उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल ही सवाल क्यों ?

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया के नियमों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि बार-बार परीक्षाओं का स्थगित होना, पेपर लीक होना और नियमावलियों में अस्पष्टता युवाओं के भविष्य को अधर में डाल रही है।

उत्तर प्रदेश (UP) में सरकारी नौकरी की चाह रखने वाले करोड़ों युवाओं के लिए भर्ती प्रक्रिया किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं रह गई है। चाहे वह उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की परीक्षाएं हों, उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) की भर्तियाँ हों, या फिर शिक्षक और पुलिस भर्ती; हर जगह नियमों, प्रक्रियाओं और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। प्रतियोगी छात्र लगातार सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर हैं। आइए विस्तार से विश्लेषण करते हैं कि आखिर यूपी की भर्ती प्रक्रिया के नियमों पर सवाल ही सवाल क्यों उठ रहे हैं। यूपी की भर्ती परीक्षाओं के साथ ‘पेपर लीक’ का नाम जैसे स्थायी रूप से जुड़ गया है। हाल के वर्षों में यूपी पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा, समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी (RO/ARO) परीक्षा और यूपीटीईटी (UPTET) जैसी बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के कारण इन्हें रद्द करना पड़ा। जब सरकार और आयोगों के पास फुलप्रूफ सुरक्षा व्यवस्था का दावा होता है, तो हर बार पेपर लीक माफिया नियमों में सेंध कैसे लगा लेते हैं? परीक्षा केंद्रों के चयन और प्रिंटिंग प्रेस के चयन को लेकर कड़े नियमों का पालन क्यों नहीं सुनिश्चित हो पाता? विभिन्न आयोगों द्वारा बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के कारण परीक्षाओं को कई शिफ्टों (पालियों) में आयोजित कराया जाता है। इसके बाद अंकों के संतुलन के लिए ‘नॉर्मलाइजेशन’ पद्धति अपनाई जाती है। इस नियम के गणितीय फार्मूले इतने जटिल और अस्पष्ट हैं कि कई बार अधिक अंक पाने वाला अभ्यर्थी मेरिट से बाहर हो जाता है, जबकि कम अंक वाले का चयन हो जाता है। छात्र लगातार मांग कर रहे हैं कि परीक्षा ‘एक दिन, एक शिफ्ट’ (One Day, One Shift) के नियम पर कराई जाए ताकि किसी भी प्रकार के भेदभाव की गुंजाइश न रहे। हाल ही में UPPSC प्रीलिम्स और RO/ARO परीक्षा को लेकर हुआ आंदोलन इसी नियम के खिलाफ था।

कानूनी रूप से यह स्थापित सिद्धांत है कि “खेल शुरू होने के बाद खेल के नियम नहीं बदले जा सकते”, लेकिन यूपी की कई भर्तियों में विज्ञापन जारी होने के बाद या परीक्षा संपन्न होने के बाद भी नियमों में बदलाव कर दिया जाता है। कट-ऑफ मार्क्स (Arriving Percentage) को अचानक बदल देना, सीटों की संख्या में भारी फेरबदल करना, या अर्हता (Eligibility) के नियमों को बीच प्रक्रिया में संशोधित करने से पूरी भर्ती कानूनी विवादों में फंस जाती है। 69,000 शिक्षक भर्ती इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो वर्षों तक कोर्ट के चक्कर काटती रही। भर्ती प्रक्रियाओं में ऊर्ध्वाधर (Vertical) और क्षैतिज (Horizontal) आरक्षण को लागू करने के नियमों को लेकर भी भारी भ्रम और विवाद की स्थिति बनी रहती है। आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्रों को सामान्य श्रेणी (General Category) में ओवरलैप कराने के नियमों पर अक्सर आयोगों और सरकार के स्तर पर गलतियां देखी गई हैं। इसके कारण हर दूसरी भर्ती परीक्षा के परिणाम को माननीय उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाती है, जिससे पूरी प्रक्रिया ठप हो जाती है।

यूपी में किसी सरकारी नौकरी का विज्ञापन निकलने से लेकर नियुक्ति पत्र मिलने तक औसतन 3 से 5 साल का समय लग जाता है। कैलेंडर के अनुसार परीक्षाएं आयोजित करने का कोई कड़ा नियम या समयबद्ध बाध्यता आयोगों पर लागू नहीं होती। विज्ञापन संख्या सालों पुरानी होती है और परीक्षाएं सालों बाद होती हैं। इस कछुआ गति के कारण लाखों युवाओं की उम्र सीमा (Age Limit) समाप्त हो जाती है और उनके पास कोई दूसरा मौका नहीं बचता। शायद ही यूपी की कोई ऐसी परीक्षा होती होगी जिसकी प्रारंभिक उत्तर कुंजी (Provisional Answer Key) आने के बाद दर्जनों प्रश्नों पर आपत्तियां न दर्ज होती हों। जब देश के शीर्ष विशेषज्ञ प्रश्नपत्र तैयार करते हैं, तो हर बार 4 से 5 प्रश्न गलत, भ्रामक या दोहरे अर्थ वाले कैसे हो जाते हैं? इसके बाद प्रश्नों को हटाने या कॉमन अंक देने के जो नियम अपनाए जाते हैं, उससे पूरी मेरिट लिस्ट प्रभावित होती है और योग्य छात्र बाहर हो जाते हैं। एक तरफ नियमित सरकारी नौकरियों के नियमों पर संकट है, तो दूसरी तरफ सरकार लगातार कई विभागों में आउटसोर्सिंग (Outsourcing) और संविदा (Contractual) के जरिए भर्तियाँ कर रही है। स्थाई रोजगार के नियमों को दरकिनार कर ठेके प्रथा को बढ़ावा देने से युवाओं में भारी असुरक्षा की भावना है। इसमें न तो आरक्षण के नियमों का सही पालन होता है और न ही युवाओं को उचित मानदेय मिल पाता है।

यूपी में भर्ती प्रक्रियाओं के नियमों पर उठते ये सवाल सीधे तौर पर प्रशासनिक इच्छाशक्ति और व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं। युवाओं का आयोगों पर से भरोसा उठना लोकतंत्र और राज्य के विकास के लिए एक चिंताजनक संकेत है।

यदि इन सवालों को हमेशा के लिए समाप्त करना है, तो सरकार को निम्नलिखित कड़े कदम उठाने होंगे:

  • एक दिन, एक शिफ्ट: सभी प्रमुख परीक्षाएं एक ही पाली में कराई जाएं ताकि नॉर्मलाइजेशन का झंझट ही खत्म हो।
  • समयबद्ध चयन प्रक्रिया: विज्ञापन से लेकर जॉइनिंग तक अधिकतम 9 से 12 महीने का कड़ा और बाध्यकारी नियम बने।
  • भर्ती कानून: पेपर लीक और धांधली रोकने के लिए एक बेहद सख्त, गैर-जमानती धाराओं वाला कानून जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू हो।
  • जवाबदेही: यदि कोई परीक्षा टलती है या प्रश्न गलत होते हैं, तो आयोग के अधिकारियों और प्रश्न बनाने वाले विशेषज्ञों पर भारी आर्थिक दंड और अनुशासनात्मक कार्रवाई का नियम हो।

जब तक उत्तर प्रदेश चयन बोर्ड और आयोग पूरी तरह से पारदर्शी, समयबद्ध और विवाद-मुक्त नियमों को नहीं अपनाएंगे, तब तक युवाओं के भविष्य पर यह संकट और नियमों पर सवाल यूं ही बरकरार रहेंगे।

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