धनतेरस,आस्था, संस्कृति और आरोग्यता का महापर्व,,,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

आदाब और नमस्कार! दीपावली के ठीक पहले आने वाला पावन पर्व धनतेरस केवल सोने-चांदी, बर्तन या खरीदारी का ही त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमारी गहरी आस्था, अटूट निष्ठा, प्रेम, संस्कारों, संस्कृति और आपसी भाईचारे का जीवंत अहसास है। भारतीय परिवेश और ग्रामीण-शहरी ताने-बाने में यह पर्व रिश्तों की गर्माहट और जीवन में आरोग्यता का संदेश लेकर आता है। भारतीय संस्कृति में हर पर्व के पीछे कोई न कोई गहरा सामाजिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक संदेश छिपा होता है। दीपावली के पावन पर्व की श्रृंखला का शुभारंभ जिस पर्व से होता है, वह है,धनतेरस (धनत्रयोदशी)। यह सिर्फ़ भौतिक सुख-सुविधाओं और धन-धान्य की कामना का दिन नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में समृद्धि, संतोष और स्वास्थ्य का उत्सव है। हमारे गाँवों और छोटे कस्बों से लेकर महानगरों तक, धनतेरस की रौनक़ देखते ही बनती है। खेतों में लहलहाती फसलें और घरों के आँगन में उत्सव की तैयारी,भारतीय परिवेश में यह पर्व परिवार के साथ जुड़ने का माध्यम है। परंपरा और उल्लास, इस दिन घरों की लिपाई-पुताई, साफ़-सफ़ाई और रंगोली सजाने का कार्य इस बात का प्रतीक है कि हम अपने जीवन में सकारात्मकता का स्वागत करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।


बर्तन और खरीदारी का शगुन,भले ही आज आधुनिक युग में लोग ऑनलाइन शॉपिंग करने लगे हों, लेकिन धनतेरस के दिन बाज़ार जाकर पीतल, तांबे या मिट्टी के बर्तन खरीदना, या अपनी सामर्थ्य के अनुसार कोई छोटी-सी वस्तु घर लाना आज भी हमारे संस्कारों का हिस्सा है। यह परंपरा इस बात को दर्शाती है कि हम अपनी पुरानी जड़ों और संस्कृति से मजबूती से जुड़े हुए हैं। धनतेरस के दिन केवल कुबेर जी की ही नहीं, बल्कि भगवान धनवंतरी की पूजा का भी विशेष विधान है। समुद्र मंथन के दौरान भगवान धनवंतरी हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है,हमारे बुजुर्ग हमेशा कहते रहे हैं,“पहला सुख निरोगी काया।” भगवान धनवंतरी इस बात के प्रतीक हैं कि भौतिक धन का कोई मूल्य नहीं यदि मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक न हो। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि असली धन सोना-चांदी नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन और सुसंस्कृत आचरण है। धनतेरस की शाम जब घर के मुख्य द्वार पर और आँगन में यमराज के निमित्त दीपक (दीया) जलाया जाता है, तो वह केवल प्रकाश का प्रसार नहीं होता, बल्कि वह अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और परिवार की लंबी उम्र की प्रार्थना होती है।

इस दिन जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर दीप जलाते हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं, तो यह आपसी प्रेम, मेल-जोल और भाईचारे के बंधन को और मजबूत करता है। पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ मिठाई बाँटना, एक-दूसरे के घर जाकर कुशलक्षेम पूछना,यह हमारी उस साझी संस्कृति की बानगी है जो हमें अकेलेपन से निकालकर एक विशाल परिवार का हिस्सा होने का अहसास कराती है। धनतेरस हमें यह याद दिलाता है कि हमारा जीवन केवल भौतिक सफ़लताओं की दौड़ नहीं है, बल्कि यह संवेदनाओं, परंपराओं और एक-दूसरे के प्रति प्रेम का उत्सव है। जब हम संस्कृति की इस डोर को थामे रखते हैं, तो हमारे संस्कार जीवित रहते हैं और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी मिट्टी से जुड़ी रहती हैं। इस धनतेरस, आइए हम संकल्प लें कि हम केवल अपने घरों में ही दीये नहीं जलाएंगे, बल्कि अपनों के दिलों में भी प्रेम और भाईचारे का प्रकाश फैलाएंगे।

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