खलक किसान सरकार का, कुछ हलक में कुछ हलक की ओर.. घर में पसरा है मातम, खुला किसान श्मशान की ओर।।-आनन्द मुरारी, संपादक टाल चौपाल

भारत सरकार ने अमेरिकन सरकार से कृषि संबंधित कुछ समझौता किया है जो देश के किसानों को दिग्भ्रमित कर रहा है । देश भर में एक किसान ही है जिसकी हालत आज सबसे बदतर है। एक कृषि ही ऐसा उद्योग है जो लगातार घाटे में चल रहा है। इस उद्योग में जुड़े जितने भी लोग हैं, किसी के भी हालात अच्छे नहीं हैं। पिछले चार-पाँच दशकों से कृषि व्यवस्था को संचालित करने वाले संवैधनिक पदों पर बैठे लोगों ने धीरे-धीरे इस उद्योग की कमर ही तोड़ दी। इन्होंने धीरे-धीरे किसानों को कमजोर, लाचार और विकलांग बना दिया है। किसानों को सब्सिडी, अनुदान और मुआवजा की बैसाखी के सहारे चलने को मजबूर किया जा रहा है। ये लोग सब्सिडी, अनुदान और मुआवजा को दम तोड़ते किसानों के लिए सहानुभूति रूपी हथियार के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे हैं। हालाँकि इस सारी व्यवस्था में हम किसान भी दोषी हैं। सब्सिडी, अनुदान और मुआवजा का लड्डू आया नहीं कि सभी किसान बंधु सब कुछ भूलकर सब्सिडी, अनुदान और मुआवजा रूपी बैसाखी के बिना नहीं चल पा रहे हैं। इस चक्कर में किसान कभी कभी अपना नुकसान भी कर बैठते हैं। सम्यक् दृष्टि से देखने पर यह महसूस होता है कि इस व्यवस्था से किसानों को लाभ से ज्यादा नुकसान है। लेकिन वर्तमान समय में इस व्वस्था में चलना किसानों को मजबूरी है। लेकिन किसानों की माली हालत को सुधारने में यह कारगर कदम नहीं है और इस बात को किसानों को भी समझना पड़ेगा। किसानों को इस सब्सिडी, अनुदान, मुआवजा और फसल बीमा रूपी जाल को समझना पड़ेगा और इससे निकलना पड़ेगा। कृषि में उपयोग होने वाले जितने भी उत्पाद पर सब्सिडी है उन सभी के दाम ज्यादा रहते हैं और वे निर्धारित मूल्य पर ही मिलते हैं। खुले बाजार में वही उत्पाद या उससे मिलता जुलता उत्पाद का दाम कम रहता है और निर्धारित मूल्य से 15-20-25 प्रतिशत तक कम में मिलता है चाहे वह कृषि यंत्र हो या दवा। अनुदान और मुआवजा खास और चिन्हित किसानों को मिलता है। कुछ होशियार और चालाक किसान जो प्रखंड कार्यालय का चक्कर लगाते रहते हैं पुरस्कार के रूप् में अनुदान और मुआवजा पा लेते हैं। सीधे-सीधे अधिकतर किसान इस लाभकारी योजना से वंचित रह जाते हैं। फसल बीमा एक नई लूट की योजना है जिसका प्रवेश पिछले कुछ एक वर्षों से कृषि उद्योग में हुआ है। बीमा कम्पनी किसानों से फसल बीमा की किस्त (प्रिमियम) तो लेती है, लेकिन मुआवजा देने में आनाकानी करती है। बैंक में किसानों के खाते से बगैर किसानों की जानकारी के फसल बीमा की राशि काट ली जाती है। किसानों को यह भी पता नहीं रहता कि उसकी फसल का बीमा किस कम्पनी ने किस शर्तों पर किया है। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की गई है। इस योजना का प्रसार प्रचार भी हो रहा है लेकिन यह शहरों तक ही सीमित है। गाँव और खेत खलिहान में काम करने वाले किसानों को इसकी तकनीकी जानकारी नहीं मिल पाती है। किसानों को यह भी सोचना पड़ेगा कि वे अपनी तमाम जरूरत के सामान खुले बाजार में खरीदते हैं। वे अपना व अपने परिवार का कपड़ा, घर बनाने का इन्तकाल हुए परिवार के सदस्यों का क्रिया कर्म जैसे कई अन्य कार्यों में उन्हें कहीं से कोई सब्सिडी, अनुदान या मुआवजा नहीं मिलता है। खेती में उपयोग होने वाले मुख्य समान जैसे श्रम (अपना, परिवार के सदस्यों का एवं मजदूरों का) मिट्टी (खेत), बीज, पानी और वातावरण इन सभी पर कभी सब्सिडी और अनुदान और मिलता है। कुछ बीज सब्सिडी में आते हैं लेकिन लचर व्यवस्था के चलते प्रखंड कार्यालय में विलम्ब से पहुँचते हैं। वैसे इन बीजों पर अधिकतर किसानों को भरोसा कम ही रहता है। सब्सिडी मिलती है कृषि यंत्रों, दवाओं और कुछ बीजों पर जिसका बहुत बड़ा बाजार है। कृषि बजट का बहुत बड़ा हिस्सा सब्सिडी के लिए स्वीकृत होता है। आखिर क्यों होता है? इस विषय पर किसानों को गंभीरतापूर्वक सोचना पड़ेगा। जब किसान अपनी तमाम जरूरत के सामान खुले बाजार में खरीदते हैं, कृषि में उपयोग होने वाले प्रमुख सामान पर जब कोई सब्सिडी नहीं, तो वे कुछ सामानों पर सब्सिडी लेकर क्यों अपने हिस्से के बजट, जो सरकार स्वीकृत करती है, को बंदर बाँट का हिस्सा बनाते हैं। किसानों को फायदा और राहत देने वाली इस सभी कथित लाभकारी योजनाओं को समझना पड़ेगा कि ये योजनाएँ हकीकत में उनके लिए लाभकारी हैं या नहीं। इनमें अज्ञात रूप से व्याप्त भ्रष्टाचार को भी समझना पड़ेगा कि हमें कितना फायदा और देख को कितना नुकसान हो रहा है। इन सभी लाभकारी योजनाओं का अन्वेषित अध्ययन करने पर पता चलता है कि इन योजनाओं से किसानों को लाभ कम और इनकी व्यवस्था में शामिल लोगों को फायदा ज्यादा मिलता है। सब्सिडी, अनुदान, मुआवजा और फसल बीमा की जो यह व्यवस्था है, वह भ्रष्टाचार की गंगा है और इस बहती गंगा में व्यवस्था से जुड़े लोग और इसे संचालित करने वाले लोगों के लिए डुबकी लगाने की भरपूर जगह है सिवाए किसान के। इस व्यवस्था में कृषि उद्योग पर आधारित जितने भी उद्योग हैं वे सभी फायदे में चल रहे हैं। खाद बनाने वाले फायदे में, दवा बनाने वाले फायदे में, बीज वाले फायदे में, कृषि यंत्रा बनाने वाले फायदे में और बीमा कम्पनी भी फायदे में बस सिर्फ कृषि उद्योग घाटे में और तो और कृषि उत्पाद पर आधारित जितने भी उद्योग हैं वे सभी फायदे में ही चल रहे हैं। चावल, आटा, दाल, तेल, रिफाईन, अचार, साॅस, चिप्स, दालमोट, मशाला आदि सैकड़ों उत्पाद जो कृषि उत्पाद से बनते हैं, को बनाने वाले उद्योग हमेशा फायदे में रहते हैं। होटलों में केवल कृषि उत्पाद का उपयोग होता है। वे हमेशा फायदे में चलते हैं। सबसे बड़ी बात है कि इन सभी उद्योगों में कृषि उत्पाद जो लागत होती है, उससे कई गुना ज्यादा ये लोग अपने नये उत्पाद का मूल्य तय कर बाजार में बेचते हैं। हमारे देश में एक कृषि उद्योग ही है जिसके उत्पाद के मूल्य का निर्धारण उसके उत्पादक नहीं करते हैं। इस देश में जितने भी कृषि उत्पाद से नये उत्पाद बनाने वाले उत्पादक नहीं करते हैं, ये सभी मूल्य का निर्धारण स्वयं करते हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि किसानों के उत्पाद के मूल्य का निर्धारण उसके खरीददार करते हैं। संवैधानिक रूप से कुछ फसलों का रेट निर्धारित होता है जिसमें किसानों की भागीदारी नहीं होती हैं। खेती के स्वरूप से अनभिज्ञ, स्थिित परिस्थिति और सम्स्याओं से अंजान वातानुकूलित कार्यालय में बैठे कोट पैंट वाले बाबू लोग फटेहाल किसानों के खून पसीने से सिंचिंत फसलों का मूल्य निर्धारण कर देते हैं। किसानों की समस्या तब और विकराल रूप धारण कर लेती है जब सरकार के द्वारा निर्धारित मूल्य पर भी खरीद में कोताही बरती जाती हैं। कृषि उत्पाद खरीद के नाम पर राजनीति होने लगती है। सरकारी संस्थाएँ एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपना पल्ले झाड़ लेती हैं और किसानों को बाजार में व्यापारियों के बीच पिसने के लिए छोड़ देती हैं। कृषि उत्पाद से जुड़े व्यापारी फटेहाल किसानों का सब कुछ नोच लेना चाहते हैं। सभी जगहों से लुटता किसान जब अपना उत्पाद मंडी में ले जाता है तो व्यापारी सब कुछ उसका लूट लेना चाहते हैं। किसान अपनी फसल का उत्पाद अपने पूरे परिवार के साथ काफी उत्साह और मेहनत से करता है। अपनी जमा पूँजी सभी कुछ झोंक देता है। प्रकृति से लड़ता है, गर्मी, वर्षा और ठंड जैसे प्रतिकूल वातावरण में भी अपनी मजबूत इच्छा शक्ति से फसल का उत्पादन करता है। ज्यों ही फसल तैयार होती है और नयी फसल बाजार में आती है उसके भाव लुढ़क जाते हैं। कुछ ही दिन पहले फसलों की आसमान छूती कीमतें नई फसल आने के साथ जमीन पर आ गिरती हैं। नयी फसल को रखने की जगह किसानों के पास नहीं है। फसल को रखने के लिए सरकारी स्तर पर भंडारण की भी व्यवस्था नहीं है। लाचार किसानों के पास कम कीमत में अपनी फसल बेचने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। फसलों के दामों में उछाल आना और फिर तेजी से लुढ़कना ऐसा मंजर शेयर बाजार में भी देखने को नहीं मिलता है और यह सारा खेल व्यापारी करता है। साल दर साल ऐसी ही परिस्थिति को झेलते झेलते भारतीय किसान ही हालत मरणासन्न हो गई है। अपनी पूरी जिन्दगी चैबीसों घंटे काम करने वाला किसान अपने लिए एक मकान नहीं बना पाता है, अपने बच्चों को अच्छी तरह से नहीं पढ़ा पाता है और न ही अपने पारिवार के किसी अस्वस्थ व्यक्ति का इलाज करवा पाता है। कभी कभी जब परिवार के किसी सदस्य को गंभीर रोग हो जाता है, बेटी की शादी करनी हो या आपदा विपदा से मकान टूट गया हो ऐसी परिस्थिति में किसान और टूट जाता है, कर्जदार हो जाता है। कर्ज नहीं चुकाने की स्थिति में आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाता है। अधिकतर किसानों के हाथ खाली होते हैं, वे कोई काम हमेशा ले देकर ही करते हैं। फसल की बुआई से लेकर सिंचाई और कटनी तक का काम करते-करते सभी किसानों पर कर्ज चढ़ ही जाता है जिससे वे नई फसल को भी कम दामों पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं। हिसाब करने पर हाथ खाली हो जाता है। हाँ! मजदूरी के रूप में पेट भरने के लिए कुछ अनाज घर में रह जाता है जिससे वे अपना और अपने परिवार के पेट की ज्वाला शांत करते हैं। चिंता फिर सताती है अगली फसल की बुआई की, चिंता सताती है बच्चों की पढ़ाई की, चिंता सताती है बेटी की शादी की, चिंता सताती है अंजाने संकट की। ऐसी कई चिंताओं से घिरा किसान जब अपने खेत पर पहुँचता है अगली फसल की बुआई के लिए और उस फसल के भविष्य के बारे में सोचता है तो सिहर उठता है उसे ऐसा लगता है मानों खेत में नहीं, श्मशान में खड़ा है। ऐसी परिस्थिति में किसान खेत में जो जाते हैं लेकिन वही खेत उनके लिए श्मशान बनते जा रहे हैं। हाँ, वास्तव में किसानों के लिए समस्या इतनी गंभीर हो गई है, पूरे देश भर में इतने बड़े पैमाने पर किसानों की आत्महत्या यही दर्शाती है। इस आग लगी महँगाई और भष्ट्राचार के दौर में यह तो अभी शुरूआत है। अगर वक्त रहते इस भ्रष्ट व्यवस्था को खत्म नहीं किया गया तो स्थिति और वीभत्स हो जाएगी। जब तक भ्रष्टाचार की गंगा को रोका नहीं जाएगा, जब तक किसान अपनी योजना खुद नहीं बनायेंगे, जब तक किसान कृषि के क्षेत्र में आवंटित राशि को अपनी योजना के अनुसार खर्च नहीं करेंगे, जब कृषि के क्षेत्रा में आवंटित राशि नहीं मिलेगा जब तक किसान अपने उत्पाद के दाम खुद तय नहीं करेंगे, जब तक कृषि उत्पाद का आयात और निर्यात किसानों के हाथ में नहीं रहेगा, तब तक इस देश में किसानों का भला नहीं होने वाला है और किसानों के लिए खेत श्मशान बनते रहेंगे।
