पीडीए के नारों से राज्यसभा की चौखट तक बदल गई सपा

अखिलेश की मुस्लिमों से तौबा, परिवारवाद और धनाढ्य पर मोहर- रितेश सिन्हा

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में पीडीए को अपनी नई राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक इन तीन सामाजिक समूहों को जोड़कर अखिलेश यादव ने भाजपा के मुकाबले एक व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा करने का दावा किया। लेकिन राज्यसभा के लिए दो उम्मीदवारों के चयन ने इसी दावे पर बहस छेड़ दी है। सपा ने प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाया है। रामगोपाल यादव लगातार छठी बार राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं। वह 2004 से उच्च सदन में हैं। दूसरी ओर धनराज नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े कॉरपोरेट अधिकारी हैं और उनके पिता परिमल नाथवानी भी लंबे समय से राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। यहां राजनीति का सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—सपा का पीडीए आखिर उम्मीदवार चयन में कहां है? धनराज नाथवानी की आर्थिक पृष्ठभूमि इस सवाल को और तीखा बनाती है। उनके हलफनामे के अनुसार कुल घोषित संपत्ति ₹705.42 करोड़ है। उनकी अचल संपत्ति ₹627.67 करोड़ और चल संपत्ति ₹77.75 करोड़ बताई गई है। 2025-26 के लिए उनकी आय ₹19.61 करोड़ है। उनके ऊपर ₹25.93 करोड़ की देनदारियां भी घोषित हैं।

सवाल यह नहीं कि अमीर व्यक्ति राजनीति में क्यों आया। लोकतंत्र में धनाढ्य होना संसद में प्रवेश की कानूनी बाधा नहीं है। असली सवाल राजनीतिक है—जिस पार्टी की पहचान सामाजिक न्याय से जुड़ी है, वह अपने दो उम्मीदवारों में से एक के लिए इतनी संपन्न कॉरपोरेट पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को क्यों चुनती है? दूसरी ओर रामगोपाल यादव की उम्मीदवारी पार्टी के भीतर परिवार और पुराने नेतृत्व की भूमिका को सामने लाती है। वह मुलायम सिंह यादव के दौर से सपा की केंद्रीय राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। उनकी संपत्ति हलफनामे के अनुसार लगभग ₹12.58 करोड़ बताई गई है। इस तरह तस्वीर में दो बिल्कुल अलग राजनीतिक प्रतीक दिखाई देते हैं—पुराना राजनीतिक परिवार और नया कॉरपोरेट प्रभाव। 2024 लोकसभा में सपा के चार मुस्लिम सांसद निर्वाचित हुए थे और विपक्षी इंडिया गठबंधन के 21 मुस्लिम सांसदों में सपा की हिस्सेदारी थी। देशभर में कुल 24 मुस्लिम सांसद चुने गए थे। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को देखते हुए यह सवाल और बड़ा हो जाता है। चुनाव के समय मुस्लिम समाज को भाजपा विरोधी राजनीति की महत्वपूर्ण धुरी माना जाता है। लेकिन क्या उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी भी उसी अनुपात में दिखाई देती है? राज्यसभा उम्मीदवारों की ताजा सूची इस सवाल का जवाब देने के बजाय उसे और मजबूत करती है।

यही वह खाली जगह है जिसमें ओवैसी जैसे नेता अपनी राजनीति का विस्तार तलाशते हैं। उनका तर्क यही रहा है कि मुस्लिम समाज को दूसरों के भरोसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं छोड़ना चाहिए। सपा के लिए चुनौती यह है कि वह इस तर्क का जवाब केवल भाजपा के भय से नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आंकड़ों से दे। यहां कांग्रेस और बसपा भी सवालों से बाहर नहीं हैं। दशकों तक धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम समाज का राजनीतिक समर्थन लेने वाले दलों को अब यह बताना होगा कि उन्होंने मुस्लिम समाज को कितनी वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी दी। केवल चुनावी भाषणों में अल्पसंख्यक अधिकारों का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। मुस्लिम प्रतिनिधित्व का सवाल केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। वर्षों से सपा, कांग्रेस और दूसरी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां मुस्लिम समाज को लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय की राजनीति का महत्वपूर्ण साझेदार बताती रही हैं। चुनाव के दौरान मुस्लिम वोटों को निर्णायक मानने की राजनीति होती है। उम्मीदवार चयन के समय वही सवाल सामने आ जाता है कि मुस्लिम समाज केवल चुनावी समर्थन है या राजनीतिक साझेदारी।

यही वह जगह है जहां असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से में यह भावना मजबूत होती है कि उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी पर्याप्त नहीं है, तो ओवैसी जैसे नेता उसी असंतोष को राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि मुस्लिम मतदाता किसी एक दिशा में जाएगा; लोकतंत्र में मतदाता का निर्णय स्वतंत्र होता है। लेकिन सपा के लिए यह मान लेना कि उसका पारंपरिक मुस्लिम समर्थन स्वतः बना रहेगा, राजनीतिक रूप से सवालों से परे नहीं है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सपा जिस पीडीए राजनीति को भाजपा के सामाजिक समीकरण के जवाब के रूप में पेश करती रही है, उसी के सामने अब प्रतिनिधित्व का सवाल खड़ा है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज को जोड़ने का दावा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उम्मीदवारों और संगठनात्मक भागीदारी से भी परखा जाता है। 2027 का चुनाव इस लिहाज से केवल सत्ता का चुनाव नहीं होगा। यह पुराने सामाजिक गठबंधनों की विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगी। मुस्लिम मतदाता, पिछड़ा मतदाता, दलित मतदाता और युवा मतदाता—सभी अपने-अपने सवाल लेकर राजनीतिक दलों के सामने खड़े हैं। सपा के राज्यसभा उम्मीदवारों ने एक बात साफ कर दी है—पीडीए का नारा जितना बड़ा है, उसके भीतर प्रतिनिधित्व का सवाल उतना ही बड़ा है।

अखिलेश यादव के लिए चुनौती यही है कि वह समझाएं कि परिवार और कॉरपोरेट पृष्ठभूमि वाले चेहरों के साथ उनकी सामाजिक न्याय की राजनीति किस तरह संतुलित होती है। लोकतंत्र में सिर्फ यह बताना काफी नहीं कि कौन आपका विरोधी है। मतदाता यह भी पूछता है—आपके साथ रहते हुए उसे मिला क्या?

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