पहले जो डकैत होते थे वे समाज और व्यवस्था के अन्याय के शिकार लोग थे। उनकी त्रासदी हृदयस्पर्शी होती थी। इसी कारण मुझे जीने दो जैसी चम्बल के डकैतों की विडम्बना को लेकर कालजयी फिल्में बनीं और कृश्नचंदर जैसे उपन्यासकारों की कलम भी चम्बल के डकैतों पर चली।

श्रवण जब कंचे, गिल्ली-डंडा खेलत हते, तबही से बड़े-बुजुर्गन से सुनत रहे थे कि चम्बल के बीहड़ में बड़े-बड़े डकैत होत हैं। हमारी मम्मी ने तो न सुलाओ, लेकिन गांव जाते तब हमें बताओ जातो कि जल्दी सो जाओ नहीं तो बागी उठा लै जांगे। शोले फिल्म के ठीक उस डायलॉग की तरह कि सोजा बेटा नहीं तो गब्बर आ जाएगा। खैर, जब होश संभाला तो हमारे मन में बागियन की फोटू कछु ऐसी थी- ललाट पर लंबा सा तिलक, घनी दाढ़ी-मूंछ, कांधे पर बंदूक और बीहड़ों में तेज गति से भागते घो़ड़े। यह फिल्मी छवि थी। बाद में गांव बारेअन ने बता दओ कि चम्बल के बीहड़ में बागियन के पास घोड़ा न पहले रहे, न अबे हैं। पढ़वे-लिखवे को काम शुरू करो, तो हर दूसरे दिना खबर आती कि फलां गांव में बागी आए और रुपैयन के लाने कोऊ उठाकर ले गए, तो कोऊ ये गोली मारकर भगवान के पास भेज दओ। अखबारन में ऐसी खबरें पढ़-पढ़ के श्रवण के मन में आओ कि काहेन बीहड़ में जाकै बागियन ते मिलो जाए। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान समेत।
चम्बलमें अब डकैत नहीं रहे। डकैतों के जो ऐतिहासिक समर्पण हुए, उसके बाद बागियों की नस्ल खत्म हो गई और चम्बल व उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में (जो पचनदा क्षेत्र कहलाता है) विशुद्ध आपराधिक मानसिकता के लोगों का बंदूक उठाकर बीहड़ में कूद जाना फैशन बन गया। दोनों धाराओं में कोई तालमेल नहीं है।
पहले जो डकैत होते थे वे समाज और व्यवस्था के अन्याय के शिकार लोग थे। उनकी त्रासदी हृदयस्पर्शी होती थी। इसी कारण मुझे जीने दो जैसी चम्बल के डकैतों की विडम्बना को लेकर कालजयी फिल्में बनीं और कृश्नचंदर जैसे उपन्यासकारों की कलम भी चम्बल के डकैतों पर चली। पुतलीबाई को लेकर उनका उपन्यास चम्बल की चमेली काफी चर्चित रहा। 12 की पीढ़ी के पहले के डकैत अपने को बागी कहते थे और उस समय के समाज सुधारक भी मानते थे कि वे बागी हैं और उनके डकैत होने के पीछे अपराधी वे नहीं व्यवस्था है जिसमें सुधार होना चाहिए। चम्बल के डकैतों के समर्पण के लिए काफी भूमिका निभाई। मोहर सिंह और माधोसिंह ने जेपी के प्रयासों से ही समर्पण किया था, लेकिन पुण्य के यह काम बाद में किस तरह घोर पाप के पर्याय बनते गए
उस समय मलखान सिंह का गिरोह पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती था। भिंड के तत्कालीन एसपी विजय रमन जिन्होंने दस्यु समस्या का पोषण करने वाले राजनीतिक मगरमच्छों और अन्य प्रभावशाली सफेदपोशों को बेनकाब करने में ऐसी भूमिका निभाई कि जब भी चम्बल की दस्यु समस्या का जिक्र होगा वह विजय रमन के बिना पूरा नहीं हो सकेगा। यह वही विजयरमन हैं जिन्हें कश्मीर में तैनाती के समय कुख्यात आतंकवादी गाजी बाबा को ढेर करने का श्रेय प्राप्त है और जो लम्बे समय तक एसपीजी में तैनात रहकर दिल्ली की सत्ता के केंद्र के बेहद नजदीक रहे। खैर जिन असरदार लोगों कादस्युओं से मिलीभगत में उन्होंने भंडाफोड़ किया उनमें से एक का बेटा उत्तर प्रदेश की कैबिनेट का सदस्य रहा है। विजय रमन ने एक दिन मुझसे कहा किउनके पास दस्यु मलखान की खबरें आ रही हैं कि वह हथियार डालना चाहता है तुम ट्राई करो। अगर वह बिना शर्त तैयार हो जाए तो पुलिस का एक बहुत बड़ा सिरदर्द खत्म हो जाएगा। इसके बाद तमाम छुटभैया डकैतों को हम लोग आसानी से ठिकाने लगा देंगे।
मलखान के गांव बिलाव के ही रहने वाले थे और मलखान उनका शिष्य भी रहा था। उन्होंने मलखान के सम्पर्क सूत्रों से मुझे मिलवाया। मलखान के कहने से रातोंरात विजय रमन का स्थानांतरण हो गया और उसकी संस्तुति पर एक विवादित आईपीएस अफसर भिंड के एसपी बना दिए गए। फिर समर्पण क्या मलखान का अभिनंदन समारोह हुआ, लेकिन मलखान सिंह की छवि अच्छी थी जिससे न चाहते हुए भी लोगों ने भिंड के एसएएफ ग्राउंड में अर्जुन सिंह के सामने हुए उस तमाशे में खलल नहीं डाला। इसके बाद तो दस्यु समर्पण ने एक व्यापार का रूप ले लिया। धड़ाधड़ समर्पण हुए और डकैत पकड़ करके पैसे कमाने के बाद मध्य प्रदेश सरकार के सम्मानित मेहमान बनने लग गए। कानून की कमंद से तो उन्हें छुटकारा दिला ही दिया जाता था। भले ही मध्य प्रदेश पुलिस को इसके लिए उनके द्वारा पीड़ित किए गए लोगों और उनके परिजनों को भयभीत करने के कैसे भी हथकंडे क्यों न इस्तेमाल करने पड़ें।
समर्पण में प्रमुख डकैतों में मात्र फक्कड़ का गिरोह बचा रह गया था, जो बाद में आने वाली डकैतों की पीढ़ी में गुरु महाराजया मास्टरमाइंड के रूप में स्थापित हुआ। जब भिंड केतत्कालीन एसपी जो अब स्वर्गीय हो चुके हैं, आलोक टंडन द्वारा की गई कार्रवाइयों से फक्कड़ पस्त हो चुका था। वह समर्पण के लिए बेहद व्याकुलता दिखाने लगा और उसका संदेश मेरे पास आया। जालौन के तत्कालीन एसएसपी एके सिंह के कहने पर मैं उसके द्वारा बताए गए नरौल के पास के बीहड़ में उससे मिलने गया। उस दिन मध्य प्रदेश के इलाके में एक बड़ी वारदात हो गई थी, जिससे वहां एसएएफ तक ले जाई गई। नतीजतन फक्कड़ उस क्षेत्र से हट गया।
क्योंकि जब तक वह डकैत रहा। उसके कुछ उसूल रहे, लेकिन निर्भय को क्या कहा जाएगा? समर्पण के सिलसिले में तब तक कानपुर केआईजी हो चुके बीएल यादव के कहने पर मैंने चकरनगर क्षेत्र में एक पूरी रात उसके अड्डे पर उसके साथ बिताई। बहरहाल निर्भय गूजर एक शुद्ध अपराधी था। पहले बागियों पर फिल्में बनती थीं तो उनका नैतिक औचित्य और नैतिक आधार था। वे लोग चम्बल की ऐतिहासिक बागी परम्परा से अपने को जुड़ा महसूस करने वाले लोग थे आदमी के अंदर की सृजनात्मकता को सर्वश्रेष्ठ रूप में उकेरनेका माध्यम हुआ करता था। आज वह किस दिशा में पहुंच गया है न केवल वह मुनाफे के स्वार्थ के लिए समाज के रुचिबोध को औसत से नीचे तक ले जा रहा है बल्कि ऐसे लोगों को उत्सवमूर्ति के रूप में स्थापित कर रहा है, जो नकारात्मक चर्चा करने लायक भी नहीं है।
