सेंसेक्स में 6 लाख करोड़ की चपत: किसकी अर्थव्यवस्था मज़बूत है, सरकार?

पिछले दिनों शेयर बाज़ार में आई बेचैनी ने महज़ इंडेक्स को नहीं, करोड़ों भारतीयों के भरोसे को भी झकझोर दिया। बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का बाज़ार पूंजीकरण एक ही दौर में लगभग 6 लाख करोड़ रुपये तक घट गया, जबकि 2026 की शुरुआत से अब तक कुल निवेशक संपत्ति में 15 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की कटौती दर्ज की जा चुकी है।

सवाल यह है कि जब सत्ता गलियारों से “मज़बूत अर्थव्यवस्था” का जयघोष होता है, तब बाज़ार बार-बार घुटनों पर क्यों आ जाता है?

सेंसेक्स ने दिसंबर 2025 में लगभग 86,159 की ऊँचाई छुई थी, निफ़्टी भी 26,373 के रिकॉर्ड के आसपास पहुँचा था; वहीं अब दोनों सूचकांक अपने शिखर से हज़ारों अंकों की गिरावट के साथ तीन महीने के निचले स्तरों के आसपास फिसल गए हैं। टीवी स्टूडियो इसे “सामान्य करेक्शन” बता रहे हैं, पर आम निवेशक के लिए यह सामान्य नहीं—उसके पोर्टफोलियो में 10–20 प्रतिशत तक का घाटा एक झटके में दर्ज हुआ है। म्यूचुअल फंड SIP, डायरेक्ट इक्विटी और रिटायरमेंट फंड—जिन्हें “वेल्थ क्रिएशन” का आधुनिक मंत्र बनाकर बेचा गया—आज उसी मध्यमवर्गीय परिवार की चिंता का कारण हैं जो बच्चों की पढ़ाई, घर की EMI और बुज़ुर्ग माता-पिता की दवा के लिए इन निवेशों पर भरोसा कर बैठा था। यह केवल बाज़ार की अस्थिरता नहीं, मिडिल क्लास के भविष्य पर सीधा वार है।

2026 की शुरुआत सिर्फ 20 दिनों में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय बाज़ार से 32 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा निकाल चुके हैं, जबकि दिसंबर 2025 में भी लगभग 34 हज़ार करोड़ की भारी बिकवाली हुई थी। बिज़नेस पोर्टल्स के मुताबिक, एक ही सत्र में 9–10 लाख करोड़ रुपये तक की मार्केट कैपिटलाइजेशन मिट गई, जो दबे हुए अविश्वास की खुली घोषणा है। विदेशी निवेशक जब भारत से पैसा निकालते हैं, तो यह सिर्फ वैश्विक परिस्थिति का परिणाम नहीं होता; वे नीति जोखिम, रेग्युलेटरी अनिश्चितता और राजनीतिक संदेशों को भी तौलते हैं। टैक्स नियमों में बार-बार उलटफेर, सख़्ती और नरमी का चयनित इस्तेमाल, और हर आर्थिक निर्णय पर चुनावी रंग—ये सब मिलकर यह संकेत भेजते हैं कि यहाँ नीतियाँ स्थायी नहीं, मौक़ापरस्त हैं।घरेलू निवेशक की फँसी हुई उम्मीदघरेलू संस्थागत निवेशक—LIC, म्यूचुअल फंड—कभी-कभी “डिप में खरीद” कर बाज़ार को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब गिरावट व्यापक और लगातार हो, तो उनके सहारे पूरा पहाड़ नहीं थमा रह सकता।

क्रैश के हफ्ते में लगभग हर सेक्टोरल इंडेक्स—बैंकिंग, रियल्टी, ऑटो, मेटल, एनर्जी—लाल निशान में बंद हुआ, जिससे स्पष्ट हो गया कि निवेशक के पास बचने की कोई सुरक्षित पनाहगाह नहीं थी, सबसे ज़्यादा चोट उस नए खुदरा निवेशक को लगी जो पिछले तीन-चार साल में पहली बार शेयर बाज़ार में आया था। छोटे शहरों के युवाओं ने मोबाइल ऐप के ज़रिये ट्रेडिंग शुरू की, SIP को लगभग “FD से बेहतर और सुरक्षित” समझ लिया; अब वही लोग हर दिन पोर्टफोलियो की घटती वैल्यू देखकर मानसिक दबाव में हैं। रिस्क की असली किताब उन्हें कभी पढ़ाई ही नहीं गई। मज़बूत किस बात से हैं?

सरकार, उसके प्रवक्ता और समर्थक लगातार एक ही लाइन दोहराते रहे हैं—“भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, बुनियाद मज़बूत है।” लेकिन अगर बुनियाद इतनी ही मज़बूत होती, तो साल की शुरुआत में ही 15 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की संपत्ति क्यों मिटती?क्यों निफ़्टी और सेंसेक्स अपने शिखर से इतने कम समय में हज़ारों अंकों की गिरावट दर्ज करते? हक़ीक़त यह है कि जीडीपी की चमकदार दरों के पीछे खपत में सुस्ती, रोज़गार की अनिश्चितता और असमानता की गहरी खाई छिपी है। कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के मुनाफ़े रिकॉर्ड स्तर पर हैं, जबकि छोटे व मध्यम उद्योग कर्ज, लागत और मांग की त्रासदी में फँसे हुए हैं। जब विकास असंतुलित हो, तो इंडेक्स की ऊँचाई भी खोखली रहती है—पहली ही तेज़ हवा में हिलने लगती है।

नीति-निर्माताओं से सीधे सवालयह क्रैश सिर्फ “बाजार का स्वभाव” कहकर टालने लायक नहीं, क्योंकि:क्या पूंजी बाज़ार पर असर डालने वाली नीतियों—जैसे टैक्स, कैपिटल गेन नियम, रेग्युलेटरी मानदंड—में पांच-दस साल की स्थिरता का कोई रोडमैप है, या हर बजट के साथ नया प्रयोग होगा?क्या विदेशी पूँजी को यह भरोसा दिया गया है कि भारत चुनावी मौसम से ऊपर उठकर नीति स्पष्टता बनाए रखेगा, या संकेत उलटे जा रहे हैं? छोटे निवेशकों को वास्तविक रिस्क बताने, गलत वादा करने वाले फाइनेंस इन्फ्लुएंसर्स और ओवर-लीवरेज्ड प्रोडक्ट्स पर अंकुश लगाने के लिए रेग्युलेटर कितनी गंभीरता से काम कर रहे हैं? जब इन प्रश्नों के जवाब में सिर्फ “अस्थायी गिरावट” और “लॉन्ग टर्म में सब ठीक” जैसे घिसे-पिटे जुमले मिलते हैं, तो समझ लीजिए कि सत्ता को बाज़ार की गहराई से ज़्यादा अपनी इमेज की चिंता है।

दिसंबर 2025 का सेंसेक्स उच्चतम स्तर: लगभग 86,159 अंक 20 जनवरी 2026 के आसपास सेंसेक्स स्तर: क़रीब 82,180 अंक (लगभग 5,000 अंकों की गिरावट)2026 की शुरुआत से निवेशक संपत्ति में गिरावट: 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक एक सप्ताह में अनुमानित गिरावट (सबसे खराब सप्ताह): लगभग 15 लाख करोड़ रुपये (लगातार पाँच दिन की बिकवाली)एक दिन में अनुमानित अधिकतम मार्केट कैप मिटना: 9–10 लाख करोड़ रुपये के बीचजनवरी 2026 में FPI बिकवाली: 32,000 करोड़ रुपये से अधिक (दिसंबर 2025 में लगभग 34,000 करोड़ रुपये) अगर सरकार इस चपट को भी “सिर्फ तकनीकी गिरावट” कहकर नज़रअंदाज़ करेगी, तो अगली बार सिर्फ इंडेक्स नहीं, संस्थागत भरोसा भी टूटेगा। आवश्यकता है कि पूंजी बाज़ार के लिए टैक्स और रेग्युलेटरी ढांचा स्थिर और पारदर्शी बनाया जाए, विदेशी व घरेलू दोनों निवेशकों से खुले संवाद के साथ स्पष्ट रोडमैप साझा किया जाए और छोटे निवेशकों के लिए मज़बूत वित्तीय साक्षरता अभियान चलाया जाए।

6 लाख करोड़ की चपत कोई मामूली घटना नहीं है। यह याद दिलाती है कि यदि अर्थनीति सूचकांकों की चमक पर टिकी रहे और आम नागरिक के भरोसे को नज़रअंदाज़ करे तो एक दिन वही नागरिक इस “मज़बूत अर्थव्यवस्था” के नारे पर सबसे बड़ा अविश्वास मत देगा—फिर न सेंसेक्स संभलेगा, न सियासी ग्राफ़।

रितेश सिन्हा

Change Language