बे ज़मीर थोड़ी हूँ. चिंगारियां जो नफ़रत की लिए फिरते हैं । साथ उनके हो जाऊं वो इंसान थोड़ी हूँ ।

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

चिंगारियां जो नफ़रत की लिए फिरते हैं । साथ उनके हो जाऊं वो इंसान थोड़ी हूँ ।

मेरी खुशियों को लूटना चाहता है वो , । काँटे राहों में बिछा दूं वो इंसान थोड़ी हूं।

मेरे मुत्तालिक़ कोई राय तु कर ले क़ायम । मेरा भी किरदार है मैं बे ज़मीर थोड़ी हु ।

अहसान करके मैं तो भूल ही जाता हूं , हर घड़ी हरपल जतलाऊ वो इंसान थोड़ी हूं।

खराशे तल्ख़ बातों की भुलाई नही जाती । पुराने ज़ख्म भुल जाऊ वो इंसान थोड़ी हु ।

हवाओ मे इस तरह कोई बाते न करो तुम। हक़ीक़त हुं में मुश्ताक कोई ख़्वाब थोडी हुं ।

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