डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

मेरे महबूब अब आ भी जा इतना मुझको सताता क्यों है।
नागिन सी इन जुल्फों को चेहरे पर रह रह के गिराता क्यों है।
दुनिया को पता वाबस्तगी का चल जाएगा यूं तो, अपनी।
हर घड़ी हर वक़्त देखकर मेरी जानिब मुस्कुराता क्यों है।
मुझको कहता है वो कि मैं तेरा हूँ, तू है मेरा मेहबूब।
हाथों से ऐसे फिर अपने चेहरे को रह रह के छुपाता क्यों।
है शराब का पीना बेशक हराम है, हां, हां ये सभी जानें।
फिर मद भरी आँखों से तू ये ये चीज पिलाता क्यों है।
बिछड़ना था तो फिर, यादों को तूने अपनी खुला क्यों छोड़ा।
याद आ आकर मुझे नींदों से मेरी रातों में जगाता क्यों है।
तू तो दुनिया है मेरी सीने में मेरे रहता है सांसों की तरह।
हाथों की लकीरों में लिखा नामे मुश्ताक मिटाता क्यों है।




