क्या बदल रहा है जनता का मूड? आरएसएस-भाजपा के बीच आंतरिक मंथन और परिवर्तन की सुगबुगाहट

2024 के बाद से जनता के भीतर आर्थिक मुद्दों (जैसे बेरोजगारी, महंगाई) को लेकर असंतोष बढ़ा है,

भारतीय राजनीति में इस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आपसी रिश्ते, चुनावी प्रदर्शन और जनता के बीच उनकी पकड़ को लेकर एक व्यापक विमर्श छिड़ गया है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के पूर्ण बहुमत से चूकने (240 सीटों पर सिमटने) के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चाएं तेज हो गईं कि क्या संगठन का जनता पर प्रभाव कम हो रहा है या फिर सत्ता की आंतरिक संरचना में किसी बड़े ‘परिवर्तन’ की भूमिका तैयार हो रही है। जनता के विश्वास में आंशिक बदलाव का सबसे पहला और प्रामाणिक संकेत 2024 के आम चुनाव परिणामों से मिला। चुनाव नतीजों के तुरंत बाद आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र (Organiser) में छपे एक लेख में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया कि ये परिणाम “अति-आत्मविश्वास से भरी भाजपा के लिए एक जमीनी हकीकत का सबक” हैं। लेख में रेखांकित किया गया कि स्थानीय स्तर पर भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपने वैचारिक मार्गदर्शक (आरएसएस) के जमीनी कार्यकर्ताओं से उस तरह संपर्क नहीं साधा, जैसा वे हमेशा साधते थे। संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार ने भी सार्वजनिक मंच से एक बयान में कहा था कि “जिस पार्टी ने भक्ति की, लेकिन उसमें अहंकार आ गया, उसे राम जी ने 241 (240) पर रोक दिया”। हालांकि बाद में संघ ने इसे उनका निजी बयान बताकर पल्ला झाड़ लिया था, लेकिन इसने आंतरिक असंतोष को सतह पर ला दिया। पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा मजबूत हुई कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अपने दम पर चुनाव जीतने में सक्षम होने के कारण संघ के पारंपरिक सांगठनिक ढांचे पर कम निर्भर रहने लगा था। चुनाव के दौरान तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का यह बयान कि “भाजपा अब सक्षम हो चुकी है और अपने फैसले खुद लेती है”, इसी बदलाव का संकेत था।

2024 के शुरुआती चरणों में पारंपरिक रूप से होने वाला संघ का ‘डोर-टू-डोर’ (घर-घर जाकर) पर्ची बांटना और मतदाताओं को बूथ तक लाने का काम कई इलाकों में सुस्त देखा गया। विश्लेषकों (जैसे फ्रंटलाइन और द हिंदू) का मानना है कि 2024 के झटके ने दोनों संगठनों के बीच सत्ता के संतुलन को फिर से रीसेट कर दिया। भाजपा को यह समझ में आया कि वैचारिक कैडर के बिना चुनावी वैतरणी पार करना आसान नहीं है। जहां एक तरफ ‘जनता का विश्वास खोने’ की बातें विपक्षी खेमे द्वारा जोर-शोर से उठाई गईं, वहीं हालिया राज्यों के चुनावी आंकड़े इस थ्योरी को पूरी तरह सही नहीं ठहराते। संकट भांपते ही संघ और भाजपा ने आपसी तालमेल को तुरंत दुरुस्त किया। 2024 के अंत में हरियाणा और फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में संघ ने कमान अपने हाथों में ली। दिल्ली में संघ ने लगभग 50,000 छोटी बैठकें (ड्राइंग रूम मीटिंग्स) कीं और 4 लाख से अधिक परिवारों तक सीधी पहुंच बनाई, जिसके कारण भाजपा ने वहां 27 साल बाद शानदार वापसी करते हुए 70 में से 48 सीटें जीतीं। हाल ही में संपन्न हुए बंगाल चुनावों में भी विरोधी लहर और सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट के बीच, आरएसएस की अभूतपूर्व जमीनी लामबंदी के कारण भाजपा ने 294 में से 208 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिसने यह साबित किया कि कैडर आधारित राजनीति अभी भी जनता को प्रभावित करने का माद्दा रखती है। परिवर्तन की सबसे बड़ी सुगबुगाहट भाजपा के सांगठनिक ढांचे के भीतर देखी जा रही है। जे.पी. नड्डा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर आम सहमति बनाने में लंबा समय लगा है।

अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, संघ इस बात पर अड़ा हुआ है कि आने वाला नेतृत्व पूरी तरह से कैडर अनुशासन और वैचारिक निष्ठा (Ideological Loyalty) को प्राथमिकता देने वाला होना चाहिए, न कि केवल व्यक्तिगत ब्रांडिंग पर केंद्रित। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे प्रमुख राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों के चयन में हो रही देरी भी इसी वैचारिक रस्साकशी और बड़े बदलाव की सुगबुगाहट की ओर इशारा करती है। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने हाल के बयानों में बार-बार स्पष्ट किया है कि “भाजपा और आरएसएस के उद्देश्यों में कोई भिन्नता नहीं है, संघ केवल सुझाव देता है, हस्तक्षेप नहीं करता”। हालांकि, उनके भाषणों में ‘अराजकता के व्याकरण’ और ‘जनता के असंतोष’ को लेकर सरकारों को दी जाने वाली चेतावनियां यह साफ करती हैं कि संघ जनता की नब्ज को समझ रहा है और वह भाजपा को लोक-केंद्रित नीतियों पर लौटने का मूक संदेश दे रहा है। तथ्य यह दर्शाते हैं कि ‘पब्लिक का विश्वास पूरी तरह खोने’ का दावा राजनीतिक रूप से अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है, क्योंकि हालिया राज्यों (दिल्ली, बंगाल, हरियाणा) के चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में रहे हैं। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि 2024 के बाद से जनता के भीतर आर्थिक मुद्दों (जैसे बेरोजगारी, महंगाई) को लेकर असंतोष बढ़ा है, जिसने संघ और भाजपा को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। सत्ता और संगठन के भीतर यह सुगबुगाहट किसी विनाशकारी पतन की नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए एक बड़े सांगठनिक और रणनीतिक बदलाव (Structural Shift) का संकेत दे रही है।

Change Language