डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश,

जिंदगी जब अपनी इब्तदा (शुरुआत) में होती है, तो आंखें सिर्फ़ आसमान छूती हैं। उस शख़्स के सीने में भी कुछ ऐसे ही बुलंद और हसीन ख़्वाब पलते थे। वह सोचता था कि अपनी मेहनत और जज़्बे से वह दुनिया की हर मुश्किल को झुका देगा। उसने सपनों की एक ख़ूबसूरत इमारत सजाई थी,अपनों की मुस्कान, सुकून भरी रातें, और एक ऐसा मुकम्मल जहां जहां गम का साया भी न हो।
लेकिन ज़िंदगी कब किसी के ख़्वाबों से बंधकर चलती है? वक्त का पहिया घूमा और धीरे-धीरे हालात ने पासा पलटना शुरू किया। एक-एक करके उसकी उम्मीदों के महल ताश के पत्तों की तरह ढहने लगे। जिन रिश्तों पर उसे सबसे ज़्यादा नाज़ था, जिन मंज़िलों को उसने अपना मुक़द्दर समझा था, वे रास्ते गुम होते चले गए। जब ख़्वाब टूटे, तो उनका मलबा उसके अपने ही दिल पर गिरा।
वह अकेला उस मलबे के बीच खड़ा था। उसने चाहा कि उन बिख़रे हुए टुकड़ों को समेट ले, उन्हें जोड़कर फ़िर से ज़िंदगी को कोई शक्ल दे, लेकिन… अब जिस्म में वह ताक़त कहां थी? उम्र की थकान उसके कंधों पर एक भारी पहाड़ की तरह आन पड़ी थी। ज़िंदगी भर धूप-छांव झेलते-झेलते उसके क़दम डगमगाने लगे थे। और सबसे बड़ा धोखा उसकी अपनी आंखों ने दिया आंखों की बिनाई (रोशनी) धीरे-धीरे ख़त्म हो रही थी। दुनिया का वह रंग-बिरंगे कैनवास अब उसके लिए महज़ धुंधला सा अंधेरा बन चुका था। जिस शख़्स ने कभी दुनिया जीतने के ख़्वाब देखे थे, वह अब अपने ही घर के कोने में अपनों के सायों को तलाशने के लिए मोहताज हो चुका था।

थकान इतनी गहरी थी कि सांसें भी बोझिल लगने लगी थीं। तब उसे समझ आया कि इस दुनिया के मेले में अब उसका कोई हमसफ़र नहीं है, न ही उसकी पुकार सुनने वाला कोई रास्ता बचा है। और फ़िर… एक सर्द और ख़ामोश शाम उसने फैसला किया।
उसने दुनिया की इस भागदौड़, इन झूठे वादों, और इस बेवफ़ा महफ़िल से मुंह मोड़ लिया। उसने क़दम बढ़ाए उस मंज़िल की तरफ़, जो इस दुनिया-ए-फ़ानी (नश्वर दुनिया) की चमक-धमक से कोसों दूर है। वह चल दिया अपने मालिक-ए-हकीकी (सच्चे रब) की बारगाह में, जहां न कोई टूटे हुए ख़्वाबों का दर्द है, न उम्र की थकान है, और न ही आंखों का अंधेरा। वहां सिर्फ सुकून है, अनंत शांति है, और उस मालिक का आगोश है, जो हर टूटे हुए दिल को अपने सीने से लगा लेता है। पीछे छूट गई तो सिर्फ़ उसकी यादें, और हवाओं में गूंजती हुई उसकी वह दास्तान जिसे कोई समझ नहीं पाया, या शायद कोई समझना ही नहीं चाहता था।




