आज ‘इंडिया’ गठबंधन की प्रासंगिकता, जरूरत और सफलता

भारतीय राजनीति के फलक पर विपक्षी दलों की एकजुटता का प्रतीक ‘इंडिया’ (Indian National Developmental Inclusive Alliance) गठबंधन आज समकालीन विमर्श के केंद्र में है।

वर्ष 2023 में जब 26 विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इस गठबंधन की नींव रखी थी, तब इसे एक ‘अल्पकालिक प्रयोग’ मानकर खारिज करने की कोशिशें की गई थीं। लेकिन अक्टूबर 2026 की राजनीतिक हकीकत यह बयां करती है कि चुनावी उठापटक, आंतरिक मतभेदों और राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद यह गठबंधन देश की लोकतांत्रिक और चुनावी राजनीति में एक अनिवार्य धुरी बनकर उभरा है। ‘इंडिया’ गठबंधन की सफलता को केवल पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के पैमाने से नहीं आंका जा सकता, बल्कि इसके राजनीतिक प्रभाव से समझा जा सकता है। 2024 के लोकसभा चुनावों में इस गठबंधन ने 230 से अधिक सीटें जीतकर न केवल सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्ण बहुमत के सिलसिले को रोका, बल्कि देश में एक सशक्त और मजबूत विपक्ष को पुनर्जीवित किया। इस चुनावी सफलता ने भारतीय संसद के भीतर संतुलन कायम किया, जिससे “एकतरफा नीतियां” बनाने के दौर पर लगाम लगी और ‘गठबंधन सरकार’ के दौर की वापसी हुई। वर्तमान समय में भी, जैसा कि 30 सितंबर 2026 को दिल्ली में हुई विपक्षी दलों की महामंथन बैठक में देखा गया, करीब 19 से 20 प्रमुख राजनीतिक दलों (जिनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे और हेमंत सोरेन शामिल हैं) ने एक मंच पर आकर यह साबित किया है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर वे आज भी सामूहिक रूप से एजेंडा तय करने की क्षमता रखते हैं। संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों को राष्ट्र के एजेंडे पर लाना है। आज देश के सामने खड़े कई बड़े संकट इस गठबंधन की ज़रूरत को रेखांकित करते हैं।

वर्तमान समय में विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप है कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सत्ता का दबाव बढ़ता जा रहा है। विशेष सघन संशोधन (SIR) और वोटर लिस्ट में कथित विसंगतियों को लेकर ‘इंडिया’ गठबंधन का यह सामूहिक आरोप कि सरकार “वोट चोरी” का प्रयास कर रही है, यह दर्शाता है कि चुनावी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत प्रहरी की आवश्यकता है। बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं से जुड़े मुद्दे (जैसे पेपर लीक विवाद) को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाए रखने के लिए इस राष्ट्रीय मंच की सख्त जरूरत है। अकेले कोई भी क्षेत्रीय दल पूरे देश का ध्यान इन मुद्दों पर नहीं खींच सकता, लेकिन ‘इंडिया’ का सामूहिक ढांचा सरकार को जवाबदेह बनाने की ताकत रखता है। यदि विपक्ष बिखरा रहेगा, तो मतों का विभाजन सत्ताधारी दल को असीमित शक्ति प्रदान करेगा। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और विविध देश के लिए एकतरफा शासन के बजाय एक ऐसा मजबूत गठबंधन जरूरी है जो ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करे। हालिया घटनाक्रमों ने इस गठबंधन की प्रासंगिकता को और अधिक बढ़ा दिया है। चुनावी मुद्दों से आगे बढ़कर यह गठबंधन अब देशव्यापी जनांदोलनों की अगुवाई कर रहा है। नई दिल्ली की हालिया बैठक के बाद गठबंधन ने 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक देश के सभी जिलों में ‘लोकतंत्र बचाओ मार्च’ निकालने और 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के दफ्तर तक मार्च करने का जो कड़ा फैसला लिया है, वह इसकी जीवंत प्रासंगिकता का प्रमाण है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की जगह बैलेट पेपर की मांग को लेकर गठबंधन के 20 दल एक सुर में खड़े हैं। 1 नवंबर 2026 को दिल्ली में प्रस्तावित पांच बड़ी रैलियां यह स्पष्ट करती हैं कि यह गठबंधन केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला कोई मंच नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाला एक राजनीतिक आंदोलन है जो देश की चुनावी व्यवस्था के बुनियादी सुधारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

इन सफलताओं और प्रासंगिकता के बीच, ‘इंडिया’ गठबंधन के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सत्तारूढ़ दल (BJP) का आरोप है कि यह वैचारिक रूप से बिखरा हुआ और “परिवारवाद को बचाने” के लिए बना एक मजबूर गठबंधन है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी (AAP) जैसी कुछ पार्टियों का बैठक से दूरी बनाना या राज्यों के विधानसभा चुनावों में आंतरिक मतभेद उभरना, इसके स्थायित्व पर सवाल खड़े करता है। गठबंधन की दीर्घकालिक प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे राज्य-स्तरीय मतभेदों को भुलाकर ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ (न्यूनतम साझा कार्यक्रम) पर कितने टिके रहते हैं। आज के समय में ‘इंडिया’ गठबंधन भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। इसकी सफलता केवल सीटों के गणित में नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों को चुनौती देने और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों (जैसे मतदान की शुचिता) के हक में पहरेदार की तरह खड़े होने में है। तमाम विरोधाभासों के बावजूद, ‘इंडिया’ गठबंधन की एकजुटता यह साबित करती है कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा आज भी जीवंत और संघर्षशील है।

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