डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

कैसे हो तुम? उम्मीद है तुम्हारी दुनिया अब भी उसी मद्धम सी रोशनी और सुकून भरी ख़ामोशी में बसती होगी, जहाँ वक़्त जैसे थम सा जाता है। आज जाने क्यों पुरानी डायरी और कुछ भूल-बिसरे पन्ने पलटते हुए वो दौर आँखों के सामने आ गया, जब वक़्त किसी और ही रफ़्तार से चला करता था। तुम्हें याद होगा, वो दिन जब मैं तुम्हें ट्यूशन पढ़ाया करता था। तुम्हारी वो मासूम सी बेताबी, वक्त होने से पहले ही सब कुछ समेटकर तैयार हो जाना, और फ़िर दरवाज़े की चौख़ट पर खड़े होकर चुपचाप मेरे आने की मुंतज़िर रहना,वो मंज़र आज भी मेरी पलकों पर किसी तस्वीर की तरह सजा हुआ है। कभी किताबों के बीच फ़ूल रखना, कभी छोटे-छोटे कागज़ों पर मोहब्बत के पयाम लिखना, और शाम ढले चाय के कप उठाए उन अनगिनत बातों का सिलसिला… वो हसीन लम्हे हमारी ज़िंदगी की सबसे कीमती पूँजी हुआ करते थे। लेकिन वक्त ने कैसी करवट ली है!

अब मुक़द्दर की वो लकीरें बदल चुकी हैं, और हालात हमें कहाँ से कहाँ खींच लाए हैं। आज तो ज़िंदगी की रफ़्तार इतनी तेज़ हो चुकी है कि साँसें भी जवाब देने लगती हैं। अब किसी का इंतजार करने का हौसला बाक़ी नहीं रहा, क्योंकि वक्त ने फ़ासले इतने बढ़ा दिए हैं कि अब इंतज़ार की भी कोई सूरत नहीं, अब तो सीने में सिर्फ़ एक तड़प है, और वो बीते हुए लम्हे हैं जो जब भी याद आते हैं, आँखें नम कर देते हैं। चारों तरफ़ तेज़ रफ़्तार गाड़ियों का शोर है, ऊँची-ऊँची इमारतों का ऐसा जंगल है जहाँ खुली हवा में साँस लेना भी मुहाल है,एक ऐसी घुटन है जो रूह तक को जकड़े हुए है। अब तो बस एक टूटा हुआ दिल है, जो दर्द की इंतहा के साथ सीने में सिर्फ़ धड़क रहा है। पता नहीं अब तुम्हारा ठिकाना कहाँ है, कौन सा नया शहर तुम्हें रास आया है? मगर इस टूटती हुई साँसों और बिखरे हुए वज़ूद के साथ भी, दिल के किसी कोने में तुम्हारी वही पुरानी याद आज भी आबाद है।



