सोशल मीडिया के कंटेंट को ‘उड़ाने’ की सरकारी होड़ यदि केवल अफवाहों और नफरत को रोकने तक सीमित है, तो देश इसे स्वीकार करेगा। लेकिन यदि इसका इस्तेमाल नागरिकों की असहमति को दबाने और अपनी कमियों को छुपाने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जाएगा, तो यह देश की लोकतांत्रिक आत्मा पर चोट होगी।

डिजिटल क्रांति के इस दौर में सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है। आज यह आम नागरिक की आवाज, सूचनाओं का सबसे तेज माध्यम और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बन चुका है। लेकिन हाल के वर्षों में दुनिया भर में, और विशेष रूप से भारत में, एक नई प्रवृत्ति देखी जा रही है सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंटेंट को ब्लॉक करने, हटाने या अकाउंट्स को सस्पेंड करने की कार्रवाई। जब फेसबुक, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सरकारी आदेशों के बाद धड़ाधड़ कंटेंट ‘उड़ाया’ जाने लगता है, तो एक बड़ा सवाल खड़ा होता है, क्या अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है? क्या देश की जनता को अब डिजिटल स्पेस में भी डर के साये में जीना होगा?

पिछले कुछ समय से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है। इस कानून के तहत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के हित में किसी भी डिजिटल कंटेंट को ब्लॉक करने का अधिकार है। समस्या कानून से नहीं, बल्कि इसके इस्तेमाल के तौर-तरीकों से पैदा हो रही है। अक्सर देखा गया है कि जब भी देश में कोई बड़ा आंदोलन (जैसे छात्रों की गूंज ,कॉकरोच और किसान आंदोलन), सांप्रदायिक तनाव या सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना होती है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को विशिष्ट हैशटैग, वीडियो या पोस्ट हटाने के गोपनीय आदेश जारी कर दिए जाते हैं। कई बार पत्रकारों, एक्टिविस्टों और विपक्षी नेताओं के हैंडल तक बंद कर दिए जाते हैं। कंटेंट को इस तरह गायब किया जाना आम जनता के मन में यह संदेश देता है कि सत्ता के खिलाफ बोलना अब सुरक्षित नहीं है। इस पूरे विमर्श में सरकार का अपना एक मजबूत पक्ष है।
सरकार का तर्क है कि सोशल मीडिया पर ‘फ्री स्पीच’ (मुक्त अभिव्यक्ति) के नाम पर ‘हेट स्पीच’ (नफरती भाषण), डीपफेक, फेक न्यूज और देश विरोधी एजेंडे को बढ़ावा दिया जा रहा है। इंटरनेट के इस दौर में एक झूठी अफवाह या भड़काऊ पोस्ट चंद सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है, जिससे दंगे भड़क सकते हैं या कानून-व्यवस्था ठप हो सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक शांति बनाए रखने के लिए सरकार का डिजिटल स्पेस पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाना जायज ठहरता है। लेकिन चुनौती तब शुरू होती है जब ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की परिभाषा इतनी व्यापक या धुंधली हो जाती है कि उसमें सरकार की जायज आलोचना और असहमति की आवाजें भी कुचल दी जाती हैं।
जब सरकारें लगातार कंटेंट को सेंसर करती हैं, तो समाज में एक खतरनाक मनोवैज्ञानिक असर पैदा होता है, जिसे कानूनी और सामाजिक भाषा में ‘चिलिंग इफेक्ट’ (Chilling Effect) कहा जाता है। इसका मतलब है कि लोग कानूनी कार्रवाई, जेल जाने या अपना अकाउंट खोने के डर से खुद को सेंसर करने लगते हैं (Self-Censorship)। एक आम नागरिक जब देखता है कि देश के बड़े पत्रकारों या विचारकों के ट्वीट डिलीट किए जा रहे हैं, तो वह खुद भी सरकार की किसी गलत नीति पर लिखने से कतराने लगता है। वह सोचने लगता है, “क्यों बेकार में मुसीबत मोल ली जाए?” यह स्थिति किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए सबसे घातक है। जब जनता डर के साये में जीने लगे और अपनी ही चुनी हुई सरकार से सवाल पूछने में संकोच करने लगे, तो लोकतंत्र का मूल ढांचा ही कमजोर होने लगता है।
कंटेंट हटाने की इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी कमी पारदर्शिता (Transparency) की है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत दिए जाने वाले ब्लॉकिंग ऑर्डर्स अक्सर गोपनीय रखे जाते हैं। आम जनता या खुद उस यूजर को, जिसका कंटेंट हटाया गया है, यह जानने का हक नहीं होता कि उसकी पोस्ट में ऐसा क्या था जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया। यह गोपनीयता एकतरफा शक्ति को बढ़ावा देती है। जब न्यायपालिका या जनता की नजरों से दूर रहकर फैसले लिए जाते हैं, तो मनमानेपन की गुंजाइश बढ़ जाती है। एक्स (ट्विटर) जैसी वैश्विक कंपनियों ने भी अतीत में भारतीय अदालतों का दरवाजा खटखटाया है कि उन्हें सरकार की तरफ से ऐसे कंटेंट को भी हटाने के आदेश मिल रहे हैं, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील हैं, न कि सुरक्षा के लिहाज से। एक लोकतांत्रिक देश में जनता को डर के साये में नहीं जीना चाहिए। भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत देश के हर नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह अधिकार सरकारें नहीं देतीं, बल्कि संविधान देता है। इसलिए, सरकार बदलने से नागरिकों के मौलिक अधिकार नहीं बदलने चाहिए।
जनता का डरना इस बात का संकेत होगा कि हम लोकतंत्र से तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया आज के दौर की ‘पब्लिक स्क्वायर’ (सार्वजनिक चौपाल) है। अगर चौपाल पर ही पहरे बिठा दिए जाएंगे, तो लोग अपनी शिकायतें लेकर कहां जाएंगे? मुख्यधारा का मीडिया (टेलीविजन और अखबार) पहले ही कई तरह के दबावों में काम कर रहा है, ऐसे में सोशल मीडिया ही वह आखिरी खिड़की बची है जहां एक अदना सा नागरिक भी अपनी आवाज सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंचा सकता है। समस्या का समाधान न तो इंटरनेट को पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ देने में है और न ही इस पर पूरी तरह से ताला लगा देने में। समाधान एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था बनाने में है। किसी भी कंटेंट या अकाउंट को ब्लॉक करने का अंतिम अधिकार पूरी तरह से कार्यपालिका के हाथ में नहीं होना चाहिए। इसके लिए एक स्वतंत्र न्यायिक या अर्ध-न्यायिक संस्था होनी चाहिए, जो यह तय करे कि कंटेंट वाकई अवैध है या सिर्फ राजनीतिक आलोचना है। सरकार को हर साल सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि उसने कितने कंटेंट हटाने के आदेश दिए और उनके पीछे का ठोस कानूनी आधार क्या था। जनता को फेक न्यूज और हेट स्पीच के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए, ताकि लोग खुद ही भ्रामक कंटेंट को आगे न बढ़ाएं। इसके लिए सरकार को सेंसरशिप के बजाय ‘फैक्ट-चेकिंग’ और शिक्षा पर जोर देना चाहिए। सोशल मीडिया कंपनियों को भी केवल मुनाफे के लिए काम नहीं करना चाहिए।
उन्हें स्थानीय कानूनों का सम्मान करते हुए मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मजबूत नीतियां बनानी होंगी। सोशल मीडिया के कंटेंट को ‘उड़ाने’ की सरकारी होड़ यदि केवल अफवाहों और नफरत को रोकने तक सीमित है, तो देश इसे स्वीकार करेगा। लेकिन यदि इसका इस्तेमाल नागरिकों की असहमति को दबाने और अपनी कमियों को छुपाने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जाएगा, तो यह देश की लोकतांत्रिक आत्मा पर चोट होगी। देश की जनता को डर के साये में जीने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें डिजिटल अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होने की जरूरत है। लोकतंत्र में सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं, जनता सरकारों के प्रति नहीं। डिजिटल स्पेस को सुरक्षित रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे ‘सेंसरशिप राज’ में बदलना कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। स्वतंत्र आवाजें ही एक सशक्त भारत की नींव हैं।




