बेटा,भाई,भतीजाबाद बिहार की नियति-अब कोई भी सवाल नहीं करेगा क्योंकि यही है कल का बिहार

बिहार तेजी से बदल रहा है, आज हमारे बिहार कि आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे दबी है और जीते जी मर रही है। बाकी गरीबी रेखा से लटकी कभी ऊपर और कभी नीचे हो रही है- जिम्नास्ट की तरह। कुछ लोग कहते हैं-बिहार आज विकास कि पीड़ा से गुजर रहा हैं।

कुछ कहते हैं-यह तो पीड़ा का विकास है। समझ का फेर है! दिल्ली के प्रभु, जो विकास के लिए प्रतिबद्ध है, कह रहे हैं-विकास चाहिए, तो पीड़ा से गुजरना ही होगा। पटना के प्रभु, जो जवाबदेह हैं, समझ नहीं पा रहे कि वो जो कुछ कर रहे हैं, वह सचमुच विकास है या सिर्फ पीड़ा! और, प्रजा बोले तो हम आप, जिसको विकास चाहिए, समझ नहीं पा रही कि अगर यही विकास है, तो पीड़ा किसे कहेंगे! आज का बिहार क्या है, क्यों ऐसा है, कब तक ऐसा रहेगा-कुछ समझ में नहीं आता। आज अपना बिहार देश का प्रश्न प्रदेश हो गया है-यक्ष प्रश्नी प्रदेश। किस मिटटी के बने हैं हम आप यानि यहाँ के लोग ? बिडंबना देखिए आज तक बिहार के लोग बिहारी होनें या बिहारीपन को परिभाषित भी नहीं कर पाएं है! हम आप या तो राजपूत है, भूमिहार है, यादव है, कुर्मी-कोयरी, मुसहर, चमार, पासवान है या फिर भारतीय हैं -अन्य प्रदेशों के बंगाली, मराठी, तमिल कि तरह बिहारी नहीं हैं। बिहार के होकर भी बिहारी ना हो सकने वालों को बिहार क्या है, क्यों नहीं समझ में आया है? बिहार में आर्थिक विकास के साथ-साथ मानव विकास के लिए, राज्य सरकार ने अपनी सात प्रतिबद्धताओं या सात निश्चय के माध्यम से अपने मानव विकास एजेंडा को जोरदार रूप से रेखांकित किया है। आर्थिक हल, युवाओं को बल, युवाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए। आरक्षित रोजगार महिला का अधिकार, महिलाओं को उनके अधिकार के रूप में रोजगार सुनिश्चित करने के लिए। हर घर बिजली लगातार, इस योजना को राज्य के प्रत्येक घर को मुफ्त बिजली कनेक्शन प्रदान करने के उद्देश्य से शुभारंभ किया गया है। राज्य में बीपीएल परिवारों को केंद्र सरकार के दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत पहले से ही कवर किया जा रहा है। हर घर में नल द्वारा पानी उपलब्ध कराने के लिए। घर तक पक्की गली-नालियां, पक्की सड़क और हर घर में नालियों का निर्माण करने के लिए। शौचालय निर्माण घर का सम्मान, इस योजना को वर्ष 2019 तक बाह्य शौचालय के बुरे अभ्यास को समाप्त करने के उद्देश्य से लॉन्च किया गया था। उद्देश्य प्राप्त करने के लिए, राज्य सरकार प्रत्येक घर में शौचालय बनाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। इस योजना के तहत राज्य सरकार, राज्य भर में सामुदायिक शौचालयों के निर्माण पर बड़ी राशि का निवेश करेगी। अवसर बढे, आगे पढ़े, उच्च शिक्षा के लिए बेहतर सुविधाएं प्रदान हेतु। सात निश्चय को प्राप्त करने के लिए बिहार सरकार की योजनाएं, अपराध से महिला सुरक्षा के लिए बिहार में सुरक्षित शहर निगरानी योजना, इस योजना के तहत, बिहार सरकार राज्य के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे स्थापित करेगी। इसके साथ ही राज्य सरकार 2 लाख से अधिक आबादी वाले नगर निगमों और कस्बों को बेहतर यातायात प्रबंधन के लिए 9 यातायात थाना (यातायात पुलिस स्टेशन) स्थापित करेगा तथा 1485 अधिकारियों की नियुक्ति करेगी। वाई-फाई कैंपस योजना के तहत निरूशुल्क वाई-फाई सेवा, सरकार वाई-फाई कैंपस योजना के तहत मुफ्त वाई-फाई सेवा प्रदान करेगी।

इस योजना के तहत, बिहार के लगभग 300 कॉलेजों को निःशुल्क वाई-फाई सेवा से लैस किया जायेगा। साथ ही साथ राज्य सरकार 23 करोड़ रुपये प्रदान करेगी जिसके तहत सौर पैनल स्थापित की जाएगी जिससे वाई-फाई सुविधा लगातार काम कर सके। पत्रकार सम्मान योजना- पत्रकार के लिए पेंशन योजना, पेंशन नियमों में कुछ संशोधन करके इसका नाम बिहार पत्रकार पेंशन योजना से बदल दिया गया था। इस योजना के तहत, बिहार सरकार 20 साल का न्यूनतम अनुभव रखने वाले 60 वर्ष से अधिक उम्र के प्रत्येक सेवानिवृत्त पत्रकार को पेंशन के रूप में 5,000 रुपये प्रति माह की राशि देगी। चैथी श्रेणी सरकारी कर्मचारियों के लिए आवास योजना, इस योजना के तहत, बिहार सरकार विशेष रूप से चैथे श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों के लिए आवास परियोजनाओं का विकास करेगी और उन्हें सभी बुनियादी आवासीय सुविधाओं के साथ सस्ते घर प्रदान करेगी। कौशल प्रशिक्षण योजना के तहत कुशल युवा कार्यक्रम, इस योजना की घोषणा राज्य सरकार की सात निश्चय में एक आर्थिक हल, युवाओं को बल के तहत किया गया है जिसका उद्देश्य शिक्षित, कौशल और नियोजित युवाओं के मामले में राज्य को बेहतर स्थान बनाने के लिए किया गया है। प्रधान मंत्री ग्रामीण आवास योजना इस योजना के तहत, राज्य सरकार ने 4.76 लाख परिवारों को किफायती आवास योजना का कार्यान्वयन 31 मार्च के अंत करने का निर्णय लिया गया है। पीएमए योजना के तहत, ग्राम पंचायत को सामाजिक-आर्थिक जनगणना डेटा के आधार पर लाभार्थियों को चुनना और स्वीकृति देना होता है। बिहार छात्र क्रेडिट कार्ड योजना, इस योजना के तहत, राज्य सरकार 12 वीं पास छात्रों को 0ः ब्याज दर पर 4 लाख तक का शिक्षा ऋण प्रदान करेगी। मुख्यमंत्री स्वामी स्वयं सहायता भत्ता योजना, इस योजना का मुख्य उद्देश्य 12वीं पास बेरोजगार युवाओं को अधिकतम दो साल के लिए 1000 ध् माह वित्त पोषित करना है। बिहार की जीडीपी प्रति व्यक्ति आय बिहार की जीडीपी प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे कम है। सभी राज्यों में बिहार की जीडीपी प्रति व्यक्ति आय सबसे नीचे है। बिहार की जीडीपी प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 520 डॉलर है, हालांकि इसके बाद उत्तर प्रदेश का नंबर है। बिहार की बड़े शहरों में राजधानी पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, गया, आरा, दरभंगा, सीवान, पश्चिमि चंपारण और मोकामा आदि हैं। बिहार के प्रमुख उद्योंगो की यदि बात करें तो यहां पर वस्त्र उद्योग, चमड़ उद्योग, चीनी मिल, रेल कारखाना, शराब कारखाना, दवा बनाने का कारखाना, बरौनी में भारतीय तेल निगम का तेलशोधक कारखाना और तमाम सीमेंट कारखाने हैं। राज्य की आय का प्रमुख स्रोत कृषि है। नीतीश प्रदेश के मुख्यमंत्री तो हैं लेकिन उनका सुशासन का वादा हवा-हवाई साबित हो रहा है। आश्चर्य तो इस बात का भी है कि बिहार में प्रतिदिन बढ़ती अपराधिक घटनाओं को देखकर भी मुख्यमंत्री अपना मुंह नहीं खोल रहे हैं। जबकि बिहार में आज न महिलाएं सुरक्षित हैं न जनता की सुरक्षा करने वाली पुलिस ही अपने को सुरक्षित मान सकती है। दिन-प्रतिदिन रंगदार और रसूखदार सत्ता-प्रशासन पर हावी होते जा रहे हैं।

आज नीतीश कुमार का राजनीतिक रवैया बना है, जो उनकी विश्वसनीयता पर ही चोट करता है. लेकिन गौरतलब ये भी है कि अपने इसी राजनीतिक रवैये के साथ नीतीश कुमार बिहार में अपनी सत्ता के 15 साल में हैं और उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा. सीधी बात ये है कि बीजेपी से तालमेल बिठा कर एक और टर्म यहाँ राज्य की सत्ता पर कायम रहने के लिए उन्हें जो सही लग रहा है, वो कर रहे हैं.जब मुसलमानों के वोट के भरोसे उन्हें रहना नहीं है और हिंदुत्व वाली राष्ट्रवादी बयार ही उन्हें अपने सियासी हक में जान पड़ती है, तो सेक्युलर-सेक्युलर खेलते रहने से क्या फायदा? आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को बीजेपी से, यानि अमित शाह और नरेंद्र मोदी से दिल मिला कर ही अपने दल के लिए अधिक-से-अधिक सीटें हथियानी हैं. इस चुनाव में बीजेपी से ज्यादा सीटें नहीं लाएँगे तो राज्य के सत्ता-शीर्ष पर फिर बैठने का उनका दावा खतरे में पड़ सकता है. पिछली बार की तरह ही इस बार 2020 के विधानसभा चुनाव में भी उनका चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे. जबकि दूसरी तरफ बीजेपी के नेताओं की तरफ से ऐसे बयान आए हैं कि अबकी बार चेहरा बदलना चाहिए और मुख्यमंत्री बनाने का मौका बीजेपी को देना चाहिय। आज बिहार में जनसंख्या नियत्रंण तोे लगभग सभी दलों के राजनीतिक एजेंडों से बाहर है. रोपा पंेड बबूर का और आम की उम्मीद बेमानी ही है। अगर आप आम खाना चाहतें हैं तो आम का ही पेंड लगाना होगा लापरवाही से ही सही अगर आपनें आम के जगह पर संपगुल्ला का पेंड लगा दिया तो आपकी लापरवाही आपकी जान ले सकती है या आपके लिए जिन्दगी भर के लिए नासूर बन सकता है। आप बेहतर से बेहतर ईलाज करवाते है और नासूर व रोग से निजात पाते हैं। पिछले 3/4 दशकों में हमारे देश की राजनीति में बाहुबलियों का प्रभुत्व बढा है। सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने और चुनाव को प्रभावित करने के लिए बाहुबलियों को अपना शागिर्द बनाती रही है और बाहुबली भी अपने हिसाब से पार्टियों की शागिर्दी को नफा नुकसान से नवाजते रहे हैं और अपने हिसाब से पाला बदलते भी रहे हैं। विश्वास हो न हो पर ये सच है कि पिछले 3/4 दशकों में गलियांे का चोर, बदमाश, उचक्के राजनीतिक पार्टियों के सहयोग के बदौलत खद्दर पहन चेहरे पर झूठी मुस्कान ला पब्लिक को डरा धमका साम दाम दंड भेद अपना राजनेता बन बैठे। एक समय आया जब राजनीतिक पार्टियंा और ये बाहुबली एक दूसरे की जरूरत बन बैठे और समय के साथ ये बाहुबली समाज को भी अपने साथ कर कुछ तो अपने आप को पुरानी दुनियां से दूर कर सफल व्यावसायिक बना लिया और कुछ खद्दर के अेाट में आज भी अपना साम्राज्य चला रहे हैं। आज भी बाहुबली और राजनीतिक पार्टियंा एक दुसरे की जरूरत हैं। बाहुबलिओं को संरक्षण चाहिए और पार्टियों को सत्ता। सभी पार्टियों को बाहुबलियों पर भरोसा है, अगर मैं सिर्फ केंद्र, उत्तर प्रदेश और बिहार की बातें करूं तो फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के पास सबसे ज्यादा बाहुबली है, हर जाति समुदाय के बाहुबलियों का कनेक्शन यहां मिल जाऐगा। बिहार के चुनाव में सभी पार्टीयों मे जात पात की गोटी पर विसाद बैठाया और बाहुबलियों के लिए पीच तैयार किया, बैटिंग और बाउलिंग पर मंथन किया ।

ये हमारे बिहार का दुर्भाग्य ही है जहां रोटी कपडा और मकान तो दूर की कौरी है और विकास शब्द का उपयोग सिर्फ वोट बनानें और बिगाडनें के लिए किया जाता है। एडीआर के अनुसार वर्तमान बिहार सरकार में 3/4 मंत्री साहब क्रिमिनल है बोले तो 29 में 22 मंत्री जी क्रिमिनल केस झेल रहे हंै। आपको जानकारी दे दूं की आपके चहेते 8 मंत्री साहब सिर्फ 8वीं से 12वीं पास हैं और 18 मंत्री साहब ग्रेजुएट हैं। और हां आपके 29 मंत्री साहब के पास कम से कम 2ण्46 करोड हैैै। आपको याद तो होगी ही की 2015 में आपनें ही तो टोटल 243 में 142 क्रिमिनल केस बाले नेता जी को विधानसभा भेजा था।यानि वर्तमान बिहार विधानसभा में 58ः क्रिमिनल  नेता हैं जिसमें लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल के 80 विधायक में 46 यानि 58ः क्रिमिनल नेता। यही नहीं राष्ट्रीय जनता दल के झनझारपुर से विधायक गुलाब यादव पे तो रेप का भी केस चल रहा है। 10 विधायक जी वैसे भी हैं जिनपर अपहरण जैसे मामले चल रहे हैं। चलो अब मैं आपको अन्य पार्टीयों की भी स्थिति से अवगत करवा दूं। सुशासन बाबू नीतिश कुमार जी की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के 71 विधायक में 37 यानि 52ः क्रिमिनल नेता। मोदी जी की भारतीय जनता पार्टी के 53 विधायक में 34 यानि 64ः क्रिमिनल नेता। राहुल जी की कांग्रेस पार्टी के 27 विधायक में 16 यानि 59ः क्रिमिनल नेता। राम विलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी का रिकोर्ड 100ः क्रिमिनल नेता का हैं वहीं राष्र्टीय लोक समता पार्टी का रिकोर्ड 50ः क्रिमिनल नेता का हैं। और हां इनको मैं कोई क्रिमिनल नेता नहीं बोल रहा हूं वो तो इन्होंनें ही अपने आप को इलेक्सन कमीशन में घोषणा किया है। अब आप ही सोंचिये जब ऐसे नेता को चुनकर आप विधानसभा या लोकसभा में भेजेंगे तो परिणाम क्या होगाघ् लीजिए देखीए बानगी। बिहार इन दिनों एक बार फिर बढ़ती आपराधिक घटनाओं के चलते लगातार सुर्खियों में है। राजधानी पटना में अब सरकार के अफसर भी महफूज नहीं हैं। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे सरकार के रसूख वाले इलाके में भी खून के छीटें उड़ाने से बाज नहीं आ रहे। फिलहाल प्रदेश की जनता इन बढ़ते अपराधों से कराह रही है। यह तो बिहार की कहानी मात्र है इसके जड में अपराधियों का राजनीतिक प्रभाव का बढना है। आज के परिदृश्य में आप देखेगें की आज बिहार मे हर जगह केवल समानता और आरक्षण की बाते की जा रही है, उस समानता की जो पिछले 72 सालों मे भी नहीं आई, लेकिन हर दिन समाज का कोई न कोई वर्ग उसके लिए मांगे करता रहा है और उसे सरकार देती भी रही है। लेकिन आज भी समानता नही है, आखिर क्यों? ये बड़ा प्रश्न है व्यक्ति, समाज और सरकार के लिए!समानता लाने और असमानता को मिटाने के लिए आरक्षण को सीढ़ी बनाया जाता रहा है। ये कितना सही है आप बखुबी समझ सकते है। देखिए ना जिस दिन बिहार के माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद और पावर को बरकरार रखने के लिए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाया था, उसी दिन से यह समझा जाने लगा था कि बिहार में एक बार फिर से वही दिन देखने को मिलेंगे। इस बात को हम सब जानते हैं कि आरजेडी के शासन के वक्त बिहार का क्या हाल था और पर हुआ उल्टा। फिर माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद और अपने पावर को बरकरार रखने के लिए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से हाथ झटक कर बीजेपी बोले तो अपने लंगोटीया यार से पुनः हाथ मिलाया पर एक बार फिर से वही बिहार सुशासन बाला नहीं हमारे सामने आकर खड़ा हो गया है। यही नहीं प्रेस की स्वतंत्रता की हत्या और पत्रकारों की हत्या का मामला अब विधानसभा में जोर शोर से उठ रहा है पत्रकारों पर हमलों को रोकने और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए किए गए उपायों पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है। आप आरक्षण के पक्ष में हो सकते हैं या खिलाफ हो सकते हैं, इसमें कोई समस्या नहीं है। समस्या तब होती है जब आप अपनी बात को गलत तथ्यों के साथ रखते हैं। याद रहे हमारे देश में सभी को जीने का सामान्य अधिकार है। सभी को शिक्षा, प्रगति, शासन शासक बनने का समान अधिकार है। पर आज कुछ खुद ही अपने आपको और अपने समाज को नीचा दिखाकर औरों की अपेक्षा कम आंके जाने की मांग करते देखे जाते हैं। मेरा मानना है कि देश में विकास की कड़ी को जोड़ने के लिए आरक्षण रूपी ऐतिहासिक पहल तो कि गई और इतिहास भी बना मगर विकास या प्रगति का नहीं बल्कि कुछ के भले, भ्रष्टाचार और विनाश का। याद रखें जब आप एडमिशन के लिए टेस्ट दे रहे होते हैं तो जरूर आरक्षण होता है। एक जनरल कैंडिडेट को पता है कि उसके पास कितनी सीट हैं जिन पर उसे मुकाबला करना है। परीक्षा के नतीजे आने के बाद आरक्षण को दोष देना बहुत सामान्य प्रतिक्रिया है। आज आरक्षण के कारण हम बार बार कमजोर लोगों के हाथों में अपने देश की कमान थमा देते रहे है। जो उसको थामने लायक थे ही नहीं। बस उन्हें तो यह मौका आपने आरक्षण के आधार पर देते रहे हंै। आरक्षण के प्रारूप बनाने वालों ने आसमान की बुलंदियों की कल्पना किया था परंतु रिजल्ट आपके सामने हैं कुछ यानि मुट्ठी भर परिवार मात्र। हमारा बिहार आर्थिक रूप से गरीब आज भी नहीं है। मगर शारीरिक और मानसिक अपंग जरूर हो चुका है इसका एक कारण झुनझुना आरक्षण भी है। आज आरक्षण नाम का झुनझुना थमा कर हमारे नेताओं ने प्रत्यक्ष रूप से तो हमारे शुभचिंतक प्रतीत होते हैं पर सच्चाई इससे बिल्कुल उल्टा है; जो समय समय पर साबित भी होता रहा है। भारत की जनसंख्या में बहुतायत आरक्षित वर्ग के बंधुओं की है। ऐसे में वो चाहते ही नहीं की हमारे ऐसे बंधु मानसिक अकर्मण्यता अथवा विकलांगता की बेड़ियों से मुक्त हों, क्योंकि वो अपने वोट बैंक को खोना नहीं चाहते वो नहीं चाहते कि हमारे ऐसे बंधु इतने सजग और विचारवान हो जायें की उनकी हरेक चालों को समझ जायें. अगर हमारे नेतागण इतने ही शुभचिंतक होते तो आरक्षण की सीमा तय करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी. इसके बदले में होना ये चाहिए था कि सभी पिछड़े वर्ग के लोगों को शिक्षा, चिकित्सा, परीक्षा अथवा शिक्षा के लिए आवागमन, आदि की व्यवस्था. कर देते. यह आरक्षण केवल हमें एक सीमित संसाधन जुटा रहा है जिससे हम केवल अपनी विक्लांगता ही छुपा सकते हैं और हम असामान्य ही बने रह सकते हैं. अब आप समझ सकते हैं कि वैशाखी से अच्छा है कि हम लड़खड़ाते हुए ही सही हमें अपने कदमों पे खड़ा होना चाहिए और असामान्य से सामान्य की श्रेणी में लाना चाहिए वजाय इसके कि हम वैशाखी या व्हील चेयर के सहारे दौड़ लगा कर मंजिल हासिल करें. एक शेर को बड़े से बाड़े में स्वच्छन्द छोड़ देने और उस क्षेत्र में किसी और के अतिक्रमण से रोक देने से शेर को खुश नहीं होना चाहिए। उसे तो पूरा जंगल पर राज करने का अधिकार है बशर्ते कि वो मुकाबला करे और खुद की क्षमता को साबित करे. आपको याद करना है कि 1882 में हंटर कमीशन से शुरू हुई इस आरक्षण प्रणाली का 1932 में अंग्रेजों ने अपनी सत्ता का प्रयोग करते हुए एक सांप्रदायिक बंटवारे के तहत दलितों और अन्य धर्मों को बांटने के लिए किया था। महात्मा गांधी ने इसकी कड़ी मुखालफत की, लेकिन अंततः वह इस मुद्दे पर अंबेडकर के साथ समझौते के लिए तैयार हो गए थे। देश की आरक्षण नीति से जुड़े तमाम पहलुओं पर गंभीरता के साथ चर्चा हो। प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अगर लिंग, समुदाय या क्षेत्र आधारित आरक्षण दिया जाता है, तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता, लेकिन आरक्षण के इस प्रावधान के तहत योग्यता को दरकिनार करने का ही परिणाम है कि ब्रेन ड्रेन को लगातार बढ़ावा मिल रहा है। आपको एक जनरल कैंडिडेट ने पछाड़ा है, लेकिन आप खुद की आरक्षण वाले से तुलना करने लगते हैं।

अगर समाज में कानून और न्याय के रखवालों में टकराव हो तो क्या जाति और धर्म की बेडियों से मुक्ति संभव है? धर्म और जाति कि सामाजिक-आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक गतिकी में जल्द कोई परिवर्तन आने कि सम्भावना नहीं है, क्योंकि पुराने घिसेपिटे कानूनों, न्यायपालिका द्वारा उनकी गलत व्याख्या और राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव, अर्थात वे कारक जो उसे ऑक्सीजन देते हैं, आज भी अपरिवर्तित हैं। क्या हम अपने बच्चों को स्वच्छ वातावरण देना चाहते हैं तो जिसे हम अपने बच्चों का गारजियन नही बनाना पसंद  करते उसे संसद के दहलीज से दूर रखना होगा। नहीं तो वाकई इस दीमक का कोई अंत नहीं होगा। बिहार गौतम बुद्ध और महावीर कि जन्मभूमि-कर्मभूमि रही है। इसी राज्य से महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिए आंदोलन की शुरूआत की थी। आज बिहार विकासशील राज्यों की श्रेणी में खड़ा है। उसके लिए सभी का सहयोग जरूरी है। इसके लिए प्रशासन को आम लोगों कि समस्याओं को सुनकर उसका समाधान करना चाहिए ताकि लोगों को किसी तरह कि परेशानी नहीं रहे। बिहार विकास के पथ पर अग्रसर है और आने वाले दिनों में यह विकसित राज्य बनेगा। बिहार का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। माडर्न इंडिया में गांधी जी की कर्मभूमि भी बिहार रही है। हमारा फर्ज है कि बिहार के विकास में हम सक्रिय योगदान करें। पहले बिहार में अपराध का ग्राफ काफी बढ़ा था। आज लोग निर्भीक होकर घूमते हैं। पहले कहीं जाते थे तो बिहारी कहने में शर्म आती थी। आज लोग जानते हैं कि बिहार से आए है तो सम्मान देते हैं। यह बदलाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कारण हुआ है। बिहार अब विकास की ओर बढ़ गया है इसे कोई नहीं रोक सकता। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए। यहां जिस तरह नारी को सम्मान मिला है वे दूसरे राज्यों के लिए भी आदर्श है। बिहार विकास के शिखर पर पहुंचा है। क्या हम अपने बच्चों को स्वच्छ वातावरण देना चाहते हैं तो जिसे हम अपने बच्चों का गारजियन नही बनाना पसंद करते उसे संसद के दहलीज से दूर रखना होगा। नहीं तो वाकई इस दीमक का कोई अंत नहीं होगा। मैं प्रायः सोंचता हंू। कब हम नये बिहार की पौ फटते देखेंगे- बड़े हुलास से आगे बढ़कर उसका स्वागत करेंगे और किसी बहुत मनभाते मेहमान की तरह आँखों में आँखें डालकर, प्यार से हाथ पकड़कर उसे कमरे के भीतर ले आएँगे घूमने दो समय का पहिया, तुम्हारा, आज का यह नया चहेता भी वहीं पहुँचेगा, मुर्दा बरसों के उसी कब्रिस्तान में। सोचो तो कितने कृतघ्न हैं हम- एक दिन जिसको सिर माथे पर लिए फिरे, काम निकल जाने पर उसी को गर्दनियाकर बाहर कर दिया। मिल तो गया जो कुछ मिलता था, अब काहे की ठकुरसुहाती! ठकुरसुहाती हमेशा उगते सूरज की होती है, ढलता सूरज तो ढलता सूरज है। छोड़िए जंगल की दुनिया को, अपनी रोज की दुनिया में आइए। तभी तो मैं कहता हूँ, और कुछ झूठ नहीं कहता, खुद अपने मन को टटोलकर देखिए, समझदारी में आदमी मच्छर के संग तो क्या, पासंग में भी नहीं बैठता। और बिगुल बजने बाला है। लड़ाई शुरू होनेे बाला है। सौ बात की एक बात, आदमी से बढ़कर लाचार और नासमझ जानवर सारी सृष्टि में दूसरा नहीं है, और यह भी उसकी नासमझी का ही एक प्रमाण है कि वह अपने एक पुराने दोस्त को धता बताकर एक अज्ञातकुलशील अजनबी के गले में इस तरह बाँह डालकर पागलों जैसा नाचता फिरता है। साल दर साल बीतते न बीतते उसे अपने भूल का पता चलने लगता है लेकिन तब तक एक और नया बिहार उधर चैखट पर खड़ा होता है। मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना है कि आदमी वर्तमान में जीता है। काश कि ऐसा होता। मगर कहाँ? सच तो यह है कि आदमी कभी वर्तमान में नहीं जीता, जो कुछ जीता-मरता है सब भविष्य में। इसलिए तो सब उसे वर्तमान संवत्सर की बिदाई का सहृदय आयोजन करना चाहिए तब वह एक अजन्मे और तुरंत के जन्मे शिशु के स्वागत में इस तरह मतवाला होकर पिपिहरी बजाता घूमता है और सो भी आज के इस जमाने में जबकि सब जानते हैं कि हर नया बच्चा मुसीबतों की एक नयी गठरी लेकर घर में आता है।

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