इंडी गठबंधन के सीईसी विरोध में दलित राजनीति गायब, मुहाने पर यूपी चुनाव: अखिलेश की मौजूदगी, पीडीए का दावा और मायावती की चुनौती

रितेश सिन्हा

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में इंडी गठबंधन के प्रदर्शन ने विपक्षी एकता के साथ उसके सामाजिक आधार और नेतृत्व की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। संसद से निर्वाचन आयोग तक निकले मार्च में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे, अभिषेक बनर्जी, डेरिक ओ’ब्रायन और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत विपक्षी दलों के अनेक नेता और सांसद शामिल हुए। पुलिस ने मार्च को निर्वाचन आयोग के कार्यालय से पहले रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में लिया। विपक्ष का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम हटने का खतरा पैदा हुआ है। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है और अपनी प्रक्रिया को वैधानिक बताया है। लेकिन इस पूरे आंदोलन में एक असहज सवाल भी सामने आया—जिस विपक्ष ने मतदाता अधिकारों और कमजोर वर्गों के नाम मतदाता सूची से हटने की आशंका को आंदोलन का मुद्दा बनाया, उसके मंच पर दलित राजनीतिक नेतृत्व की प्रभावशाली मौजूदगी कहां थी? अनेक विपक्षी नेता मौजूद रहे, लेकिन ऐसा कोई बड़ा दलित चेहरा केंद्रीय भूमिका में नहीं दिखा जिसके जरिए इसे सीधे दलित मताधिकार के आंदोलन के रूप में स्थापित किया जा सके।

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से पीडीए—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बता रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 37 सीटें जीतीं। इस प्रदर्शन के बाद पीडीए उसकी सबसे महत्वपूर्ण चुनावी रणनीति बनकर उभरा। अब 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है और चुनौती इस समीकरण को केवल नारे से आगे ले जाकर स्थायी राजनीतिक आधार बनाने की है। यहीं अखिलेश यादव की दिल्ली में मौजूदगी का राजनीतिक अर्थ भी निकलता है। इसे केवल विपक्षी एकता के कार्यक्रम में उनकी भागीदारी मानना यूपी की राजनीति को अधूरा पढ़ना होगा। छह अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान अखिलेश ने कहा कि अब उनकी नजर राज्यसभा की तीन सीटों पर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों पर है। यह बयान साफ संकेत है कि सपा का ध्यान अब 2027 की चुनावी तैयारी पर है। अखिलेश के सामने भाजपा से सीधी लड़ाई के साथ कांग्रेस के साथ संबंधों का प्रबंधन, पीडीए को मजबूत करना और दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना भी चुनौती है। इसलिए दिल्ली के प्रदर्शन से दूरी बनाना उनके लिए राजनीतिक रूप से कठिन होता। लेकिन शामिल होने के बाद भी सवाल वही है—क्या शीर्ष नेता की मौजूदगी भर से पीडीए जमीन पर दिखाई देने लगता है?

दलित राजनीति में प्रतीक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रतीक पर्याप्त नहीं होते। संगठन में भागीदारी, नेतृत्व में हिस्सेदारी, टिकट वितरण, आंदोलन में प्रतिनिधित्व और सत्ता-साझेदारी—इन सभी कसौटियों पर सामाजिक न्याय की राजनीति परखी जाती है। यही वजह है कि सपा के पीडीए दावे की असली परीक्षा अब जमीन पर होगी। इसमें मायावती और बहुजन समाज पार्टी की भूमिका को नजरअंदाज करना भी सपा के लिए जोखिम भरा हो सकता है। 2024 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसका पारंपरिक दलित सामाजिक आधार राजनीतिक रूप से समाप्त हो गया। खासकर जाटव-दलित मतदाताओं के बीच मायावती की पहचान अभी भी एक अलग राजनीतिक पूंजी है। उत्तर प्रदेश की अनेक सीटों पर दलित वोट का बिखराव भाजपा, सपा और बसपा के बीच परिणामों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि सपा की दलित पहुंच केवल बसपा से मुकाबले का विषय नहीं, बल्कि 2027 के परिणामों की कुंजी भी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित संपर्क और आगरा जैसे क्षेत्रों में प्रस्तावित कार्यक्रमों को इसी रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन दलित मतदाता के लिए सवाल केवल यह नहीं होगा कि कौन उसके सम्मेलन में पहुंचा। वह यह भी देखेगा कि राजनीतिक संगठन और निर्णय प्रक्रिया में उसकी वास्तविक हिस्सेदारी कितनी है।

कांग्रेस की चुनौती भी कम नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी संविधान, लोकतंत्र और निर्वाचन प्रक्रिया की रक्षा को अपना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना रही है। यदि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी को लोकतांत्रिक अधिकार का प्रश्न बताया जा रहा है तो सबसे कमजोर और वंचित वर्गों की प्रत्यक्ष भागीदारी भी उसी अनुपात में दिखाई देनी चाहिए। केवल राहुल गांधी या अन्य शीर्ष नेताओं की मौजूदगी उस सामाजिक संदेश को पूरा नहीं करती। इंडी गठबंधन की एक और समस्या नेतृत्व को लेकर है। संसद से निर्वाचन आयोग तक मार्च में बड़ी संख्या में विपक्षी सांसद शामिल हुए, लेकिन बाद के घटनाक्रम में राहुल और प्रियंका गांधी की सक्रियता आंदोलन के केंद्र में दिखाई दी। सहयोगी दलों के लिए यह चुनौती है कि साझा आंदोलन कहीं कांग्रेस और राहुल गांधी केंद्रित अभियान न बन जाए। यूपी में यह समस्या और बड़ी है, क्योंकि सपा और कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर साथ दिखना है, जबकि विधानसभा चुनाव में दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी रहेगी। अखिलेश यादव की यही सबसे बड़ी राजनीतिक मजबूरी है। उन्हें भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता का हिस्सा बने रहना है, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने से भी रोकना है। 2027 का चुनाव केवल भाजपा विरोधी वोट के गणित से नहीं जीता जा सकता। 403 विधानसभा क्षेत्रों में संगठन, उम्मीदवार और स्थानीय सामाजिक समीकरण निर्णायक होंगे।

इसलिए सीईसी विरोध में अखिलेश की मौजूदगी को दो स्तरों पर देखना चाहिए। पहला, निर्वाचन प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों से जुड़े विपक्षी मुद्दे पर सपा की राजनीतिक भागीदारी। दूसरा, यूपी के मतदाता को यह संदेश कि सपा लोकतांत्रिक संस्थाओं और मताधिकार के सवाल पर विपक्ष के साथ खड़ी है। लेकिन इसे पीडीए की पूर्ण सफलता का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। विपक्ष को यह भी समझना होगा कि मतदाता सूची का सवाल केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं चलेगा। एसआईआर को लेकर आरोप हैं तो उनके समर्थन में प्रमाण, आंकड़े और क्षेत्रवार विवरण भी सामने आने चाहिए। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग को भी आरोपों को खारिज करने के साथ प्रक्रिया की अधिकतम पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल वैधानिक अधिकार से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से बनती है। अखिलेश के लिए असली सवाल यही है कि क्या पीडीए चुनावी सूत्र से आगे बढ़कर वास्तविक सामाजिक प्रतिनिधित्व बन पाएगा? क्या दलित समाज को केवल संख्या के रूप में देखा जाएगा या संगठन और नेतृत्व में भी भागीदारी मिलेगी? क्या सपा मायावती के पारंपरिक दलित आधार में इतनी पैठ बना पाएगी कि उसका लाभ 2027 में सीटों के रूप में दिखाई दे? और क्या कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय मंच साझा करते हुए सपा यूपी में अपना स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार कर पाएगी?

इन तीनों सवालों का जवाब एक-दूसरे से जुड़ा है। यदि सपा दलितों को पीडीए में वास्तविक हिस्सेदारी देती है तो उसका सामाजिक आधार कांग्रेस और बसपा दोनों के लिए चुनौती बन सकता है। लेकिन यदि पीडीए केवल चुनावी नारा रह गया तो मायावती का निष्क्रिय दिख रहा राजनीतिक आधार भी कई सीटों पर निर्णायक साबित हो सकता है। वहीं कांग्रेस की बढ़ती सक्रियता सपा के लिए विपक्षी वोटों के भीतर एक अलग प्रतिस्पर्धा पैदा करेगी। यही दिल्ली के प्रदर्शन का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। विपक्ष ने एकता दिखाई, लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी उसी मंच पर खड़ा हो गया। अखिलेश की मौजूदगी महत्वपूर्ण है, मगर अकेले इससे पीडीए मजबूत नहीं होता।

अखिलेश ने 403 सीटों की ओर देखने की बात कह दी है। अब उनकी असली परीक्षा दिल्ली की सड़क पर नहीं, उत्तर प्रदेश के गांवों, कस्बों और विधानसभा क्षेत्रों में होगी। भाजपा के खिलाफ व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाना, कांग्रेस से राजनीतिक दूरी और तालमेल का संतुलन साधना तथा दलितों को पीडीए में वास्तविक भागीदार बनाना आसान नहीं होगा। सीईसी विरोध ने इंडी गठबंधन को एक मंच जरूर दिया है, लेकिन उसी मंच पर दलित प्रतिनिधित्व का सवाल भी खड़ा कर दिया है। 2027 के मुहाने पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में यही सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि चुनाव में एक दिन की राजनीतिक मौजूदगी सुर्खियां बना सकती है, लेकिन संगठन, प्रतिनिधित्व और सामाजिक भरोसा ही अंततः वोट में बदलता है। और यही अखिलेश यादव, सपा तथा पूरे इंडी गठबंधन की सबसे कठिन परीक्षा होगी।

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