भूलना मेरी आदत भी नहीं–

डॉ. एम. ए. शाह ,’सहज’, (मगरधा)

भूलना मेरी आदत भी नहीं

​तर्क-ए-तअल्लुक़ भी नहीं करता, मेरा होता भी नहीं।

ये कैसी मोहब्बत है कि सुकून दिल को मिलता भी नहीं।

​ये दर्दे-मोहब्बत हर पल हर घड़ी मुझे सताता है।

ख्वाब में वो कैसे आएंगे, रात भर मैं सोता भी नहीं।

​वो मुझको भूलकर बड़ा खुशनसीब हो गया शायद।

प्यार किया है मैंने और भूलना मेरी आदत भी नहीं।

​जुर्म तो मुझसे हो ही गया यारो, ये मोहब्बत का।

सज़ा पड़ेगी काटना मुश्ताक़, कोई रिहाई भी नहीं।

​जियें कैसे और मुश्ताक़ मर भी किस तरह जायें।

दुआ भी नहीं देता कोई और मुझको दवा भी नहीं।

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