फिलहाल प्रदेश की जनता आज कल बढ़ते अपराधों से कराह रही है। बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जी से मेरा सिर्फ एक सवाल है कि आपके ही राज में बिहार में एक बड़ा बदलाव आया था पर आज ऐसा क्या हुआ की हमारा बिहार आज के जैसे हो गया ।उमाशंकर सिंह

जिस दिन बिहार के माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद और अपने पावर को बरकरार रखने के लिए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाया था, उसी दिन से यह समझा जाने लगा था कि बिहार में एक बार फिर से वही दिन देखने को मिलेंगे जो आज से 11 साल पहले रहे थे। इस बात को हम सब जानते हैं कि आरजेडी के शासन के वक्त बिहार का क्या हाल था और एक बार फिर से वही बिहार हमारे सामने आकर खड़ा हो गया था पर आज फिर बिहार भाजपा से मिलकर नीतीश को सत्ता दिया ।
Neet बच्ची से संबंधित हॉस्टल कांड और हर दिन होती हत्याएं. बिहार इन दिनों एक बार फिर बढ़ती आपराधिक घटनाओं के चलते लगातार सुर्खियों में है। आऐ दिनों हो रहीं हत्या, अपहरण और फिरौती की मांग, रंगदारी टैक्स की मांग और न देने पर रंगदारों द्वारा संबंधित व्यक्ति को मार दिए जाने की धटना एक बार फिर से जोऱों पर है। इन बढ़ती अपराधिक घटनाओं को रोकने में राज्य पुलिस प्रशासन नाकाम साबित हो रही है। बिहार में आज फिर से गुंडा राज शुरू हो चुका है। किडनैपिंग और मर्डर जैसी वारदातें होनी शुरू हो गई हैं। आज बिहार गर्मी से नहीं, बल्कि अपराधों से तपता हुआ दिखाई पड़ रहा है और आलम यह है कि मंत्री दूसरे राज्यों में राजनीति करते नजर आ रहे हैं।
सिर्फ शराब पर पाबंदी लगा देने से अपराध को राज्य से हटाया नहीं जा सकता। अगर ऐसा होता, तो पूरे देश में शराब पर पाबंदी लगा दी जाती और दुनिया में हमारा देश ’क्राइम फ्री कंट्री’ कहलाता। जरूरी है कि बिहार में कानून व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए और मुख्यमंत्री को इधर-उधर की बातों को नजरअंदाज करते हुए अपने राज्य के उन सभी लोगों की बातों पर ध्यान देना शुरू करना चाहिए जिन्होंने उन पर भरोसा करके बीजेपी पर भी भरोसा करने की कोशिश की है।
वैसे,बिहार में जदयू और बीजेपी कभी भी एक साथ एक ही नाव में ज्यादा दूर तक सफर नहीं कर सकते। बीजेपी से हाथ मिलाना सिर्फ नीतीश कुमार की एक मजबूरी थी और कुछ नहीं। जेडीयू और बीजेपी ज्यादा दिनों तक कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते। इन दोनों की सोच और दोनों के विचार में अंतर है, क्योंकि बीजेपी ने बिहार से सिर्फ लिया है और नीतीश ने बिहार को बहुत कुछ दिया है। बिहार में वर्तमान स्थिति पर अगर काबू नहीं पाया गया, तो शायद नीतीश पर से बिहारवासियों का विश्वास टूट जाएगा और यह पूरी तरह से जायज होगा। प्रदेश के सीएम नीतीश कुमार इन बढ़ती आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए लगातार फरमान जारी कर रहे हैं और पुलिस विभाग को लगातार निर्देश भी दे रहे हैं लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं दिख रहा है। हाल के दिनों में राजधानी पटना से मात्र 100 किलोमीटर दूर मरांची थानें के थाना प्रभारी को खुलेआम बाढ में गोलियों से छलनी कर दिया गया था , वहीं पटना में कच्ची मस्जिद के पास बाहुबली लोक जनशक्ति पार्टी नेता बृजनाथी सिंह की दिन दहाड़े तीन अपराधियों द्वारा एके-47 से अंधाधुंध गोली बरसाकर की गई हत्या, मधुबनी में इंजीनियर की हत्या और राजधानी पटना में ही एक अन्य मामले में रंगदारी टैक्स न देने के कारण एक स्वर्ण व्यवसायी की भी दिनदहाड़े हुई हत्या और उसके बाद भी पुलिस वालों की नाकामी ने प्रबुद्ध समाज को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर बिहार में ये क्या हो रहा है? कहीं यह जंगल राज पार्ट-2 तो नहीं शुरू हो गया है? जबकि सीएम नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और बिहार पुलिस प्रमुख मानते हैं कि बिहार में ऐसा कुछ नहीं है।
बिहार पुलिस के अपराध रोकने में कामयाब होने की बात तो दूर वह अपराधियों के खिलाफ समुचित कार्रवाई भी नहीं कर पा रही है। उनका आरोप है कि बीजेपी और नीतीश के निर्देशों के बावजूद पुलिस कोई ठोस प्रबंध नहीं कर रही है। उन्होंने पुरानें घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि जब एक ही दिन में अपराधी पांच पांच बड़ी डकैतियों को अंजाम दे सकती है जिसमें बैंक में लूट भी शामिल है और पुलिस कुछ नहीं करती दिख रही है तो फिर राज्य में कानून-व्यवस्था कहां है। यही तो जंगल राज है। बिहार की जनता कहने लगी हैं कि नीतीश को तो कुर्सी से मोह है न कि प्रदेश की जनता से। अगर उन्हें जनता से प्रेम होता तो वे कभी भी बीजेपी से हाथ नहीं मिलाते। हालांकि वे प्रदेश के नामजद सीएम तो हैं पर सत्ता की असली चाबी तो रायसीना हिल पर मौजूद लोगों के पास है। और लालू के राज में पीछे भी ऐसा ही हुआ है कि अपराधी बेखौफ रहे हैं और आज भी बेखौफ हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि बिहार में अपराधिक तत्त्व लगातार बेकाबू होते जा रहे हैं और पुलिस उसे रोकने में अपने आपको असमर्थ पा रही है। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि शिवहर कलैक्ट्रेट से महज आधे किमी. की दूरी पर ग्रामीण विद्युतीकरण में जुटी एक कंपनी के प्रधान सुपरवाईजर को रंगदारी टैक्स न दिए जाने के कारण गोलियों से छलनी कर दिया और पुलिस हाथ पर हाथ धरे रही। इस घटना को अंजाम देने वाले मुख्य अपराधी आज भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। ऐसी दो दर्जन से भी अधिक संगीन अपराधों के आरोपी आज तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। कारण ऐसी अपराधिक घटनाओं को अंजाम देने का काम अधिकतर वही कर रहे हैं जिनका किसी न किसी रूप से उच्च स्तरीय बाहुबली नेताओं से संबंध है। और उसमें भी वे अपराधी अधिक सक्रिय हैं जिनका संबंध सत्तारूढ़ महागठबंधन के साथ है। ऐसे अपराधियों तक पुलिस यदि पहुंच भी जाती है तो इनके आका इन्हें परोक्ष तौर पर बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते और सभी प्रकार के हथकंडों का यथा संभव प्रयोग करने से नहीं चूंकते। कभी कभी तो ऐसा भी हो जाता है कि इस गठबंधन के समर्थकों में भी आपसी भिड़ंत हो जाती है और तब उस भिड़ंत में बीजेपी का पलड़ा भाड़ी पड़ जाता है।
प्रदेश के पटना जिला महेंन्दरपुर निवासी राकेश सिंह ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया हिंदुत्व के नाम पर कुछ दबंगों ने मुसहर जाति के एक युवक की सिर्फ इसलिए जमकर पिटाई कर उसे अधमरा कर दिया क्योंकि उस युवक ने यादव टोली के एक चापाकल (हैण्ड पम्प) पर पानी पी लिया था। बात यहीं खत्म नहीं हुई। उन दबंगों ने मुसहर टोली पर धावा बोल कर उस युवक के सगे-संबंधियों के साथ भी मार पीट की। और जब ये लोग नजदीकी मरांची थाने में शिकायत करने गए तो पुलिस वालों ने इन्हें भगा दिया। बात जब सोशल मीडिया पर चली तो डीएम के हस्तक्षेप से मामला दर्ज हुआ और पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करने का नाटक भी किया पर घटना को अंजाम देने वाले दबंगों को पुलिस आज तक गिरफ्तार नहीं कर सकी। वे आज भी मुहल्ले में खुलेआम घूम रहे हैं। आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मानते हैं कि बिहार में कानून व्यवस्था दिन पर दिन गिरता जा रहा है और लोग अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बिहार में बाहुबली राज शुरू हो गया है। वे कहते हैं कि सीएम की कुर्सी से नीतीश को इतना प्यार है कि उसने प्रदेश की जनता का भला सोचने की जगह अपनी कुर्सी का भला सोचा और बीजेपी से जा मिले। हमने उन्हें आवश्यकता से अधिक सम्मान दिया और जनता के हित की बात सोची पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।
जनता अपने आपको ठगा महसूस कर रही है। यह कहना गलत होगा कि अपराधियों व बाहुबलीयों को किसी तरह का राजनीतिक प्रश्रय प्राप्त है। जब मामला बेकाबू हो जाता है तो वे अपने आपको पाक बेदाग दिखाने का ऊपर से कोशिश तो करते हैं पर अंदर ही अंदर अपने गुर्गों को बचाने की तरकीब सोचते रहते हैं। खास कर बिहार इस मामले में टाॅप पर है।
1990 के दशक में बिहार में ”बिहार पिपुल्स पार्टी“ के नाम से एक पार्टी का गठन हुआ था जिसको शुरू किया था बाहुबली आनंद मोहन और बाहुबली प्रभुनाथ सिंह ने। इस पार्टी की टिकट पर 1995 का विधान सभा चुनाव जितने भी उम्मीदवारों ने लड़ा था उनमें 90 फिसदी से अधिक क्रिमिनल बैकग्राउंड के थे। वहीं लालू प्रसाद के साथ भी बाहुबली पप्पु यादव और बाहुबली शाहबुद्दीन जैसे कई क्रिमनल खड़े थे। रामबिलास पासवान के साथ जहां बाहुबली सूरजभान सिंह और बाहुबली बृजनाथी सिंह जैसे बाहुबली तो खुद को पाक और बेदाग दिखाने वाले सुसाशन बाबू यानि प्रदेश के सीएम नीतीश कुमार के नजदीकियों में अनंत सिंह जैसे दर्जनों चर्चित अपराधी व बाहुबली भी रहे हैं। वे फिलहाल जेल में बंद हैं और नीतीश के बदले रुख से नाराज हो कर 2015 के विधान सभा चुनाव से पहले जेडीयू से नाता तोड़ लिया है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति को अपराध मुक्त कैसे कहा जा सकता है।
लालू प्रसाद यादव को जब जनता दल की लहर में 1990 में देवीलाल की कृपा से सीएम का पद मिला तो उसने अपनी कुर्सी को स्थाई करने के उद्देश्य प्रदेश में जातीय उन्माद को हवा दिया और इसे बल देने के लिए ”भूरा बाल को खत्म करो“ का नारा दिया। पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर हुए विवाद में लालू ने ‘राष्ट्रीय जनता दल’ के नाम से नई पार्टी बनाई तथा उसने और उसकी पत्नी राबरी देवी ने कुल 15 सालों तक बिहार पर राज किया। उन दिनों बिहार में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी। आए दिन हत्या, अपहरण, रंगदारी की मांग, जातीय झड़प और कभी कभी तो सामुहिक नरसंहार जैसी घटनाएं होती रहती थी जिसका उदाहरण ‘नारायणपुर बाथे’ जैसी कुछ घटनाएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है। और एक बात जो लालू का पर्याय था वह है घोटाला जिसमें सबसे प्रमुख है चारा घोटाला जो लगभग 900 करोड़ रूपये से अधिक का था। उनके पुराने छाप का साया निवर्तमान सरकार पर आज भारी पड़ता दिख रहा है। अपराधियों को लगता है कि लालू उनका तारणहार है और वे जो कुछ भी चाहें कर सकते हैं। इधर लालू प्रसाद की कोशिश है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था सुचारू रहे। इस बार वे जातीय उन्माद को भी बढ़ावा देते नहीं दिख रहे हैं।
हालांकि बिहार के पुलिस प्रमुख का कहना है कि देश के अंदर किस राज्य में अपराध नहीं हो रहा है। वे दिल्ली का हवाला देते हुए कहते हैं कि दिल्ली पुलिस तो सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है फिर भी वहां क्राइम नहीं रुक रहा है। मैं मानता हूं कि पिछले कुछ महीनों में राज्य में अपराधिक घटनाओं में मामूली बढ़ोत्तरी हुई है पर इसका मतलब यह नहीं कि अपराधियों को खुली छूट दे दी गई है। पुलिस के पास यदि किसी प्रकार की शिकायत आती है तो हम उस अपराधी को सलाखों के पीछे डालने में कोई कसर नहीं छोड़ंते। हमारे सीएम स्वयं अपराध को रोकने की मंशा से बराबर दिशा निर्देश दे रहे हैं। वह दिन दूर नहीं कि इन अपराधियों को जो अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं और कहीं जा कर छुप गए हैं पकड़ कर लाया जाएगा और सलाखों के पीछे डाला जाएगा। इसके लिए आवश्यक प्रक्रियाओं पर लगातार काम चल रहा है। दूसरी बात यह कि अब बिहार पुलिस भी त्वरित कार्रवाई में विश्वास करती है। लेकिन हमारी मजबूरी यह है कि थानों का कार्य क्षेत्र बड़ा होता है और पुलिस तक सूचना आने में कई बार देर हो जाती है जिसकी वजह से अपराधी अपने काम को अंजाम देकर छिप जाते हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रदेश में लगातार बढ़ती अपराधों को लेकर चिंतित हैं और वे इसे रोकने का न केवल पुलिस महकमे को निर्देश दे रहे हैं बल्कि कई मामलों में हस्तक्षेप भी कर रहे हैं और लगातार पुलिस विभाग की मोनेटरिंग भी कर रहे हैं। इसके लिए वे लगातार नवीनतम सूचना प्रोद्योगिकी तंत्र का भी उपयोग कर रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके प्रदेश में अपराध का ग्राफ नीचे गिरता नहीं दिख रहा है। हालांकि उनका दावा है कि प्रदेश में अपराध अब नियंत्रण के करीब है और सूचना मिलते ही पुलिस उचित कार्रवाई भी कर रही है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। अब देखना यह है कि नितीश के दावे कितने दिनों में सच साबित होते हैं और प्रदेश अपराध मुक्त हो पाता है यह तो आने वाला कल ही बताएगा। फिलहाल प्रदेश की जनता इन बढ़ते अपराधों से कराह रही है। बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जी से मेरा सिर्फ एक सवाल है कि आपके ही राज में बिहार में एक बड़ा बदलाव आया था। जहां लोग रात 10 बजे के बाद गया और जहानाबाद जैसे कई शहरों में घर से बाहर निकलने से डरते थे, वहीं आप के ही राज में रात के चाहे एक ही क्यों न बज रहे हों, ट्रेन पकड़ने स्टेशन निकल पड़ते थे। लड़कियां आप ही के राज में खुद को सुरक्षित महसूस करती थीं। लेकिन आज बिहार की हालत फिर से क्यों पुरानी जैसी होती जा रही है, जहां सिर्फ ओवरटेक करने पर हत्या कर दी जा रही है।