ऋषि मुनियों ने गाय को आर्य ग्रंथों में ‘सर्व देवमयी माता,’ ऐसा कहा है। ”अष्टैश्वर्यमयी लक्ष्मी वसते गोमये सदा।“ यह महाभारत का घोष है-मनीषा कुमारी

आदि काल में मनुष्य की संपन्नता उसके पास कितनी गायें है इससे तय की जाती थी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब तक भारतवर्ष में गाय का सम्मान किया गया तब तक तो भारतवासी स्वस्थ एवं संपन्न थे। भारत में दूध और अनाज तो बेचा ही नहीं जाता था। यहां जरूरतमंद को ये वस्तुएं निःशुल्क ही दिया जाता था। इसलिये कहा जाता था कि भारत में दूघ-दही की नदियां बहती थी। अनेक ग्रंथों में गाय को एक महत्त्वपूर्ण पशु (कामधेनु) कहा गया है। गाय से प्राप्त पांच पदार्थ अर्थात गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी को मिलाकर पंचगव्य कहा गया है। आयुवैदिक ग्रंथों में स्वास्थ्य रक्षा एवं चिकित्सा के लिये पंचगव्यों का उपयोग कई स्थानों पर प्राप्त होता है, जैसे – मानसिक विकार, अपस्मार, मधुमेह, स्त्री रोग, आमवात, वातरक्त, त्वक् (त्वचा संबंधी) रोग, रसायन, गृध्रसी, शोफ, पीलिया आदि। आयुर्वेद में अष्टवर्ग में प्राणियों का एकत्रित उल्लेख कर उनकी चिकित्सकीय उपादेयता बताई गई है। इस अष्टवर्ग में गाय, भैंस, ऊँटनी, हथिनी, घोड़ी, भेंड़, बकरी और गघी का समावेश किया गया है। भारतीय समाज में धार्मिक दृष्टि से गाय की महत्ता और भी ज्यादा है। सब इसे गोमाता कहते हैं। पंचगव्य का उपयोग एकल द्रव्य अर्थात केवल द्रव्य यानि केवल दूध, घी, गोमूत्र रूप में अनेक रोगों में किया जाता है। विविध औपधियों में प्रमुख घटक द्रव्य के रूप में, रसौषधि पर होने वाली विविध क्रिया जैसे शोधन, मारण, आदि में भी इनकी उपयुक्तता वर्णित है। पंचकर्म के विविध कार्य जैसे स्नेहन के लिये गोघृत, गोदुग्ध का उपयोग व विरेचन के लिये गोमूत्र का उपयोग होता है। आयुर्वेद संहिताओं में पंचगव्य के गुणों के बारे में विस्तार से बताया गया है जिसका सार यहां बता रही हूँ ।
गोरसवर्ग
स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं च लक्षण पिच्छिलम्।
गुरुमन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पयः।।
तदेवङ्गुणमेवौजः सामान्यादभिवर्धयेत्।
प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम्।।
अल्पाभिष्यन्दि गोक्षीरं स्निग्धं गृरु रसायनम्।
रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयोः।।
जीवनीयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम्।।
गाय का दूध मधुर, शीतल, मृदु, स्निग्ध, गुरु आदि दस गुणों से युक्त है अतः ओज का वर्धन करता है। गाय का दूध जीवनीय रसायन है। (चरक संहिता ) सुश्रुत के अनुसार गाय का दूध अल्पाभिष्यन्दी, स्निग्ध, गुरु, रसायन, रक्तपित्त नाशक, शीतल, मधुर, जीवनीय तथा वात-पित्त नाशक है। गोदुग्ध का उपयोग मानस व उदर रोग में तथा आर्श, ग्रहणी, गुल्म और मुत्रल्पता में करते हैं। (सुश्रुत संहिता ) आयुर्वेदिक औषध योग जिनमें गोदुग्ध का उपयोग होता है – गुष्माण्डावलेह, अलादि तैल, वनरी गुटिका।
गोदधि
स्निग्धं विपाके मधुरं दीपनां बलवर्धनम्।।
वातापहं पवित्रं च दधि गव्यं रुचिपदम्।।
गाय के दूध से बनी दही/दधि स्निग्ध, मधुर, विपाक, दीपों के लिए बलवर्धक, वात शामक, पवित्र व रूचि प्रद हैं। गोदधि का उपयोग ज्वर, रक्त विकार, आर्श, संग्रहणी, मूत्रादि रोग के उपचार में होता है। गाय के दधि/तक्र से बनी आयुर्वेदिक औषध का योग तक्रारिष्ट, लाक्षादि तैल में किया जाता है।

गोघृत
विपाके मधुरां शीतं वातपित्तविषापहम्।
चक्षुष्यमग्रयं बल्यं च गव्यं सर्पिर्गुणोत्तरम्।।
गोघृत मधुर विपाक, शीतल, वातपित्त शामक, विषनाशक, नेत्रों के लिए हितकारी और बल्य है। इसका उपयोग जीर्णज्वर, उन्माद, उपस्मर, नेत्र रोग व कुष्ठ आदि रोगों में होता है। इसका सेवन करने पर स्मृति का वर्धन भी होता है। गोघृत से बने विभिन्न आयुर्वेदिक योगों के नाम अष्टमंगल घृत, शतधौत घृत, फलाघृत, जात्यादि घृत, कामदुधा रस आदि हैं।
गोमूत्र
गव्यं सुमधुरं किंचद्दोषघ्नं क्रिमिकुष्ठनुत्।
कण्डुं च शमयेत् पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम्।।
गोमूत्र किंचित मधुर दोष नाशक, कृमि कुष्ठ नाशक, कृण्डु शामक तथा पीने पर सभी उदर रोगों को शान्त करता है।
गोमूत्रं कटु तीक्ष्णोष्णं साक्षारत्वान्न वातलम्।
”सर्वे देवाः स्थिता देहे सर्व देवमयी हि गौ।“
अर्थात सभी भगवान जिसके शरीर में निवास करते हैं, गाय की कृपा से ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की मनुष्य को प्राप्ति होती है। ऐसी गाय की अपार महिमा अनेक आर्य ग्रंथों में वर्णित है। तभी तो ”गोमये वसति लक्ष्मी“ ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
