डॉ. एम. ए. शाह ,’सहज’, (मगरधा),
वो और हैं जो बदलते हैं करवटें शब भर, आशिक़ हूँ मगर इतना भी बेकल नहीं हूँ मैं।

मसला तो हूँ मगर इतना मुश्किल नहीं हूँ मैं,
वो और हैं जो बदलते हैं करवटें शब भर, आशिक़ हूँ मगर इतना भी बेकल नहीं हूँ मैं।
चश्म-ए-पुरनम से चाहत को यूं बहाया न करो। तेरी मद भरी आंख का कोई काजल नहीं हूं मैं।
अनजान हूँ, हूँ परदेसी इतना न एतबार कर, बहता हुआ पानी हूँ समझ, साहिल नहीं हूँ मैं।
इतने परेशान न होइए ज़रा से सवाल पर, मसला तो हूँ मगर इतना मुश्किल नहीं हूँ मैं।
न डर ख़िज़ाँ से, बहार भी आएगी ‘मुश्ताक़’, बे-मौसम का तो यार कोई बादल नहीं हूँ मैं।




