“मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है” पितृसत्तात्मक सोच, महिलाओं पर पाबंदियां और लैंगिक असमानता के खिलाफ आवाज,,बदलता भारत —

“मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है” ये नारे सिर्फ मजाक या व्यंग्य नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच, महिलाओं पर लगाई जाने वाली पाबंदियों और लैंगिक असमानता के खिलाफ उठती आवाज को दर्शाते हैं।

जब महिलाओं के कपड़ों, उनकी आजादी और उनके फैसलों पर सवाल उठाए जाते हैं, तो विरोध के ऐसे नारे समाज की सोच पर भी सवाल खड़े करते हैं। महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान, समान अधिकार और अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी किसी की मेहरबानी नहीं, उनका अधिकार है। आखिर महिलाओं को अपनी आजादी के लिए बार-बार आवाज क्यों उठानी पड़ती है? क्या समाज की सोच बदलने का समय नहीं आ गया है?“सुनो जी, जरा चाय का पानी चढ़ा देना… आज ऑफिस में बड़ी मीटिंग थी, सिर फटा जा रहा है।”आधुनिक, मेट्रोपॉलिटन, 21वीं सदी के भारत के एक मध्यवर्गीय ड्राइंग रूम से यह आवाज आती है। आप सोचेंगे कि वाह! ‘बदलता भारत’ है, पत्नी काम से थककर आई है और पतिदेव रसोई की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। लेकिन ठहरिए! कैमरा थोड़ा ज़ूम-आउट कीजिए। पति महोदय सोफे पर पैर पसारे रील्स स्क्रॉल कर रहे हैं और यह फरमाइश उन्होंने अपनी उस पत्नी से की है, जो खुद अभी-अभी 9 घंटे की शिफ्ट पूरी करके, लोकल ट्रेन की भीड़ में ‘मैन-डिंग’ (पुरुषों की कोहनियों) से जूझते हुए घर लौटी है। तभी तो बरबस ही किसी शायरनुमा आधुनिक कामकाजी महिला के दिल से यह चीख निकलती है— “मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!” यह कोई मामूली सिरदर्द नहीं है, जो एक ‘एस्पिरिन’ या ‘सैंडलवुड बाम’ से ठीक हो जाए। यह सदियों पुरानी उस सामाजिक बीमारी का लक्षण है जिसे ‘पितृसत्ता’ (Patriarchy) कहते हैं। भारत चांद पर पहुंच गया है, डिजिटल क्रांति में दुनिया को रास्ता दिखा रहा है, लेकिन जब बात लैंगिक समानता की आती है, तो हमारी पितृसत्तात्मक सोच आज भी बैलगाड़ी के गियर पर चल रही है।

हम गर्व से छाती ठोकते हैं कि हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं। लेकिन जैसे ही वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) अपनी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2026 जारी करता है, हमारा डिजिटल राष्ट्रवाद थोड़ा सा थमा हुआ महसूस करता है। इस सूचकांक में भारत 145 देशों में से 131वें स्थान पर है. [1]

पैमाना (Sub-index)भारत का स्कोर / स्थितिकड़वी हकीकत
शैक्षणिक योग्यता (Educational Attainment)96.6% पैरिटी (लगभग बराबर)लड़कियां पढ़ तो रही हैं, पर डिग्री सिर्फ शादी के बायोडाटा में लगाने के लिए?
आर्थिक भागीदारी (Economic Participation)सिर्फ 41.2% समानतादफ्तरों और फैसलों में महिलाएं अब भी पुरुषों से मीलों पीछे हैं।

यह विरोधाभास किसी व्यंग्य से कम नहीं है। हम बेटियों को पढ़ा तो रहे हैं (क्योंकि विज्ञापनों में अच्छा लगता है), लेकिन जैसे ही वही बेटी कहती है, “पापा, मुझे रात की शिफ्ट में काम करना है या बिजनेस के लिए लोन चाहिए,” तो हमारे समाज का अंदरूनी ‘मर्द’ जाग जाता है और कहता है, “ज्यादा उड़ो मत, चूल्हा-चौका ही आखिरी सच है।”

अब बात करते हैं उस अदृश्य श्रम की, जिसे हमारे समाज में ‘ममता’ और ‘कर्तव्य’ का पवित्र नाम देकर मुफ्त में हड़प लिया जाता है। टाइम यूज़ सर्वे (Time Use Survey) के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिलाएं हर दिन औसतन 289 मिनट बिना वेतन वाले घरेलू कामों (सफाई, खाना बनाना, तीमारदारी) में बिताती हैं, जबकि पुरुष महाशय इस काम के लिए मात्र 88 मिनट का ‘अहसान’ करते हैं। यह एक बेहतरीन कॉर्पोरेट स्कैम जैसा है। महिला बाहर जाकर पैसे भी कमाए, फिर घर आकर ‘होम-मिनिस्टर’ का वो बिना सैलरी वाला पद भी संभाले जिसमें कोई वीकेंड नहीं होता। पुरुष घर के काम में हाथ बंटाने को ‘मदद करना’ कहते हैं, जैसे वह किसी पराए देश के राष्ट्रपति के घर में वॉलंटियरिंग कर रहे हों! यह सोच ही सिरदर्द की असली जड़ है। बदलते भारत में महिलाओं पर पाबंदियों का स्वरूप बदल गया है, लेकिन नीयत वही है। पहले लड़कियों को घर से निकलने नहीं दिया जाता था, अब उन्हें ‘सुरक्षा’ के नाम पर छह बजे के बाद बाहर न निकलने की हिदायत दी जाती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि आज भी भारत में लगभग 29% विवाहित महिलाओं को किसी न किसी रूप में घरेलू या शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। इससे भी ज्यादा दुखद और व्यंग्यात्मक बात यह है कि लगभग 45% महिलाएं और 44% पुरुष यह मानते हैं कि कुछ परिस्थितियों में पति का पत्नी को पीटना ‘जायज’ है। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा हिंसा को ‘अनुशासन’ और पाबंदियों को ‘परंपरा’ मान ले, तो समझ जाना चाहिए कि मानसिक रूप से हमारा समाज कितना बीमार है। हम बेटियों को ‘नारी शक्ति’ कहते हैं, मगर रात को सड़क पर अकेली लड़की देखकर हमारी व्यवस्था और सोच दोनों हांफने लगती हैं।

आज का आधुनिक पुरुष सोशल मीडिया पर नारीवाद (Feminism) पर लंबे-चौड़े ब्लॉग लिखता है। वह ‘इक्वल राइट्स’ की रील को लाइक करता है। लेकिन जैसे ही उसकी खुद की बहन अपने पार्टनर का चुनाव खुद करने की बात करती है, या उसकी पत्नी अपनी कमाई का हिसाब अपने हाथ में रखने की जिद करती है, वैसे ही उसका लिबरल चोगा फट जाता है। भीतर से वही 16वीं सदी का सामंत बाहर निकल आता है जो चिल्लाता है— “आखिर तुम एक औरत हो!” लैंगिक असमानता का यह नया दौर बेहद शातिर है। यह आपको बराबरी का भ्रम देता है, लेकिन कमान हमेशा पुरुष के हाथ में रखता है। कार की ड्राइविंग सीट पर महिला को बिठा तो दिया गया है, लेकिन बगल की सीट पर बैठा पुरुष लगातार चिल्ला रहा है— “क्लच दबाओ! गियर बदलो! देख के… औरतें गाड़ी ठीक से नहीं चला पातीं!” “मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है”— यह जुमला केवल पुरुषों पर कीचड़ उछालने के लिए नहीं है, बल्कि उस ‘माइंडसेट’ पर सीधा प्रहार है जो पुरुषों को विशेषाधिकार (Privilege) की अफीम चटाता है और महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखता है। बदलता भारत तब तक पूरी तरह नहीं बदलेगा, जब तक हम अपनी बेटियों को पाबंदियों की बेड़ियों से आजाद नहीं करेंगे। असली विकास तब होगा जब जेंडर गैप की फाइलों पर धूल जमना बंद होगी और घर से लेकर संसद तक महिलाओं की आवाज को ‘कोलाहल’ नहीं, बल्कि ‘नीति’ माना जाएगा। तब तक के लिए, पुरुष साथियों को मशवरा है कि चाय खुद बना लें, क्योंकि महिलाओं के सिर का दर्द अब आपके दिए बाम से नहीं, बल्कि उनके हक की आज़ादी से ही ठीक होगा!

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