डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

हम-सफ़र जो साथ थे, उस कारवाँ को क्या हुआ, आँधियों के दौर में, अमन-ओ-अमाँ को क्या हुआ।
चुप खड़े हैं सब यहाँ, ख़ामोशियाँ ही ख़ामोशियाँ, गूँजती थी जो कभी, उस बेकरारी को क्या हुआ।

फूल भी मुरझा गए, और पत्तियाँ भी झड़ गईं, रब जाने आज इस, हँसते चमन को क्या हुआ।
दर्द का आलम तो देखिए,आँख भी नम न हुई, ज़िल्लतों के शहर में, मेरे गुमाँ को क्या हुआ।
बात जो दिल में छुपी, होंठों पे लाते ही नहीं,मुश्ताक़ तेरी, शोख़ी-ए-ज़बाँ को क्या हुआ।




