवत्ता का अभाव साफ दिखाई पड़ता है। जिसका प्रभाव राज्य भर के लाखों छात्रों पर हर वर्ष पड़ रहा है। बिहार बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षाओं में व्यापक कदाचार और परिणामों में धांधली के बाद बोर्ड के कुछ समय पहले तक अध्यक्ष पद का प्रभारी पटना के आयुक्त आनंद किशोर को दिया गया। आनंद किशोर ने आते ही परीक्षा के दौरान होने वाले नकल पर नियंत्रण तो कर लिया परंतु अभी भी परीक्षा के परिणामों में धांधली थमने का नाम नहीं ले रहा है। कभी रूबी राय, जिन्हें अपने विषय का नाम तक नहीं पता होता है, उसे बोर्ड द्वारा प्रथम यानी बीएसईबी के टॉपर घोषित किया जाता है, तो कभी 42 वर्ष की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा देने वाले गणेश कुमार को टॉपर घोषित किया जाता है।

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की विडंबना

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की विडंबना यह है कि परीक्षा से पूर्व बोर्ड के अध्यक्ष आनंद किशोर ने कहा था कि विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति न्यूनतम 75% होना अनिवार्य है। जबकि वर्ष 2017-18 में प्रथम स्थान पाने वाली कल्पना कुमारी, जो नीट के परीक्षा में भारत टॉप की हैं, का विद्यालय में उपस्थिति काफी कम होने के बावजूद बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के टॉपर घोषित किए गए हैं। मतलब यह है कि जब 75% उपस्थिति की अनिवार्यता थी तो कल्पना कुमारी के परीक्षा के लिए फॉर्म किस आधार पर स्वीकार किए गए। इन सभी के बावजूद NEET के भारत टॉपर होने वाली कल्पना कुमारी के बिहारी होने पर हमें गर्व है।

शिक्षा विभाग के कार्यशैली

परंतु राज्य की शिक्षा विभाग के कार्यशैली पर हमें प्रश्न उठाना आवश्यक प्रतीत हो रहा है। क्योंकि जब बिहार बोर्ड द्वारा 75% की अनिवार्यता को दरकिनार करते हुए विद्यालय से फॉर्म कैसे भरे गए? इसकी जांच क्यों नहीं की जा रही है? क्या छात्रों के उपस्थिति फर्जी बनाई जाती है? कहा यह भी जाता है कि बाहर रहकर पढ़ाई कर रहे छात्रों के विद्यालयों में उपस्थिति बनाने के एवज में एक मोटी रकम की मांग की जाती है। शिक्षा विभाग क्यों नहीं इस घोटाले की जांच कर रही है? क्या शिक्षा विभाग को ऐसी कारगुजारियों की खबर नहीं है? फर्जी उपस्थिति बनाकर लोग परीक्षा में शामिल होते हैं। इसके एवज में विद्यालय और महाविद्यालयों के कर्मचारी छात्रों से एक मोटी रकम की मांग करते हैं। बिहार के कभी शिक्षा विभाग के मंत्री रहे डॉ. कृष्णनंदन वर्मा से जब फॉर्म भरने के लिए न्यूनतम उपस्थिति के विषय में पूछा गया था तो उन्होंने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया था । उधर, बोर्ड के अध्यक्ष आनंद किशोर ने उपस्थिति मामला तूल पकड़ता देख परीक्षा के लिए उपस्थिति की अनिवार्यता से संबंधित अपने ही बयान पर झूठ बोल दिया था और कहा कि परीक्षाओं के लिए उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। ऐसा बोलकर आनंद किशोर ने मामले को ठंडा करने का एक सफल प्रयास किया।

इस बार भी परीक्षा परिणामों में व्यापक गड़बड़ी का आरोप

लेकिन दूसरी तरफ, कई वर्षों से ऐसा देखा जा रहा है कि रिजल्ट निकलते ही छात्र रिजल्ट में धांधली का आरोप लगाकर इंटरमीडिएट कौंसिल के मुख्य द्वार पर हंगामा शुरू करते हैं। पिछले बार भी परीक्षा परिणामों में व्यापक गड़बड़ी का आरोप बिहार विद्यालय परीक्षा समिति पर लगा है। जिसके बाद छात्र उग्र होकर बिहार विद्यालय परीक्षा समिति उच्च माध्यमिक के मुख्य द्वार पर जबरदस्त हंगामा कर मुख्य द्वार को तोड़ दिया। उस हंगामे का नेतृत्व कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्र संघ अध्यक्ष विकास यादव बॉक्सर ने किया था। जिसके बाद पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज भी किया। साथ ही साथ कोतवाली पुलिस ने छात्रों पर विधि व्यवस्था में गड़बड़ी करने के मामला दर्ज कर 4 छात्रों को जेल भेज दिया था । सवाल यह कि छात्रों को जेल भेजना समस्या का निदान है या शिक्षा माफिया पर कठोर कार्रवाई करना? रिजल्ट में गड़बड़ी का आलम यह है कि नीट और आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में अच्छे रैंक लाने वाले छात्रों का भी 2 या उससे अधिक विषयों में फेल बताया गए हैं। फेल भी इस कदर की किसी को (0) शून्य तो किसी को 1 या 2 अंक ही दिए गए हैं। कुछ परीक्षार्थियों ने अपना रिजल्ट दिखाया तो उसे कुल अंक  से भी ज्यादा अंक दिए गए हैं। कुछ छात्रों को 35 अंक में से 38 अंक दिए गए हैं। 

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का विवादों से चोली-दामन का रिश्ता

पिछले कई वर्षों से देखा जा रहा है। लगातार विवादों में रहा बिहार बोर्ड में सब कुछ ऑनलाइन करने के लिए तैयारी चल रही है। इसी क्रम में ऑनलाइन परीक्षा फॉर्म भरने वाले छात्रों को परीक्षा के फौरन बाद बोर्ड के दलालों द्वारा उन्हें फोन कर अमुक विषय में फेल होने की जानकारी दी जाती है। जिसके बाद उनसे रिजल्ट में सुधार करवाने के लिए पैसे की मांग भी की जाती है। इस विषय पर पटना के कोतवाली थाने में मामला भी दर्ज किया जा चुका है। मामले दर्ज किए जाने के बावजूद पटना पुलिस की शिथिलता पूर्ण रवैया के कारण जांच अभी तक आगे नहीं बढ़ी है, नहीं इस मामले में अब तक किसी की गिरफ्तारी हो पाई है। मतलब बोर्ड से डाटा चोरी कर दलालों तक पहुंचाने के काम में भी बोर्ड अव्वल रहा है। 

राज्य में शिक्षा के स्तर में गिरावट लिए केवल सरकार को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है

देशभर में और भी कई बोर्ड द्वारा मैट्रिक और इंटरमीडिएट स्तर के परीक्षाओं को संचालित किया जाता है। उनके भी परिणाम आते हैं। उनमें भी छात्र फेल होते हैं। लेकिन उनके यहां इस कदर हंगामा नहीं बचता। कारण यह है कि आईसीएससी और सीबीएसई के परीक्षार्थियों को विद्यालय स्तर पर पढ़ाई के उचित साधन मुहैया कराए जाते हैं। जबकि बिहार के शिक्षा विभाग द्वारा न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा छात्रों को दिया जाता है और ना ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रति छात्रों के परिजन जागरूक दिखते हैं। मतलब साफ है कि राज्य में शिक्षा के स्तर में गिरावट लिए केवल सरकार को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। इसके लिए राज्य की जनता और छात्रों के परिजन भी जिम्मेवार हैं। खैर,बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के रिजल्ट पर हंगामा क्यों किया जाता है?क्या शिक्षा माफिया के चंगुल से बिहार बोर्ड आजाद हो पाएगा?क्या राजधानी में चल रहे ट्यूशन के संचालकों का बोर्ड पर आधिपत्य है? राज्य में हर वर्ष लाखों छात्रों के भविष्य के साथ जो खिलवाड़ किया जा रहा है, इसका जिम्मेवार कौन है? क्या बोर्ड के अध्यक्ष या राज्य के शिक्षा मंत्री?

हर बार राजनीतिक समर्थन

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति उच्च माध्यमिक कार्यालय के बाहर हुए हंगामे को पिछले वर्ष की भांति हर बार राजनीतिक समर्थन दिया जाता रहा है । महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बिना विद्यालयीय व्यवस्था सुदृढ़ किए परीक्षा के परिणामों में सुधार का अनुमान सरकार कैसे लगा सकती है? 50% के आसपास के रिजल्ट को अच्छा रिजल्ट बता कर शिक्षा विभाग अपना पीठ खुद थपथपा रही है। राज्य सरकार एवं बिहार बोर्ड को अन्य बोर्ड से कुछ सीखना चाहिए। अन्य राज्यों में व्यवस्था काफी सुदृढ़ होने की वजह से ही परीक्षा परिणाम काफी अच्छे होते हैं। उदाहरण के रूप में सीबीएसई और आईसीएसई तथा अन्य राज्यों की बोर्ड के परिणाम को देखा जा सकता है। बिहार बोर्ड का विवाद उनका साथ नहीं छोड़ रही है। आपको याद ही होगा मैट्रिक के परीक्षा परिणाम 20 जून को आने वाले थे, लेकिन गोपालगंज के एक मूल्यांकन केंद्र से 213 बंडल मूल्यांकित कॉपियां गायब हो गई थी ।

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