“म्हारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के?” यह मशहूर संवाद आज सिर्फ खेल के मैदानों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को झकझोरने वाले आंदोलनों की अग्रिम पंक्ति में भी पूरी तरह चरितार्थ हो रहा है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची में अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे ‘ज्ञानेश कुमार आंदोलन’ में इस बार सबसे बुलंद और बेबाक आवाज़ देश की युवा बेटियों की है। कड़ाके की ठंड की शुरुआत, पुलिस की भारी घेराबंदी, लाठियों की गड़गड़ाहट और आंसू गैस के गोलों के बीच नेहा बोरा जैसी बहादुर युवतियों ने सरकार और प्रशासन की रातों की नींद उड़ा रखी है। इस आंदोलन का सबसे चर्चित चेहरा बनकर उभरी हैं नेहा बोरा। विश्वविद्यालय की छात्रा और छात्र विंग की सक्रिय नेता नेहा पिछले सात दिनों से जंतर-मंतर और पार्लियामेंट स्ट्रीट के चक्कर काट रही हैं। जब दिल्ली पुलिस ने धारा 163 (BNSS) का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को खदेड़ना शुरू किया और कई बड़े पुरुष नेताओं को हिरासत में ले लिया, तब नेहा ने मोर्चा संभाला। एक वायरल वीडियो में, नेहा पुलिस की तीन लेयर वाली बैरिकेडिंग पर चढ़कर हाथ में तिरंगा लिए नारा लगाती दिखीं: “जब-जब सत्ता डरती है, पुलिस को आगे करती है।” पुलिसकर्मियों द्वारा उन्हें जबरन घसीटकर बस में डालने की कोशिशों के बावजूद उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। हिरासत में लिए जाने के बाद थाने से जारी अपने संदेश में नेहा ने कहा, “वे हमें सलाखों के पीछे रख सकते हैं, लेकिन हमारी आवाज़ को नहीं। यह लड़ाई किसी एक पद की नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मर्यादा को बचाने की है।”

नेहा अकेली नहीं हैं। इस आंदोलन में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), जेएनयू (JNU) और जामिया मिलिया इस्लामिया से आई सैकड़ों छात्राओं ने आंदोलन की दिशा बदल दी है। पुलिस की लाठियों के आगे ढाल बनीं अंजलि यादव (22 वर्ष),हरियाणा के रोहतक की रहने वाली और दिल्ली में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही अंजलि यादव ने जब जंतर-मंतर पर पुलिस को छात्रों पर लाठीचार्ज करते देखा, तो वह खुद आगे आ गईं। अंजलि ने घायल साथी छात्रों को बचाने के लिए पुलिसकर्मियों के सामने मानव श्रृंखला (Human Chain) बना ली। एक पुलिस अधिकारी ने जब उन्हें हटने की धमकी दी, तो अंजलि ने सीधे उनकी आंखों में देखकर कहा, “हम शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। आप देश के रक्षक हैं, सत्ता के गुंडे नहीं। मारिए लाठी, हम पीछे नहीं हटेंगे।” अंजलि के इस साहस ने वहां मौजूद पुरुष पुलिसकर्मियों को भी पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। वहीं जब 4 अक्टूबर की रात को 200 से अधिक महिला प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर मंदिर मार्ग थाने ले जाया गया, तो वहां का माहौल तनावपूर्ण था।
सायरा बानो ने अपनी सूझबूझ से सभी साथी लड़कियों का हौसला बनाए रखा। सायरा ने थाने के भीतर ही ताली बजाकर क्रांतिकारी गीत गाने शुरू कर दिए। पूरी रात थाने की दीवारें “लड़ेंगे-जीतेंगे” के नारों से गूंजती रहीं। पुलिस प्रशासन जो उन्हें डराने के लिए लाया था, वह खुद उनके हौसले को देखकर हैरान रह गया। सुबह जब उन्हें रिहा किया गया, तो वे सीधे वापस आंदोलन स्थल की ओर निकल पड़ीं।आंदोलन के दौरान कानून का पाठ पढ़ाने वाली दिल्ली पुलिस की एक बड़ी लापरवाही को 21 वर्षीय कानून की छात्रा कृतिका शर्मा ने बिना नाम प्लेट वाली पुलिस को बेनकाब किया। उन्होंने देखा कि ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मियों की वर्दी पर उनकी नेम प्लेट (Name Tags) नहीं थी। कृतिका ने तुरंत ऑन-ड्यूटी वरिष्ठ अधिकारियों को घेरा और सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रकाश सिंह फैसले’ का हवाला देते हुए सवाल दागा कि बिना पहचान के पुलिस कार्रवाई कैसे कर सकती है? उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया, जिसके बाद दिल्ली पुलिस को इस मामले में सफाई देनी पड़ी और क्राइम ब्रांच को जांच सौंपनी पड़ी।

क्यों परेशान है सत्ता?
इन युवा महिलाओं के प्रदर्शन ने सत्ता और पुलिस प्रशासन के सामने कई अनसुलझे और असहज करने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं:
| चुनौती के बिंदु | महिला प्रदर्शनकारियों का रुख | प्रशासन पर इसका असर |
|---|---|---|
| नैतिक बल | हिंसा का सहारा न लेकर पूरी तरह शांतिपूर्ण और तार्किक विरोध। | बल प्रयोग करने पर पुलिस की वैश्विक स्तर पर बदनामी हो रही है। |
| डॉक्यूमेंटेशन | हर ज्यादती और पुलिसिया दुर्व्यवहार का स्मार्टफोन से लाइव कवरेज। | पुलिस के गुप्त दमन चक्र की पोल खुल रही है। |
| वैचारिक स्पष्टता | चुनाव सुधार और विशेष गहन संशोधन (SIR) पर तकनीकी और कानूनी बहस। | सरकार इन्हें ‘गुमराह भीड़’ कहकर खारिज नहीं कर पा रही है। |
पारंपरिक रूप से आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका को खाना बनाने या पीछे बैठने तक सीमित माना जाता था, लेकिन इस बार इन छोरियों ने मुख्य मंच और कमान संभाल रखी है। जब पुलिस महिलाओं पर बल प्रयोग करती है, तो उसकी तस्वीरें और वीडियो सरकार की ‘महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण’ के दावों की धज्जियां उड़ा देते हैं। यही कारण है कि गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी इस आंदोलन को संभालने में खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। इस आंदोलन का एक स्याह पहलू यह भी रहा कि महिला प्रदर्शनकारियों को भारी प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। बीबीसी और अन्य स्वतंत्र मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट के अनुसार, कई छात्राओं ने दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाया है कि पुरुष पुलिसकर्मियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और हिरासत में लेते समय उनके कपड़े तक फट गए। लेकिन इन युवा लड़कियों ने हार मानने के बजाय इसे अपनी लड़ाई का नया हथियार बना लिया है। नेहा बोरा कहती हैं, “अगर वे सोचते हैं कि बदसलूकी और लाठियों से हम डरकर घरों में दुबक जाएंगी, तो वे गलतफहमी में हैं। हमारी माताओं ने झांसी की रानी और सावित्रीबाई फुले को पढ़ा है। यह देश की मिट्टी का स्वभाव है कि जब आत्मसम्मान और हक की बात आती है, तो हम दुर्गा का रूप ले लेती हैं।”
दिल्ली की सड़कों पर चल रहा यह आंदोलन केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक राजनीतिक लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की युवा नारीशक्ति के आत्मनिर्णय और साहस का एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुका है। नेहा, अंजलि, सायरा और कृतिका जैसी हज़ारों लड़कियां आज सत्ता के अहंकार के सामने एक मजबूत दीवार बनकर खड़ी हैं। इन्होंने साबित कर दिया है कि आज की छोरियाँ किसी भी मायने में छोरों से कम नहीं हैं; बल्कि वे व्यवस्था में सुधार की सबसे बड़ी संवाहक (Change Agents) हैं। सत्ता चाहे जितने बैरिकेड्स लगा ले, पानी की बौछारें छोड़ दे या धारा 163 लागू कर दे, लेकिन इन बेटियों के इरादों के सामने प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह पस्त नजर आ रहा है। यह नए भारत की वह गूंज है, जिसे दबा पाना अब किसी भी सरकार के लिए मुमकिन नहीं होगा।




