राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का ‘गुरिल्ला आंदोलन’ : क्या विपक्ष की नई रणनीति बन रही है सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द?

भारतीय राजनीति के कैनवास पर पिछले कुछ दिनों से देश की राजधानी दिल्ली में जो दृश्य दिखाई दे रहे हैं, वे देश की सियासत में एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत दे रहे हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ इंडिया (INDIA) गठबंधन के नेतृत्व में कांग्रेस नेताओं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक ऐसी मुहिम छेड़ दी है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक ‘गुरिल्ला पॉलिटिक्स’ (Guerrilla Politics) का नाम दे रहे हैं। अचानक किए जाने वाले ये विरोध प्रदर्शन, बैरिकेड्स लांघना, और सुरक्षा चक्र को चकमा देकर सीधे अहम ठिकानों पर पहुंच जाना, दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार दोनों के लिए एक बड़ी प्रशासनिक व राजनीतिक चुनौती बन गया है। आजकल राहुल, प्रियंका के साथ पूरी विपक्ष ‘गुरिल्ला दांव’ के साथ ‘गुरिल्ला आन्दोलन ‘, सुनियोजित पारंपरिक रैलियों या पूर्व-घोषित बड़े आंदोलनों के बजाय, अचानक छोटे दस्तों के साथ औचक कार्रवाई कर रहे है। इस राजनीति का सीधा उद्देश्य प्रशासनिक अमले को संभलने का मौका न देना और सरकार पर सीधा हेडलाइन-मेकिंग प्रहार करना होता है। हालिया घटनाक्रमों में इसका सटीक उदाहरण देखने को मिला। जब इंडिया गठबंधन के सांसदों को पुलिस ने जंतर-मंतर की तरफ जाने से रोका, तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने एक अप्रत्याशित कदम उठाया। पूर्व-निर्धारित योजना से अलग हटते हुए, दोनों भाई-बहन सुरक्षा घेरे को दरकिनार कर आकाशवाणी भवन परिसर में दाखिल हो गए और वहां पिछले दरवाजे से चुनाव आयोग दफ्तर की तरफ बढ़ने का प्रयास किया। जब पुलिस ने अंदरूनी गेट बंद किए, तो उन्होंने वहीं परिसर के भीतर ही लगभग 7 से 8 घंटे लंबा धरना (Sit-in) शुरू कर दिया। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का भी मानना है कि इस औचक कार्रवाई की भनक सहयोगियों और यहाँ तक कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं थी, जिसने खुफिया एजेंसियों और पुलिस प्रशासन को पूरी तरह चौंका दिया।

आकाशवाणी भवन में हुए इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद जब दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कई विपक्षी सांसदों को हिरासत में लेकर किंग्सवे कैंप के न्यू पुलिस लाइंस भेजा, तो वहां भी यह आंदोलन खत्म नहीं हुआ। हिरासत में लिए जाने के बाद देर रात प्रियंका गांधी का पुलिस लाइंस के लोहे के ऊंचे गेट पर चढ़ जाना और कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। अगले ही दिन, राहुल गांधी को फिर से हिरासत में लिया गया। लगातार दूसरे दिन प्रियंका गांधी के साथ सड़क पर उतरकर हाथ में संविधान की प्रति लेकर ज़मीन पर लेट जाना और बैरिकेड्स पर चढ़कर तिरंगा फहराना जैसी तस्वीरों ने इस आंदोलन को एक आक्रामक चेहरा दे दिया है। कांग्रेस का कहना है कि वे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे तक पीछे हटने वाले नहीं हैं, जबकि राहुल गांधी ने पुलिस कार्रवाई पर पलटवार करते हुए कहा, “मेरे खिलाफ हर एक एफआईआर मेरे लिए एक मेडल (पदक) की तरह है।” इस गुरिल्ला आंदोलन के आक्रामक होते ही दिल्ली पुलिस ने भी अपनी कानूनी और सुरक्षा रणनीति को कड़ा कर दिया है। दिल्ली पुलिस ने सरकारी काम में बाधा डालने, अनधिकृत प्रवेश (ट्रेसपासिंग) करने और पुलिसकर्मियों के साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की व मारपीट करने के आरोपों में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कई अन्य कांग्रेस नेताओं के खिलाफ नई प्राथमिकी (FIR) दर्ज की हैं। सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस आंदोलन को ‘मर्यादा लांघने वाली राजनीति’ करार दिया है। भाजपा की ओर से सोशल मीडिया पर कई वीडियो जारी किए गए हैं, जिनमें विपक्ष के नेताओं पर पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया गया है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन सुरक्षा बलों पर हमला करना और कानून-व्यवस्था को हाथ में लेना किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं ठहराया जा सकता।

राहुल और प्रियंका गांधी का यह बदला हुआ आक्रामक रूप सरकार और दिल्ली के सुरक्षा तंत्र के लिए कई कारणों से बड़ी परेशानी का सबब बनता जा रहा है। पूर्वानुमान लगाने में नाकामी: पारंपरिक रूप से विपक्ष जब भी किसी बड़े मार्च या रैली की घोषणा करता है, प्रशासन पहले से रूट तय कर बैरिकेडिंग कर देता है। लेकिन ‘गुरिल्ला स्टाइल’ के इस नए पैटर्न में पुलिस को यह अंदाज़ा ही नहीं होता कि प्रदर्शनकारी कब गाड़ी से उतरकर पैदल चलने लगेंगे, किस रूट से मुड़ जाएंगे या किस सरकारी इमारत के भीतर धरना दे देंगे। सशक्त विजुअल नैरेटिव: आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में राजनीति छवियों (Visuals) से चलती है। राहुल गांधी का बैरिकेड पर खड़े होकर तिरंगा लहराना या प्रियंका गांधी का गेट पर चढ़ना और सड़क पर बैठना ऐसी छवियां पैदा कर रहा है जो कांग्रेस कैडर में नया जोश फूंक रही हैं और ‘ब्रांड मोदी’ के सामने एक सीधा ‘एंटी-ब्रांड’ खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं। गठबंधन का नेतृत्व और एकजुटता: चुनाव आयोग के खिलाफ इस औचक मोर्चे में केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC), वामपंथी दल (CPI-M/CPI), राजद (RJD) और आईयूएमएल (IUML) जैसी इंडिया गठबंधन की अन्य पार्टियां भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी नजर आ रही हैं। हालांकि अचानक लिए गए कुछ फैसलों से कुछ सहयोगी हैरान भी हुए, लेकिन अंततः यह आंदोलन पूरे विपक्ष को एक मंच पर लाने में सफल हो रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी ने अपनी पुरानी छवि को तोड़कर अब एक ऐसे ‘एक्शन-ओरिएंटेड’ नेता की छवि अपना ली है जो सीधे सड़कों पर सुरक्षा बलों और सत्ता से टकराने से गुरेज नहीं करता। भट्ठा-पारसौल और हाथरस जैसी पुरानी घटनाओं से शुरू हुआ यह सफर अब देश की राजधानी के सबसे वीवीआईपी (VVIP) सुरक्षा क्षेत्र तक पहुंच गया है। यह स्पष्ट है कि जैसे-जैसे आगामी राज्यों के चुनाव और राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ेंगी, विपक्ष का यह गुरिल्ला आंदोलन और तेज होगा। सरकार के लिए चुनौती सिर्फ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं है, बल्कि इस नैरेटिव (विमर्श) को भी रोकने की है जो सड़कों पर पुलिस बनाम विपक्ष की इस सीधी भिड़ंत से लगातार मजबूत हो रहा है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली पुलिस की यह कानूनी सख्ती और एफआईआर का दौर इस आंदोलन की धार को धीमा करता है या इसे और अधिक आक्रामक बना देता है।

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