डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

2 अक्टूबर का दिन भारत के इतिहास में केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि दो महान चेतनाओं महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का एक साथ वंदन करने का पुनीत अवसर है। एक ओर अहिंसा, सत्य और आत्मबल से विश्व को नई दिशा दिखाने वाले बापू हैं, तो दूसरी ओर ‘जय जवान, जय किसान’ के उद्घोष से देश में स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की अलख जगाने वाले शास्त्री जी। परंतु, इस पावन अवसर पर यदि हम केवल माल्यार्पण और वक्तव्यों तक सीमित रह जाते हैं, तो एक ज्वलंत प्रश्न हमारी राष्ट्रीय चेतना को झकझोरता है,क्या वे जो हमें दे गए, उसके प्रति हम कृतज्ञ हैं, या फिर यह जयंती मनाना महज एक रस्म अदायगी, औपचारिकता या मजबूरी बनकर रह गया है? गांधी जी ने केवल अंग्रेजों से स्वतंत्रता नहीं दिलाई, उन्होंने भारत को नैतिक शक्ति, साधन की पवित्रता और सर्वोदय का चिंतन दिया। उन्होंने सिखाया कि अन्याय के सामने बिना हिंसा के कैसे सीना तानकर खड़े हुआ जाता है। दूसरी ओर, लाल बहादुर शास्त्री जी ने स्वतंत्रता के बाद संकट से घिरे देश को यह विश्वास दिलाया कि अभावों में भी आत्मसम्मान के साथ कैसे जिया जाता है। जब देश में अन्न का संकट आया, तो शास्त्री जी ने पहले स्वयं और अपने परिवार के उपवास से इसकी शुरुआत की, फिर देशवासियों से अपील की।

दोनों युगपुरुषों की सादगी, ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन में शुचिता (पवित्रता) का भाव ही उनकी असली विरासत है।
आज जब हम अपने आसपास देखते हैं, तो सादगी की जगह आडंबर ने, सत्य और अहिंसा की जगह वैमनस्य ने, और राष्ट्र प्रथम के भाव की जगह व्यक्तिगत स्वार्थ ने ले ली है। साल में एक दिन 2 अक्टूबर को गांधी जी और शास्त्री जी के चित्रों पर फूल चढ़ाना, सोशल मीडिया पर संदेश साझा करना और सरकारी अवकाश मना लेना बहुत आसान है। परंतु, सवाल यह है कि क्या उनके विचार हमारे आचरण में उतरे हैं? यदि हम गांधी के सत्य को त्यागकर असत्य और अफवाहों का सहारा लेते हैं, और शास्त्री जी की सादगी को भूलकर उपभोक्तावाद और भ्रष्टाचार के दलदल में डूबते जाते हैं, हमें औपचारिकता से आत्मचिंतन की ओर बढ़ना होगा, जयंती मनाना कोई मजबूरी या सरकारी कैलेंडर का पन्ना पलटना नहीं होना चाहिए। यह दिन स्वयं से प्रश्न करने का है, क्या हम समाज में अंतिम व्यक्ति के आंसू पोंछने का प्रयास कर रहे हैं? क्या हम संकट के समय देश के सम्मान और किसान-जवान के श्रम का आदर कर पा रहे हैं? यदि हम दो मिनट का मौन रखकर फिर उसी नैतिक पतन की ओर लौट जाते हैं, तो यह महज एक औपचारिकता है। लेकिन यदि हम उनके दिए सिद्धांतों में से एक भी मूल्य चाहे वह स्वच्छता हो, ईमानदारी हो, या सामाजिक समरसता हो,अपने जीवन में उतार सकें, तभी हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 2 अक्टूबर का दिन केवल अतीत को याद करने का नहीं, बल्कि भविष्य के लिए अपनी नीयत और नीति को कसौटी पर कसने का दिन है।




