डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश मुट्ठी भर इन साँसों में, कितने रंग समाते हैं,किस झूठे अभिमान में हम, जीवन को उलझाते हैं!जात-पात के पाखंडों में, अपनों को ठुकराते हैं,अंत समय सब यहीं छोड़कर, खाली हाथ हम जाते हैं।सुख-दुःख के इस मेले में, सब राही दो दिन के हैं,फ़िर क्यों मन के बियाबाँ में, मेले बैर-घृणा … Continue reading जात-पात के पाखंडों में,,,
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