भारतीय नारी हूं मैं, कितने बंधनो से बंधीए जीवन के कुरूक्षेत्र में न जाने कितने तीरों से बींधी, न तो मृत्यु के आलिंगन का अधिकार और ना हीं जीवन को अंगीकार करने की अधिकारिणी, जन्म से मृत्यु तक हर सांस किसी न किसी पुरूष के अधिकार में लेने को अभिशप्त, मैं हमेशा से ऐसी न थी, मैने वह दौर देखा है, जहां मातृसत्ता होती थी.

मैं अधिष्ठाता थी, जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय थी। फिर ऐसा क्या हुआ कि आज जन्म देने वाली को जन्म लेने के पूर्वए भ्रूण से ही अपने अस्तित्व के लिए आशंकित रहना पड़ रहा है. अगर जन्म मिल भी जाए. तो जीवन भर आतंकित रहने को विवश हो जाती हूं
नारी और नर प्रकृति में एक दूसरे के पूरक रहे, एक को दूसरे के सहारे की जरूरत हमेशा रही, कोई बंधन न थे, नग्नावस्था में दोनो विचरण करते, मैं नदी की तरह तीव्रता से प्रवाहित होती. प्रकृति का कोई ऐसा स्वरूप नही था। जिसे मुझसे अलग कहा जा सकता है। नर मेरी इच्छाओं का अनुसरण करता था। भारत में जो पहली नगरीय सभ्यता आई उस समाज का स्वरूप भी मातृसत्तात्मक रहा, मुझे अधिकार था, शिक्षा का, जीवन साथी चुनने का, आजीवन अविवाहित रहने का, पुरूष के प्रणय निवेदन को अस्वीकार करने का, हर जगह मुझे प्राकृतिक अधिकार थे, अबला न थी, मैं सहचरी थी, स्वयंसिद्धा थी।
सृष्टि को जन्म देने वाली और उसकी नियामक मैं ही थी, ममता, समर्पण, निष्ठा अदि मुझसे ही पनपे, मेरे गर्भ में ही इसका अंकुर फूटा, मेरी अस्थि, मज्जा और रक्त से सने हुए एक लोथड़े के रूप में जीन संसाr में प्रवेश करता, मेरी छाती से चिपककर, उसे पोषण मिलता था. मेरी प्रेरणा से ही सभी को बल मिलता, पर वक्त बदला, सामाजिक व्यवस्थाएं बदलीण, मेरे खिलाफ षडयंत्र का दौर शुरू हो गया। मुझसे ही जन्मा पुरूष, मेरे ही अधिकार को सीमित करता गया, नर अब मर्द बन गया, उसने नारी को अपनी संपत्ति घोषित कर दिया। ऐसा नही कि मैंने विरोध नही किया लेकिन उसने इतने बंधन लगाए कि मेरी सोंच धीरे धीरे परिवर्तित होने लगी, मुझे बार. बार बहलाया गया, मुझसे स्वतंत्रता छीनी गई, चुड़ी, कंगन, नथ आदि के रूप में मुझपर बंधन लगाए गए और मुझे इसका अहसास भी न होने दिया गया कि यह बंधन है।
युद्धों में, द्युत क्रीड़ा में मुझे जीता या हारा गया। मुझे संपत्ति बना लिया गया। मेरे पूरे शरीर पर अधिकार कर लिया गया। जिस मांस के लोथड़े को मैनें जीवन दिया था, उसी ने मुझे मांस का लोथड़ा बना दिया. मेरे जीवन का अधिकार मुझसे छीन लिया, भरी सभा में अपमानित किया, इस अपमान को भी मेरा नही, सबका कहकर मुझे बहकाया गयाण, मेरी चरित्र की बार.बार परीक्षी ली गई, मुझे अग्नि परीक्षा से गुजारा गया, मुझे महिमामंडित करने का पाखंड रचा गया, घर और समाज की इज्जत के नाम पर मुझे बंदी बना लिया गया, मुझे घर, कोठे, नृत्यशालाओं में मर्द की इच्छानुसार रखा गया. मैं नारी से वधू और फिर नगरवधू बनती रही, मेरा अपना कोई अस्तित्व ही नही रहा, जिस पुरूष से मैं बांध दी जाती, उसी के गोत्र और नाम से जानी जाती।

भारत में जिन समूहों का प्रवेश हुआ उनके अनुसार मुझे भी परिवर्तित किया जाता रहा। धर्मग्रंथ भी दोमुंही बात कहते, कभी सम्मान के शिखर पर बैठा देते तो कभी पशु से भी बदतर बताया गया. मुझे अर्धांगिनी कहा गया और अशिक्षित, मुर्ख, परजीवी बनाए रखने के सभी प्रयास किए गए। जन्म लेते हीं विवाह की प्रथा ने मेरे विकास को पूर्णतः अवरूद्ध कर दिया। ऐसा नही कि नारीत्व पूर्ण अवरूद्ध हो गया था। समय समय पर कुछ नामो के रूप में समाज में चमक उठती थी लेकिन बहुत थोड़े नाम थे, काहां हूं, इतिहास में मैं कुछ नाम जरूर है परंतु चाहें वो राम हो या बुद्ध, मेरे साथ न्याय तो नही ही कर पाए, प्राचीन काल के भारतीय इतिहास में तो अपना अस्तित्व किसी न किसी रूप में बचाने में सफल रही लेकिन समय के साथ साथ मेरा अस्तित्व भी घिसता गया। पूर्व मध्य काल और मध्य काल में केवल उपयोग और काम वासना पूर्ति का साधन बनकर रह गई। मेरा नख से शिख तक का वर्णन किया गया लेकिन वह मेरी सुंदरता का वर्णन नही, बल्कि पुरूष के काम वासना को बढ़ाने का हथियार था. मुझे हरमो में रखा गया, मैं बार.बार लूटी गई। एक महल से दूसरी महल पहुंचाई जाती रही, कितना संघर्ष करती, कितना संघर्ष करती, कितनी हिम्मत करती, जब कुछ संभव नही हुआ तो जौहर भी मैंने ही किया. ऐसा नही था कि सारे पुरूष ऐसे थे लेकिन अधिकांश तो ऐसे ही थे।
इतिहास खुद को दोहराता है। भारतीय इतिहास के में, जिसे आधुनिक काल कहा जाता है, उसकी शुरूआत भी समुद्री लुटेरों के आने मानी गई. अंग्रेज, पुर्तगाली, फ्रांसीसी आदि ने मुझे भोगने में कोई कोर कसर नही छोड़ी लेकिन शायद कुछ बदलने वाला था । भारतीयों को अपना अतीत याद आने वाला था. कितनी बड़ी बिडंबना है कि जिस नारीत्व का हनन पुरूष ने किया था। अब वही पुरूष नारी उत्थान की बात करने लगे अब और समस्याएं थी. मैं हिंदू, मुस्लिम आदि धर्मो में विभाजित हो गई थी. इन धर्मो में भी कई जातियों और उपजातियों में बंट गई थी मैं शोषण रुका तो नहीं लेकिन रोशनी की एक किरण जरूर दिखाई दिया. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में नारी के प्रयासों को चाहकर भी नकारा नही जा सकता है. नारी की भूमिका में धीरे धीरे ही सही, परंतु वृद्धि होती रही.
अंततः भारत स्वतंत्र हुआ लेकिन क्या मैं स्वतंत्र हुई. संविधान, नियम, कानून सबमें प्रावधान किए गए। नीतियां बनी पर नियत तो वही रहे. एक बार फिर मैं पुरूषों के मध्य खुद में अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास करते. मगर फिर वही सब घर से लेकर कार्यस्थल तक शोषण और प्रताड़ना, किंतु अब इन समस्याओं से मैं रूकने वाली नही थी. धीरे धीरे विश्व भी बदल रहा था. एक नई व्यवस्था अस्तित्व में आ रही थी. जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया किंतु यह भी मृगमरिचिका ही थी. नारी को सार्वजनिक स्थलों पर स्थान तो मिला पर उसके शोषण के तरीके भी बदल गए. मेरी अवस्था को सुधारने हेतुए नारीवादी आंदोलन व विचारों का सूत्रापात भी हुआ. मुझे वर्ष का एक दिन भी समर्पित कर दिया गया, मैं हैरान थी कि सृष्टि और जीवन का प्रारंभ करने वाली नारी मात्र एक दिन से कैसे सहमत हो सकती थी परंतुए मैने इसे स्वीकार कर लिया. यह तो प्रारंभ भर है फिर से अपने को स्थापित करने हेतु एक दिन क्या एक पल का अवसर भी मिले तो उसे नही छोड़ने वाली.
नारी हूं, मैं घर से लेकर कार्यस्थल तक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करूंगी, उषाकाल से निशा के आगमन तक अपनी उपादेयता सिद्ध करूंगी, यह संघर्ष स्वयं के लिए है पुरूष आज मर्द है, तो नारी आज स्त्री नहीं, महास्त्री है. हर जन्मी व अजन्मी नारी, महास्त्री का ही स्वरूप है. मेरे प्राकृतिक अधिकार है उनसे मुझे वंचित नही किया जा सकता. मुझे विश्वास है कि मुझसे पृथक समाज या कोई अस्तित्व ही नही, नारी से ही सब है और हर स्त्री अब महास्त्री है.
