इस दीपावली न मतभेद, न मनभेद: अपनों के संग खुशियों के दीप जलाने का महापर्व

भारतीय संस्कृति में त्योहारों का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों या बाहरी चकाचौंध तक सीमित नहीं है, बल्कि ये हमारे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने और रिश्तों में नई ऊर्जा भरने का माध्यम हैं।

इन्हीं महापर्वों में सबसे प्रमुख है—दीपावली। अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक यह पर्व हमें केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने मन के भीतर के अंधेरों को भी दूर करने का संदेश देता है। इस वर्ष दीपावली के पावन अवसर पर सबसे सुंदर संकल्प यही हो सकता है कि हम सारे गिले-शिकवे, मतभेद और मनभेद भुलाकर अपने घर लौटें और अपनों के साथ मिलकर इस उत्सव को मनाएं। आज की तेज रफ्तार जिंदगी और आधुनिक जीवनशैली ने इंसान को भौतिक रूप से तो बहुत आगे बढ़ा दिया है, लेकिन भावनात्मक रूप से कहीं न कहीं अकेला कर दिया है। करियर की ऊंचाइयों को छूने, बेहतर भविष्य की तलाश करने और जिम्मेदारियों को निभाने की दौड़ में हम अक्सर अपने ही परिवार, गांव, शहर और पुराने मित्रों से दूर होते चले जाते हैं। कई बार व्यस्तता के कारण संवाद कम हो जाता है, और यही संवादहीनता धीरे-धीरे गलतफहमियों, मतभेदों और फिर गहरे मनभेदों का रूप ले लेती है। साल भर हम विभिन्न कारणों से अपने दिलों में अनकही बातों का बोझ ढोते रहते हैं। छोटी-छोटी बातों पर उपजी नाराजगी कई बार रिश्तों में इतनी बड़ी दीवार खड़ी कर देती है कि अपनों से बात करना या उनके पास जाना भी कठिन लगने लगता है। लेकिन दीपावली का पर्व एक ऐसा सुनहरा अवसर लेकर आता है, जो इन सभी दीवारों को गिराने और दिलों के बीच फिर से सेतु बनाने का काम करता है।

‘घर’ केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट से बना कोई ढांचा नहीं होता, बल्कि यह उन भावनाओं, यादों और रिश्तों का संगम है, जहां हमें बिना किसी शर्त के अपनापन मिलता है। जब हम कहते हैं कि “बस घर चलते हैं”, तो इसका अर्थ केवल भौगोलिक रूप से अपने पैतृक निवास या परिवार के पास पहुंचना नहीं होता, बल्कि इसका अर्थ अपने मूल, अपनी जड़ों और उन लोगों के करीब लौटना है जो हमारी खुशियों में खुश होते हैं और दुखों में हमारे साथ खड़े रहते हैं। दीपावली की छुट्टियों में जब देश के कोने-कोने से लोग अपने घरों की ओर लौटते हैं, तो सड़कों, स्टेशनों और हवाई अड्डों पर दिखने वाली भीड़ केवल यात्रियों की संख्या नहीं होती, बल्कि वह अपनों से मिलने की व्याकुलता और प्रेम का जीवंत प्रमाण होती है। मां के हाथों के बने पकवानों की खुशबू, पिता की स्नेहभरी मुस्कान, भाई-बहनों की हंसी-ठिठोली और बुजुर्गों के आशीर्वाद के सामने दुनिया की बड़ी से बड़ी भौतिक उपलब्धि भी फीकी पड़ जाती है। जीवन में विचारों का अलग होना या किसी विषय पर असहमति होना स्वाभाविक है। इसे ही ‘मतभेद’ कहा जाता है। एक स्वस्थ समाज और परिवार में मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं है, क्योंकि हर व्यक्ति का दृष्टिकोण और अनुभव अलग हो सकता है। समस्या तब शुरू होती है जब यह मतभेद ‘मनभेद’ में बदल जाता है—अर्थात जब हम विचारों की असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी या घृणा का रूप दे देते हैं और सामने वाले के प्रति मन में कड़वाहट पाल लेते हैं। दीपावली का दीप हमें यही सिखाता है कि जिस प्रकार एक छोटा सा दीपक घने से घने अंधकार को पल भर में समाप्त कर देता है, उसी प्रकार क्षमा, प्रेम और विनम्रता की एक छोटी सी पहल वर्षों पुराने मनभेद को मिटा सकती है। इस दीपावली हमें यह तय करना चाहिए कि विचारों की भिन्नता को स्वीकार करते हुए भी हम अपने मन में किसी के प्रति कोई मैल नहीं रखेंगे।

सामूहिक उत्सव का आनंद

अकेले जलाया गया एक दीप केवल एक कोने को रोशन करता है, लेकिन जब पूरा परिवार और समाज मिलकर हजारों दीप जलाता है, तो पूरी धरा जगमगा उठती है। उत्सव का वास्तविक आनंद भी तभी है जब उसे अपनों के साथ साझा किया जाए। जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करते हैं, मिलकर घर की सजावट करते हैं, रंगोली बनाते हैं और एक-दूसरे को मिठाइयां खिलाते हैं, तो उस वातावरण में एक अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ मिलकर दीपावली मनाने से बच्चों को भी अपनी संस्कृति, परंपराओं और पारिवारिक मूल्यों की सीख मिलती है। वे समझते हैं कि त्योहार केवल पटाखे फोड़ने या नए कपड़े पहनने का नाम नहीं है, बल्कि यह बड़ों का सम्मान करने, छोटों को स्नेह देने और हर परिस्थिति में एकजुट रहने का प्रतीक है।

आइए, इस दीपावली पर हम बाहरी सजावट के साथ-साथ अपने अंतर्मन को भी प्रेम, करुणा और सद्भाव के दीपों से प्रकाशित करें। यदि किसी अपने से कोई नाराजगी है, तो अहंकार को त्याग कर आगे बढ़ें और संवाद की शुरुआत करें। पुराने सारे गिले-शिकवे भुलाकर एक नई शुरुआत करें। क्योंकि जीवन बहुत छोटा है और अपनों का साथ ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। आइए, इस पावन पर्व पर सारे मतभेद और मनभेद भुलाकर घर चलें, अपनों को गले लगाएं और सब मिलकर साथ में दीपावली मनाएं। आप सभी को प्रकाश के इस महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। शुभ दीपावली!

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