राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका से सोयाबीन, मक्का, कपास, फल, बादाम और डेयरी उत्पादों के संभावित शून्य शुल्क आयात से द…

मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने पंजाब के बरनाला में आयोजित किसान महाचौपाल में केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की आम आदमी पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोला। विशाल जनसमूह की मौजूदगी में दोनों नेताओं ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को भारतीय कृषि के लिए “घातक” बताते हुए इसे छोटे और सीमांत किसानों पर सीधा प्रहार करार दिया।
हालांकि इस बड़े आयोजन के बीच एक सवाल बार-बार उठता रहा—जब किसान मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर की लड़ाई का दावा किया जा रहा है, तब पार्टी की अपनी किसान इकाई और अन्य विभाग कहां हैं?
ट्रेड डील पर कांग्रेस का हमला
राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका से सोयाबीन, मक्का, कपास, फल, बादाम और डेयरी उत्पादों के संभावित शून्य शुल्क आयात से देश के किसानों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बुरी तरह प्रभावित होगी। उनका तर्क था कि अमेरिका की हजारों एकड़ में फैली मशीनीकृत खेती का मुकाबला 1-2 एकड़ वाले भारतीय किसान कैसे करेंगे? सस्ती सब्सिडी आधारित आयात से फसलों के दाम गिरेंगे, जिससे पंजाब-हरियाणा के गेहूं-धान उत्पादकों, मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसानों, निमाड़ के कपास उत्पादकों और पहाड़ी राज्यों के बागवानों पर दबाव बढ़ेगा।
खरगे ने भी कहा कि कांग्रेस की सरकारों ने नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक सिंचाई, बांध और ऊर्जा ढांचे के माध्यम से किसानों को मजबूत किया, जबकि मौजूदा नीतियां “विदेशी डंपिंग” को बढ़ावा देकर किसानों को असुरक्षित बना रही हैं। उन्होंने पंजाब में कानून-व्यवस्था के मुद्दे उठाए, लेकिन मुख्य फोकस व्यापार समझौते के संभावित कृषि प्रभाव पर ही रहा।
कांग्रेस नेताओं ने एमएसपी की कानूनी गारंटी, मनरेगा को सशक्त बनाने और छोटे उद्योगों की सुरक्षा का वादा दोहराया।
महाचौपाल में जहां युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता सक्रिय दिखे, वहीं अखिल भारतीय कांग्रेस (AICC) के कई विभागों और प्रकोष्ठों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी। विशेषकर किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखपाल सिंह खैरा की गैरमौजूदगी ने सवाल खड़े किए।
किसान-केंद्रित इस बड़े आयोजन में संबंधित इकाई के शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति को लेकर पार्टी के भीतर असहजता देखी गई। यही स्थिति महिला कांग्रेस, ओबीसी विभाग, अल्पसंख्यक सेल और एससी-एसटी प्रकोष्ठ सहित अन्य इकाइयों को लेकर भी चर्चा में रही।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि राज्यसभा चुनावों के बाद संगठनात्मक ढांचे में व्यापक बदलाव के संकेत हैं। निष्क्रिय माने जा रहे विभागों में नई टीम और नई ऊर्जा लाने की तैयारी चल रही है। नेतृत्व का मानना है कि यदि पार्टी को किसान-मजदूर आंदोलन की धुरी बनना है तो उसके विभागों को केवल औपचारिक उपस्थिति से आगे बढ़कर जमीनी सक्रियता दिखानी होगी।
कांग्रेस ने दावा किया कि किसान बहुल 8 राज्यों में चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा। भोपाल में हुई महाचौपाल के बाद बरनाला का आयोजन इस अभियान को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का प्रयास बताया गया। किसान संगठनों ने भी प्रस्तावित व्यापार समझौते पर आपत्तियां दर्ज की हैं, जबकि सरकार का कहना है कि कृषि और डेयरी हितों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधान होंगे। विपक्ष इसे किसानों के हितों से समझौता मान रहा है।
राहुल गांधी ने कहा, “काले कृषि कानूनों की तरह यह समझौता भी किसानों को असुरक्षित करेगा। कांग्रेस किसानों और मजदूरों के साथ खड़ी रहेगी और एमएसपी की कानूनी गारंटी के लिए संघर्ष करेगी।”
बरनाला की महाचौपाल ने दो समानांतर संदेश दिए—
एक, व्यापार समझौते के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रामक राजनीतिक लड़ाई; दूसरा, कांग्रेस संगठन के भीतर आत्ममंथन और संभावित बदलाव का संकेत।
यदि पार्टी अपने विभागों और प्रकोष्ठों को सक्रिय कर पाती है तो आंदोलन को व्यापक आधार मिल सकता है। अन्यथा किसान-मुद्दों पर राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक ताकत के बीच की खाई सवाल बनकर खड़ी रहेगी। किसान महाचौपाल ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले महीनों में कृषि, व्यापार नीति और एमएसपी का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहेगा—और कांग्रेस के लिए यह सिर्फ सरकार से संघर्ष नहीं, बल्कि अपने संगठन को भी धारदार बनाने की परीक्षा है।
