संजय झा और ललन सिंह के बीच फंसी जेडीयू इस समय वेंटिलेटर पर दिख रही है। यह संकट केवल पद या प्रतिष्ठा का नहीं है, बल्कि यह नीतीश कुमार के उस सुशासन के मॉडल और राजनीतिक साम्राज्य के ढहने की कहानी है,

नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (JDU) इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक और अस्तित्वगत संकट से गुजर रही है। बिहार की सत्ता पर दो दशकों से करीब-करीब एकछत्र राज करने वाले नीतीश कुमार के सामने आज अपनी ही पार्टी को बिखरने से बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है। राजनीति के गलियारों में यह चर्चा आम हो चुकी है कि JDU इस समय दो कद्दावर नेताओं संजय झा और ललन सिंह की ‘मूंछ की लड़ाई’ (अहंकार और वर्चस्व की जंग) में बुरी तरह फंस चुकी है। यह केवल दो नेताओं के बीच का मतभेद नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर दो अलग-अलग विचारधाराओं, कार्यशैलियों और भविष्य की रणनीतियों का टकराव है, जिसने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत और पार्टी के वजूद पर सवालिया निशान लगा दिया है। JDU के भीतर सत्ता के दो केंद्र बन चुके हैं। एक तरफ ललन सिंह हैं, जो पार्टी के पुराने रणनीतिकार और भूमिहार राजनीति के बड़े चेहरे माने जाते हैं। ललन सिंह का स्वभाव आक्रामक है और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में उनकी मजबूत पकड़ है। दूसरी तरफ संजय झा हैं, जिन्हें नीतीश कुमार का सबसे भरोसेमंद सिपहसालार और पार्टी का ‘दिल्ली कनेक्शन’ माना जाता है। संजय झा को हाल के दिनों में पार्टी के भीतर तेजी से तरजीह मिली है, खासकर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के साथ समन्वय बिठाने में उनकी भूमिका अहम रही है। यह टकराव तब और गहरा गया जब पार्टी के भीतर संगठनात्मक फैसलों और टिकट बंटवारे को लेकर दोनों नेताओं के बीच खींचतान खुलकर सामने आने लगी।

ललन सिंह जहां पार्टी के पुराने ढर्रे और क्षेत्रीय स्वायत्तता को बनाए रखना चाहते हैं, वहीं संजय झा पार्टी को एक नए कॉरपोरेट और दिल्ली-केंद्रित अंदाज में ढालने की कोशिश में हैं। इस मूंछ की लड़ाई ने पार्टी के भीतर गुटबाजी को चरम पर पहुंचा दिया है। JDU की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से नीतीश कुमार का सर्वमान्य नेतृत्व रहा है। लेकिन हाल के दिनों में उनकी ढलती उम्र और स्वास्थ्य को लेकर उठ रहे सवालों के बीच, पार्टी के भीतर ‘उत्तरदायित्व’ (Succession) की जंग तेज हो गई है। नीतीश कुमार इस समय ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जहां वे न तो ललन सिंह को पूरी तरह दरकिनार कर सकते हैं और न ही संजय झा के बढ़ते प्रभाव को रोक सकते हैं। दोनों ही नेता नीतीश के लिए अपरिहार्य हैं, लेकिन दोनों का एक साथ चलना अब असंभव सा प्रतीत हो रहा है। नीतीश कुमार की इस असमंजसता का फायदा उठाकर पार्टी के भीतर के अन्य नेता भी अपनी-अपनी गोटियां सेट करने में लग गए हैं, जिससे मुख्यमंत्री की अपनी पार्टी पर पकड़ कमजोर होती दिख रही है। जनता दल यूनाइटेड का जन्म समाजवाद की कोख से हुआ था। कर्पूरी ठाकुर और शरद यादव की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करने वाली यह पार्टी आज अपनी मूल वैचारिक पहचान खोने के कगार पर है। बार-बार गठबंधन बदलने (कभी राजद के साथ तो कभी भाजपा के साथ) के कारण पार्टी की साख जनता के बीच पहले ही प्रभावित हुई थी। अब, संजय झा और ललन सिंह की जंग ने इसे पूरी तरह से एक ‘पावर-ब्रोकर’ पार्टी में तब्दील कर दिया है। कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति है कि पार्टी आखिर किस नीति और किस एजेंडे पर आगे बढ़ रही है। इस अंदरूनी कलह के बीच सबसे बड़ा खतरा जेडीयू के अस्तित्व पर मंडरा रहा है। बिहार की राजनीति में यह कयास लंबे समय से लगाए जा रहे हैं कि नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का क्या होगा? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि संजय झा और ललन सिंह की यह मूंछ की लड़ाई इसी तरह जारी रही, तो पार्टी का दोफाड़ होना तय है। ललन सिंह का गुट बागी तेवर अपनाकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) या किसी अन्य क्षेत्रीय गठबंधन की ओर रुख कर सकता है। संजय झा के नेतृत्व वाला धड़ा अंततः जेडीयू का विलय भारतीय जनता पार्टी (BJP) में करा सकता है। दोनों ही स्थितियों में ‘जनता दल यूनाइटेड’ नाम के क्षेत्रीय दल का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, जो बिहार की राजनीति के एक बड़े अध्याय का अंत होगा। नेताओं की इस आपसी लड़ाई का सबसे बुरा असर जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है।

JDU का पारंपरिक वोटर (लव-कुश समीकरण और अति पिछड़ा वर्ग) अब धीरे-धीरे अन्य विकल्पों की तलाश कर रहा है। ललन सिंह और संजय झा की मूंछ की लड़ाई ने जमीनी स्तर पर संगठन को पंगु बना दिया है। इस स्थिति का सीधा फायदा राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और चिराग पासवान की लोजपा (R) जैसे दलों को मिल रहा है, जो JDU के जनाधार में सेंध लगाने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं। संजय झा और ललन सिंह के बीच फंसी जेडीयू इस समय वेंटिलेटर पर दिख रही है। यह संकट केवल पद या प्रतिष्ठा का नहीं है, बल्कि यह नीतीश कुमार के उस सुशासन के मॉडल और राजनीतिक साम्राज्य के ढहने की कहानी है, जिसे उन्होंने तीन दशकों में खड़ा किया था। यदि नीतीश कुमार ने जल्द ही सख्त कदम उठाकर इस ‘मूंछ की लड़ाई’ को खत्म नहीं किया और पार्टी को एक स्पष्ट उत्तराधिकारी और दिशा नहीं दी, तो जनता दल यूनाइटेड का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना तय है। यह संकट अब अपरिहार्य हो चुका है, और आने वाले दिन तय करेंगे कि जेडीयू इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाती है या खुद को समाप्त कर लेती है।



