बिहार का बाढ़ : विभीषिका या राजनीतिक घड़ियाली आँसू का शिकार ?

बात आज की नहीं सैकड़ों साल पुरानी है। कोसी को बिहार का शोक कहा जाता है। न जाने कितने वर्षों से यह नदी कितने लोगों को लील चुकी है और आगे भी कितने को लीलेगी, कहा नहीं जा सकता।

नेपाल द्वारा अचानक बीरगंज बराज से हजारों क्यूसेक पानी छोड़ने का परिणाम होता है कि रातोंरात कोसी क्षेत्र के जिले मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, अररि या, मधेपुरा, पूर्णियां, कटिहार, खगड़िया आदि और उत्तरी भागलपुर के कुछ क्षेत्र बाढ़ के पानी से न केबल डूब जाता है  बल्कि तबाह भी हो जाता है।

अपना जान भी बचाना मुश्किल

अचानक छोड़े गए पानी से आए बाढ़ का प्रकोप सीमावर्ती जिलों में लोगों को अपना जान भी बचाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन कोसी का यह तांडवपूर्ण बाढ़ बिहार के लिए कोई नया खेल नहीं है। लोग इससे पहले भी त्रस्त थे, आज भी हैं और न जाने कब तक रहेंगे, और ये नेता लोग हैं, चाहे वे केंद्रीय स्तर की राजनीति में सक्रिय हों या फिर राज्य स्तरीय अथवा क्षेत्रीय, सब के सब घड़ियाली आंसू ही बहाते दिखते।

सब के सब घड़ियाली आंसू ही बहाते दिखते।

पिछले साल भी आए अचानक कोसी के बाढ़ के भीषण प्रकोप ने कई मासूम बच्चे की जीवनलीला लील ली। इसमें कोई शक नहीं कि कोसी में बाढ़ अचानक आता है पर क्या प्रशासन को पहले से यह नहीं पता होता है ? याद रहे 1987 के कोसी बाढ़ से ही लगातार हर दूसरे या तीसरे साल इस तरह की भीषण त्रासदी का नजारा देखने को मिल रहा है और न जाने कब तक आगे भी मिलता रहेगा, आखिर कब तक हजारों लोग इसी तरह अपने संतानों को खोते रहेंगे।

राजनीति का शिकार यह बाढ़

जिस तरह हर साल नेपाल भारत को बिना बताए बीरगंज बराज के सारे फाटक खोल देती है उसके मद्दे नजर क्या मोदी सरकार ने इस मुद्दे को सख्ती के साथ नेपाल के सामने उठाया? कोई आपत्ति दर्ज की? शायद नहीं? इसकी उसे जरूरत ही नहीं दिखाई दी। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो राज्य के नितीश सरकार को नीचा दिखाना पड़ता, इसके लिए एक पार्टी विशेष के नीति-निर्धारक अपने पालतू कुत्ते यानि चंद मीडियावालों को गला फाड़ कर चिल्लाने के लिए कैसे भेजते। लेकिन विनाश के मामले में इस बार थोड़ी राहत है कि लोग बार बार आने वाली कोसी के इस भीषण बाढ़ से वाकिफ हैं और वे थोड़ा जागरूक भी हो गए हैं।

1987 के बाद से—

बदलते समय के साथ 1987 के बाद से अब तक काफी लोगों के घर इन 38 वर्षों में पक्के के बन गए हैं। बता दूं कि भारत को मात्र कुछ घंटे पहले बता कर नेपाल सरकार ने 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय में इसी तरह 87 में भी रातोंरात खोला था। तब लोगों के घर बहुत ही कम पक्के के बने थे या यूं कहें कि नहीं के बराबर थे। ….और जो थे वह उसके दीवार की चिनाई सिमेंट और बालू से नहीं बल्कि ईंट-मिट्टी से हुई थी। उन दिनों अधिकांश घर फूस के थे। उस बाढ़ में कितनी तबाही हुई? कितने जान माल का नुकसान हुआ इसका आंकड़ा न तो बिहार सरकार के पास है और न ही भारत सरकार के पास। तब प्रदेश के मुख्यमंत्री थे शाहपुर से एमएलए रहे बिन्देश्वरी दूबे। बाढ़ का प्रकोप इतना भीषण था कि कई गांव बाढ़ के उस प्रचंड वेग में बह गया था विशेष रूप से तत्कालीन सहरसा, मधुबनी और दरभंगा जिले. क्योंकि उस बार नेपाल द्वारा पानी छोड़ने से मात्र चार घंटे पहले केंद्र को सूचना दी गई थी। मेरे मित्र का गांव सोनवर्षा जो भागलपुर जिले के उत्तरी भाग में बिहपुर प्रखंड में पड़ता है पर कोसी के बाढ़ क्षेत्र में भी नहीं आता और कोसी की पानी से कभी नहीं डूबा था, उसके किनारे लेवा से होकर उस बाढ़ के अतिरिक्त पानी को गंगा में निकालना पड़ा था उस बार। लेकिन इस अतिरिक्त पानी को निकवाने में जिला प्रशासन ही नहीं भागलपुर के कमिश्नर तक को हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ा था और लोगों के सामने उन्हें हाथ जोड़ना पड़ा था जिसका एक प्रत्यक्षदशी अपने किशोरावस्था में मेरा मित्र भी था। कटिहार रेल लाईन पर थाना बिहपुर जं. के पश्चिमी केबिन पर पानी के आवाजाही को रोकने का एक सुरंगनुमा ढांचा है जिसमें फाटक लगे है। इसे लोग रेलवे फाटक भी कहते हैं। इस फाटक के दक्षिणी छोड़ पर सोनवर्षा के नेतृत्व में दक्षिणी भाग में पड़ने वाले गांव बभनगामा, अमरपुर, गौरीपुर और नरकटिया के लोग थे। लाठी भाला और अन्य हथियारों के साथ मोर्चा संभाले एक साथ थे और उधर उत्तरी छोड़ पर मड़वा बासियों के साथ वह भी इसी तरह खड़ा था।  जयरामपुर, नन्हकार और कुछ अन्य गांवों के लोग जिनके केले की खेती तो चौपट हो ही चुका था कोसी के पानी से और अब गांव में भी घुसने को थी। उस बार आदमी और मवेशियों की लाशें ऐसे तैरते हुए भँस रहे थे पानी के सतह पर जैसे घास के तिनके बह रहे हों। कई माता-पिता ने इस बात की परवाह किए बिना बच्चे को फूस की छप्पर पर बैठ कर यूं ही बह जाने को छोड़ दिया था इस उम्मीद के सहारे कि किसी तरह वे जिंदा रह जाय ताकि उनका वंश चलता रहे। पर उन दिनों मीडिया इतनी सक्रिय नहीं थी। और यदि वह दृश्य आज की मीडिया या सोशल मीडिया वालों के हाथ लगती तो सही होता। मैं बता दूं कि इस बराज को बनाने के समय भारत सरकार का नेपाल नरेश से समझौता हुआ था कि पानी छोड़ने के कम से कम 12 घंटे पहले बिहार और भारत सरकार को सूचित किया जाएगा कि बराज का फाटक कब खोला जाएगा। लेकिन उस बार अचानक उपजी विषम परिस्थितियों के कारण ऐसा हुआ था।

कब तक यह खेल —-?

पर जैसा कि मैंने पहले भी जिक्र किया है कि उन दिनों न तो मीडिया का इतना अधिक विस्तार हुआ था और न ही सोशल मीडिया का जन्म और न ही इतनी बड़ी रखेली और जुमलेबाज थी केंद्र या राज्य सरकार जितनी कि इन दिनों है। परंतु गौर करने वाली बात यह है कि 1987 की घटना से सबक लेने के बाद भी पूर्ववर्ती केंद्र और राज्य सरकारों ने इस दिशा में आज तक कोई ठोस पहल नहीं की और न ही स्थाई समाधान की कोई योजना बनाई। आज मोदी जी का गुणगान गाते नहीं थकने वाली इन मीडियावालों की यही स्थिति पिछले 19 सालों में नितीश कुमार के लिए भी रही है। उसने तो बिहार की मीडिया अपना अघोषित दास बना रखा था काफी हद तक। 1987 के बाद राज्य में सरकार चाहे लालू प्रसाद और उनकी पत्नी राबड़ी देवी की रही हो या फिर नितीश कुमार का, और केंद्र में जिस भी गठबंधन की सरकार, किसी ने भी काम तो कुछ किया नहीं और इनकी प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होती रही इस क्षेत्र की निर्दोश जनता। लेकिन सरकारी धन के बल पर मीडियावालों को खरीदकर नितीश कुमार पिछले 19 सालों से सुसाशन बाबू का खिताब लिए अहंकार से चूर अकड़ते रहे।

परंतु वर्तमान में मीडियावालों को नितीश से अधिक माल भाजपा से मिल रही है इसलिए उसने नितीश को कोसी क्षेत्र के लोगों का दुश्मन कहना शुरू कर दिया है जिसे कभी ये सुसाशन बाबू कहते नहीं थकती थी। लेकिन कड़वा सच तो यही है कि नितीश ने अपने इन लगभग 19 सालों के शासन के दौरान आरंभिक पांच सालों में कानून व्यवस्था में जो थोड़ा-बहुत सुधार किया था, उसे छोड़कर कुछ नया नहीं किया है। प्रदेश की शिक्षा जो कभी विश्वस्तरीय थी, उसे पहले कमजोर किया था कर्पूरी ठाकुर ने अंग्रेजी को अनिवार्य विषय की सूची से हटा कर और उसके बाद लालू ने बोर्ड की परीक्षा में चोरी चलवा कर, तो रही सही कसर पूरा कर दिया मुखिया के हाथों शिक्षकों की बहाली देकर इस नितीश कुमार ने। आज बिहार के अधिकांश  स्कूलों में ऐसे शिक्षक कार्यरत हैं जिसने अपने छात्र जीवन में लफंगई और उदंडता के सिवा कुछ नहीं किया था। कभी वास्ता नहीं रहा था इनका पढ़ाई से।

खैर, मैं मुद्दे से थोड़ा भटक गया था, उसी की बात क्यों न करें। इस बार ही नहीं पिछले कई सालों से यदि देखा जाय और उस पर मंथन किया जाय तो सवाल उठता है कि आखिर क्या कारण है कि बीते  वर्षों में नेपाल सरकार उस समझौते का बार बार उल्लंघन कर रही है और जब तब भारत को बिना बताए भारी मात्रा में पानी छोड़ देती और बिहार वासियों को खास कर कोसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को इस तरह के विभीत्स नजारों का सामना करना पड़ता है। क्या नेपाल सरकार रबी की फसल के समय में भी इस तरह से कभी कुछ अतिरिक्त पानी छोड़ता है कि वहां के लोगों को पसलों की सींचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सके,

क्या यह बात भारत सरकार को समझ में नहीं आती? क्या इस तरह मानसून के मौसम में अचानक छोड़े गए पानी को लेकर अपने यहां होने वाली तबाही का मंजर देख भारत सरकार नेपाल से कोई प्रश्न पूछती है? जवाब मिलेगा ‘शायद नहीं। बता दूं कि कुछ वर्ष पूर्व मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जब बिहार में इसी तरह का बाढ़ आया था तो ये बाढ़ पीड़ितों की स्थिति का जायजा लेने गए थे और बाढ़ से बचाव के लिए वहां के निवासियों को मुंहमांगा राशि देने का शायद नाटक कर रहे थे और इन्होंने उस जनसभा में घोषणा भी कर दिया था अपनी ओर से कि …..राशि दिया आपको। लेकिन बिहार वालों को आज तक वह राशि नहीं मिली। मानता हूं कि घोषणा करना राजनेताओं के झूठे जुबान का अंश बन जाता है पर प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक दायित्व के पद पर बैठा आदमी यदि इस तरह की खोखली घोषणा करता है तो यह निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण माना जाएगा।

क्या मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल के आईसीयू में घुस कर चमकी बुखार पर लगातार चार दिनों तक गला फार फार कर चिल्लाने वाली अंजना ओम कश्यप और अन्य मीडियावालों को ये बातें दिखाई नहीं देती कि केंद्र की उस समय भी नाकामी थी और आज भी है? परन्तु धोषित राशि की बात है तो यह एक कटु सत्य है कि वह राशि न तो आज तक बिहार को मिला और शायद भविष्य में भी मिलने वाला नहीं है। क्योंकि यदि बिहार को वह राशि मिल गई होती और उससे कोसी क्षेत्र के लोगों के हित में काम हो जाता तो राजनीति का बीज ही समाप्त हो चुका होता।

सच्चाई तो यही है कि लोगों को यदि उसके हिस्से का हक दे दिया गया और बिहार से गरीबी मिट गई तो प्रदेश के लोगों का पलायन रूक जाएगा। प्रदेश के लोग यदि खुशहाल जीवन जीने लगेंगे तो इसका दो नुकसान होगा इन नेताओं को। पहला यह कि इनकी राजनीति की दुकान बंदी के कागार पर पहुंच जाएगी और लोग इनके बातों में न आकर बौद्धिकता के साथ अपने यहां पार्टी लाईन से उठकर बेहतर प्रत्याशी तलाशने लगेंगे। क्योंकि चाणक्य की राजनीति पढ़ी यह भूमि देश को वह दिशा दे सकती है जिसकी कोई कल्पणा नहीं कर सकते। दूसरी बात यह कि देश के विभिन्न शहरों, नगरों और महानगरों के विकास की रफ्तार थम सी जाएगी क्योंकि देश एक बड़ी श्रमशक्ति अपने घरों को विकसित करने में खप जाएगी।

फैक्ट्रियों को, बिल्डरों को, दुकानदारों को और यहां तक कि घरेलू काम करवाने धनाढ्य लोगों को सस्ते मजदूर और नौकर मिलने दुर्लभ हो जाएंगे। अब सवाल फिर से घूमकर यह उठता है कि किसी भी मीडिया वालों ने नितीश को घेरने के साथ केंद्र उसकी लापरवाही और झूठे घोषणाओं को लेकर घेरने का प्रयास क्यों नहीं किया? क्या उसे ऐसा करने की हिदायत है या फिर उनके पास ज्ञान नहीं? यदि ज्ञान का अभाव है तो विभिन्न श्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है। वहां के स्थानीय निवासियों से संपर्क कर वर्षों पुरानी कहानी से रूबरू होकर तटस्थ पत्रकारिता की जा सकती है।

इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी राज्य सरकार को प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए जिस खर्च की जरूरत होती है वह खर्च केंद्र सरकार की ओर से दिया जाता है क्योंकि राजस्व का सारा संग्रह कंद्र सरकार द्वारा ही किया जाता है और उसका एक निश्चित प्रतिशत राज्य सरकारों को आबंटित किया जाता है। मगर बिहार को यह अंश पाने के लिए सिवा मुंहतक्की के कुछ नहीं मिलता। इस पूरे प्रकरण में हर तरह से जनता ही पिस रही है। आखिर कब तक वह पिसती रहे? क्या इसका कोई ठोस जवाब है या नहीं?

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