सोनिया के राजीव को खा गई इस देश की राजनीति।

जन्मतिथि पर विशेष-आनंद शंकर

निस्संदेह राजीव गांधी भारतीय राजनीति के सबसे सौम्य और सशक्त चेहरे के रूप में उभरकर सामने आए थे। राजनीति में उनका आना ही अपने आप में एक अलग घटना थी। अप्रत्याशित रूप से वे राजनीति में आए और अपने व्यक्तित्व की ऐसी छाप छोड़ी कि आज भी लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। देश नहीं दुनिया के चंद लोकप्रिय और प्रसिद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि रखने वाले राजीव ने पायलट के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। तत्कालीन रसूखदार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र होने के बावजूद एक प्रोफेशनल के तौर पर पूरी तरह अपने करियर को समर्पित राजीव जी शुरूआती दौर में अंतर्मुखी थे। राजीव जी उन चंद लोगों में शुमार थे जिन्हें पद और ऐश्वर्य शाय़द छू नहीं पाया। कामयाबी की बुलंदियों पर सवार राजीव जी हमेशा एक सच्चे इंसान के रूप में लोगों से मिलते थे।घर के समृद्ध राजनीतिक माहौल के बावजूद उन्हें राजनीति कभी रास नहीं आई। उन्होंने कई राष्ट्राध्यक्षों को बेहद करीब से देखा और उन सबके दृष्टिकोण को गहराई से अपने व्यावहारिक जीवन में ढालने का प्रयास भी किया। खुले विचारों और प्रगतिशील सोच के समर्थक राजीव का सोनिया से मिलना किसी परीकथा से कम नहीं था। दोनों ने एक-दूसरे की भावनाओं को समझा और हर दीवार तोड़कर हमेशा के लिए एक-दूसरे के होकर रह गए। संजय गांधी के असामयिक निधन के बाद उपजी राजनीतिक परिस्थितियों के बीच राजीव जी अनिच्छा से राजनीति में आए या लाए गए। कांग्रेस और खासकर अमेठी में उनकी सक्रियता ने उन्हें भारतीय राजनीति को करीब से समझने का मौका दिया। अमेठी से तो वे ऐसे जुड़े कि उसी के होकर रह गए। राजनीति के कुटिल दांव-पेंच से अनजान राजीव को सोनिया ने हर मौके और विपरीत परिस्थितियों में संभाला।

वे उनका हौसला बनकर साथ खड़ी रहीं। अपनों की गद्दारी और बोफोर्स प्रकरण की अंतर्पीड़ा के बीच सोनिया ही थी, जिसने राजीव को टूटने नहीं दिया। अपने सौम्य स्वभाव के कारण राजीव जी की स्वीकार्यता हर दल में थी।पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की बीमारी का विदेश में इलाज करवाने वाली घटना तो आज की राजनीति के मुँह पर करारा तमाचा है। सोनिया नहीं चाहती थीं कि राजीव कभी राजनीति में जाएँ, लेकिन राजीव जी की हत्या के बाद बदलते राजनीतिक घटनाक्रम और कांग्रेस में हो रहे बिखराव को रोकने के लिए सोनिया को खुद राजनीति में आना पड़ा। सोनिया हमेशा के लिए इस देश में राजीव की विधवा बनकर रहीं। लेकिन सभ्यता के उच्चतम शिखर पर स्थापित होने का दावा करने वाली भारतीय राजनीति ने हमेशा सोनिया को नीचा दिखाने का प्रयास किया। हमारे देश के प्रधानमंत्री ने सोनिया को अपशब्द कहने का ऐसा कोई अवसर नहीं गंवाया ,जहाँ से भारतीय राजनीति उच्चादर्शों की ओर उन्मुख हो सके। आज़ राजीव नहीं हैं । कल हम भी नहीं रहेंगे। लेकिन राजनीतिक शुचिता और साफगोई के वे मूल्य हमेशा रहेंगे, जिन्हें राजीव जी ने स्थापित किया था।

जब तक सूरज चांँद रहेगा
राजीव जी का नाम रहेगा.

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