डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

बेवफ़ाई उसने मुझसे की है, और कोई तो बात नहीं है।
तुम बुलाओ और मैं न आऊँ, ऐसी तो कोई बात नहीं है।
तुम जागो मैं सो जाऊँ, ऐसी तो सच कोई बात नहीं है।
मुझको सताओ और मैं रूठूँ, यार ऐसी तो बात नहीं है।
तुम चाहो तो मुझको भूलो, और मैं तुमको भुला दूँ,
सच कहता हूं ,मैं तुमसे ऐसी तो कोई बात नहीं है।
कहती है ये दुनिया पागल, और कोई तो बात नहीं है।
सावन आया आओगे, मैं न आऊँ ऐसी कोई बात नहीं है।
राह तकते आँखें पत्थ हो गई और कोई तो बात नहीं है।
होंठों को छूना चाहूँ, अलावा और कोई तो बात नहीं है।
तेरे बिन ये ज़िंदगानी, “मुश्ताक़” मेरी सूनी अधूरी,
और दूजी तो मेरे हमदम, हाँ-हाँ कोई बात नहीं है।

