डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

शाम की हल्की सुरमई रोशनी कमरे की खिड़की से छन कर मेज़ पर रखी खाली कॉपी और सूखे हुए क़लम पर पड़ रही थी। बाहर दरख़्तों के पत्ते हवा के हल्के झोंकों से बिछड़ने का मातम कर रहे थे। मुश्ताक़ ने बिस्तर की पुश्त से टेक लगाई और अपनी कमज़ोर होती हुई उंगलियों से चेहरे पर आई नक़ाहत की लकीरों को छुआ। जिस्म अब भी एक तवील और थका देने वाले बुख़ार की तपिश को याद करके कांप उठता था, लेकिन दिल के अंदर जो एक कसक थी, वह इस जिस्मानी तकलीफ़ से कहीं ज़ियादा गहरी थी। “ख़ामोशी को अक्सर लोग बे-रुख़ी क्यों समझ लेते हैं?” उन्होंने एक सर्द आह भरते हुए सोचा। कुछ अरसा पहले तक ज़िंदगी मअमूल के मुताबिक़ रवां-दवां थी। लेकिन फिर नागहानी हालात ने ऐसा मोड़ लिया कि एक नागुज़ीर और इंतहाई ज़रूरी काम आन पड़ा। सफ़र इतना लाज़मी था कि इसे टालना मुमकिन न था। मंज़िलें एक नहीं थीं; राजस्थान की तपती हुई सड़कों से लेकर उड़ीसा के साहिली रास्ते और फिर कलकत्ता के हुजूम तक… एक ही सांस में तीन विभिन्न रियासतों की मुसाफ़त तय करनी थी। सितम बाला-ए-सितम यह हुआ कि किसी गाड़ी में रिज़र्वेशन का एक बर्थ भी मयस्सर न आ सका। हालात का तक़ाज़ा था कि क़दम पीछे न हटाए जाएं। चुनांचे, मजबूरी में गाड़ी का स्टीयरिंग संभाला और हज़ारों किलोमीटर के इस कठिन और तवील सफ़र पर ब-ज़रीआ सड़क रवाना हो गए।

यह सफ़र क्या था, जिस्म और रूह के लिए एक इम्तिहान था। मुसलसल ड्राइविंग, रातों का जागना, सड़कों की धूल, बे-वक़्त और बे-ढंगा खाना… इस बे-तरतीब ज़िंदगी ने अंदर ही अंदर सेहत की इमारत को खोखला करना शुरू कर दिया था। लेकिन काम की धुन में उस वक़्त जिस्म के एहतेजाज को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा। जब सफ़र का सिलसिला तमाम हुआ और लौटे, तो जिस्म ने जैसे जवाब दे दिया। बीमारी ने ऐसा घेरा कि पूरा एक महीना बिस्तर-ए-अलालत पर ज़ेर-ए-इलाज गुज़र गया। शदीद नक़ाहत, बिस्तर की तपिश और दवाओं की कड़वाहट ने ज़िहन को इस क़दर निढाल कर दिया था कि दुनिया के तमाम मुआमलात पस-ए-पुश्त चले गए। इस एक महीने की तन्हाई में फ़ोन का बजना, लोगों की ख़ैर-ओ-आफ़ियत मालूम करना या किसी को अपने हालात बताना… सब कुछ एक भारी बोझ महसूस होने लगा। रोज़ दिल में एक ख़याल आता कि “आज बात करूंगा… नहीं, कल ज़रा सेहत संभल जाए तो हालात से आगाह करूंगा…” लेकिन “आज” और “कल” के इस चक्कर में दिन, हफ़्तों में और हफ़्ते पूरे महीने में बदल गए। दूसरी तरफ़, राब्ता टूटने से सामने वालों ने अपने गुमान का जाल बुनना शुरू कर दिया। किसी ने इस ख़ामोशी को ‘बे-नियाज़ी’ कहा, तो किसी ने इसे ‘ग़ुरूर’ और ‘बे-रुख़ी’ का नाम दे दिया। वह भी अपने मान में ख़ामोश हो गए और यूं एक ऐसा ख़ला पैदा हो गया जिसका हक़ीक़त से कोई तअल्लुक़ न था। हालांकि दिल में न कोई मलाल था, न तअल्लुक़ की गर्मजोशी में कोई कमी आई थी बस एक मजबूरी थी जिसने ज़बान पर ताले लगा दिए थे। आज, जब अल्लाह तआला के फ़ज़्ल-ओ-करम से बीमारी के बादल छटने लगे और सेहत में कुछ बेहतरी आई, तो मुश्ताक़ ने सबसे पहले क़लम उठाया।

उन्होंने सफ़ेद काग़ज़ पर अपने जज़्बात की रोशनाई बिखेरनी शुरू की, “ज़िंदगी कभी-कभी इंसान को ऐसे बेबस मोड़ पर ला खड़ा करती है जहां से अलफ़ाज़ गुम हो जाते हैं। मेरा तवील सफ़र, मेरी बीमारी और यह बेबस ख़ामोशी… इसको अब आप चाहे जो भी नाम दें, ख़्वाह बे-रुख़ी कहें या ग़फ़लत, मुझे दिल से मंज़ूर है। लेकिन सच्चाई यही है कि तअल्लुक़ की डोरी कटी नहीं थी, बस सफ़र की गर्द ने इसे कुछ देर के लिए धुंधला दिया था…” उन्होंने ख़त पर अपना नाम मुश्ताक़ अहमद लिखा और एक गहरी और पुर-सकून सांस ली। ऐसा लगा जैसे काग़ज़ के इस टुकड़े ने उनके दिल का सारा बोझ अपने ऊपर ले लिया हो।




