संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषण में ‘सत्ता परिवर्तन’ का जिक्र और उसके गहरे राजनीतिक मायने

मोहन भागवत के भाषण में ‘सत्ता परिवर्तन’ का हावी होना यह साफ संकेत देता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक समरसता इस समय सबसे नाजुक दौर से गुजर रही हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विजयादशमी उत्सव (अक्टूबर 2026) पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का वार्षिक संबोधन देश की राजनीतिक और सामाजिक दिशा को लेकर एक नए विमर्श की शुरुआत कर गया है। इस बार के भाषण में ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) और देश को अस्थिर करने वाली विदेशी ताकतों का मुद्दा सबसे प्रमुखता से हावी रहा। भागवत ने बेहद स्पष्ट शब्दों में आगाह किया कि केवल सत्ता बदलने से जमीनी समस्याओं का समाधान नहीं होता, बल्कि इसका इस्तेमाल भारत की प्रगति को रोकने के लिए किया जा रहा है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष और कुछ संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस आंदोलन को “वास्तव में सत्ता परिवर्तन की लड़ाई” करार दिया है। ऐसे में संघ प्रमुख के इस भाषण में ‘सत्ता परिवर्तन’ का बार-बार हावी होना भारतीय राजनीति और वैश्विक परिदृश्य के लिए कई बड़े संकेत देता है। मोहन भागवत ने अपने भाषण में फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश का विशेष रूप से उदाहरण देते हुए कहा कि इन देशों में हिंसक आंदोलनों या उथल-पुथल से सत्ता तो बदल गई, लेकिन स्थितियां बेहतर होने के बजाय और जटिल हो गईं। उनका यह बयान संकेत देता है कि वैश्विक शक्तियां भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को पचा नहीं पा रही हैं। वे देश के भीतर छोटे-छोटे सामाजिक मतभेदों, असंतोष या प्रशासनिक कमियों का फायदा उठाकर एक कृत्रिम अराजकता पैदा करने का प्रयास कर रही हैं। भागवत ने इन हिंसक आंदोलनों को ‘पश्चिम से आया एक ऐसा तूफान’ बताया, जो स्थापित लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संवैधानिक व्यवस्था को नष्ट करना चाहता है। उनका यह रुख स्पष्ट करता है कि भारत के युवाओं और समाज को बाहरी ‘टूलकिट’ राजनीति के मोहरे बनने से बचना होगा।

संबोधन में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों और उनके राजनीतिकरण के बीच के फर्क को बेहद बारीकी से रेखांकित किया गया। भागवत ने माना कि किसी भी जीवंत लोकतंत्र में सामाजिक समस्याओं को लेकर आंदोलन होना स्वाभाविक है, लेकिन जब इन आंदोलनों का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति, विचारधारा या सरकार के प्रति नफरत फैलाना हो जाता है, तो वे विनाशकारी मोड़ ले लेते हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के प्रसिद्ध कथन ‘अराजकता का व्याकरण’ (Grammar of Anarchy) का संदर्भ देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि तात्कालिक लोकप्रियता या राजनीतिक लाभ के लिए देश की सार्वजनिक व्यवस्था को दांव पर लगाना आत्मघाती है। यह संकेत सीधे तौर पर उन प्रदर्शनों की ओर था जो व्यवस्था में सुधार के बजाय पूरी व्यवस्था को ही ठप करने की नीयत से किए जा रहे हैं। संघ प्रमुख ने जोर दिया कि समाज में कटुता और वैमनस्य फैलाने के बजाय आंदोलनों का रुख रचनात्मक और समाधान की ओर होना चाहिए। संघ की वैचारिक समझ हमेशा से राजनीतिक सत्ता के बजाय सामाजिक बदलाव (Social Transformation) पर केंद्रित रही है। भागवत ने इस शाश्वत सत्य को एक बार फिर सामने रखा कि “यह मान लेना बिल्कुल गलत है कि सरकार बदलते ही देश की सारी समस्याएं जादू की तरह खत्म हो जाएंगी”। इतिहास गवाह है कि केवल राजनीतिक चेहरों के बदलने से समाज की बुनियादी सोच नहीं बदलती। समस्याओं का वास्तविक और स्थायी समाधान सामाजिक सुधारों, नागरिक अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना के जागृत होने से ही संभव है। भागवत ने आगाह किया कि ‘भारत, हिंदू और संघ’ को कमजोर करने की कोशिश करने वाली ताकतें सबसे पहले हिंदुओं की सामाजिक एकजुटता पर प्रहार करती हैं। इसलिए, सत्ता की मलाई चाटने के चक्कर में समाज को जाति, भाषा या प्रांत के नाम पर बांटना बंद होना चाहिए।

मोहन भागवत का यह भाषण भले ही बाहरी ताकतों और विपक्ष के ‘सत्ता परिवर्तन’ के आक्रामक दावों के खिलाफ एक मजबूत ढाल की तरह दिखा हो, लेकिन इसमें सत्ता पक्ष (सरकार) के लिए भी एक गंभीर अंतर्निहित संदेश छिपा था। उन्होंने पड़ोसी देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार जब सरकारें जनता की वास्तविक चिंताओं से कट जाती हैं और नीतियां जन-आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं होतीं, तभी समाज में गहरा असंतोष पनपता है। यह संकेत स्पष्ट करता है कि चुनी हुई सरकारों को निरंतर जनता के साथ सीधे संवाद में रहना चाहिए ताकि किसी भी बाहरी या आंतरिक विघटनकारी ताकत को असंतोष की जमीन तैयार करने का मौका न मिल सके। मोहन भागवत के भाषण में ‘सत्ता परिवर्तन’ का हावी होना यह साफ संकेत देता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक समरसता इस समय सबसे नाजुक दौर से गुजर रही हैं। संघ प्रमुख ने साफ कर दिया कि भारत को शक्तिशाली बनता देखने की राह में जो रोड़े अटकाए जा रहे हैं, उनका मुकाबला किसी राजनीतिक उठापटक से नहीं, बल्कि एक जागरूक और एकजुट नागरिक समाज से ही किया जा सकता है। लोकतंत्र में चुनावों के जरिए लोकतांत्रिक ढंग से सरकारें बदलना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन अराजकता, हिंसा और विदेशी इशारों पर देश की चुनी हुई व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की मानसिकता (‘रेजीम चेंज’) भारत की संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा है। विजयादशमी का यह संदेश देश के हर राजनीतिक दल और नागरिक को आत्ममंथन करने की चेतावनी देता है कि वे सत्ता के इस महासमर में कहीं राष्ट्र की बुनियाद को ही कमजोर न कर बैठें।

Change Language